श्रीसुब्रह्मण्यषट्कम्

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शरणागतमातुरमाधिजितंकरुणाकर कामद कामहतम् ।शरकाननसम्भव चारुरुचेपरिपालय तारकमारक माम् ॥ १ ॥
हरसारसमुद्भव हैमवती-करपल्लवलालित कम्रतनो ।मुरवैरिविरिञ्चिमुदम्बुनिधेपरिपालय तारकमारक माम् ॥ २ ॥
शरदिन्दुसमानषडाननयासरसीरुहचारुविलोचनया ।निरुपाधिकया निजवालतयापरिपालय तारकमारक माम् ॥ ३ ॥
गिरिजासुत सायकभिन्नगिरेसुरसिन्धुतनूज सुवर्णरुचे ।शिखितोकशिखावलवाहन हेपरिपालय तारकमारक माम् ॥ ४ ॥
जय विप्रजनप्रिय वीर नमोजय भक्तजनप्रिय भद्र नमो ।जय शाख विशाख कुमार नमःपरिपालय तारकमारक माम् ॥ ५ ॥
परितो भव मे पुरतो भव मेपथि मे भगवन् भव रक्ष गतिम् ।वितराशु जयं विजयं परितःपरिपालय तारकमारक माम् ॥ ६ ॥
इति कुक्कुटकेतुमनुस्मरतांपठतामपि षण्मुखषट्कमिदम् ।भजतामपि नन्दनमिन्दुभृतोन भयं क्वचिदस्ति शरीरभृताम् ॥ ७ ॥
गाङ्गेयं वह्निगर्भं शरवणजनितं ज्ञानशक्तिं कुमारंब्रह्मण्यं स्कन्ददेवं गुहमचलभिदं रुद्रतेजःस्वरूपम् ।सेनान्यं तारकघ्नं गजमुखसहितं कार्तिकेयं षडास्यंसुब्रह्मण्यं मयूरध्वजरथसहितं देवदेवं नमामि ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीसुब्रह्मण्यषट्कं सम्पूर्णम् ॥