रामरक्षास्तोत्रम्
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- Unexpected character '' in text <मेरी जिह्वाकी विद्यानिधि, कण्ठकी भरतवन्दित, कंधोंकी दिव्यायुध और भुजाओंकी भग्नेशकार्मुक ( महादेवजीका धनुष तोड़नेवाले ) रक्षा करें ॥ ६ ॥>
- Unexpected character '(' in text <हाथोंकी सीतापति, हृदयकी जामदग्न्यजित् ( परशुरामजीको जीतनेवाले ), मध्यभागकी खरध्वंसी ( खर नाम राक्षसका नाश करनेवाले ) और नाभिकी जाम्बवदाश्रय (जाम्बवान् के आश्रयस्वरूप) रक्षा करें ॥७॥>
- Unexpected character '(' in text <कमरकी सुग्रीवेश ( सुग्रीव के स्वामी ), सक्थियोंकी हनुमत्प्रभु और ऊरुओंकी राक्षसकुल-विनाशक रघुश्रेष्ठ रक्षा करें ॥ ८ ॥>
- Unexpected character '(' in text <जानुओंकी सेतुकृत, जङ्घाओंकी दशमुखान्तक (रावणको मारनेवाले), चरणोंकी विभीषणश्रीद ( विभीषणको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले ) और सम्पूर्ण शरीरकी श्रीराम रक्षा करें ॥ ९ ॥>
- Unexpected character '' in text <जो पुण्यवान् पुरुष रामबलसे सम्पन्न इस रक्षाका पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान्, विजयी और विनयसम्पन्न हो जाता है ॥ १० ॥>
- Unexpected character ''' in text <'राम', 'रामभद्र', 'रामचन्द्र-इन नामोंका स्मरण करनेसे मनुष्य पापोंसे लिप्त नहीं होता तथा भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥>
- Unexpected character '' in text <जो पुरुष जगतको विजय करनेवाले एकमात्र मन्त्र रामनामसे सुरक्षित इस स्तोत्रको कण्ठमें धारण करता है ( अर्थात् इसे कण्ठस्थ कर लेता है), सम्पूर्ण सिद्धियाँ उसके हस्तगत हो जाती हैं ॥ १३ ॥>
- Unexpected character '(' in text <(भगवान का कथन है कि ) राम, दाशरथि, शूर, लक्ष्मणानुचर, बली, काकुत्स्थ, पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघूत्तम, वेदान्तवेद्य, यज्ञेश, पुराणपुरुषोत्तम, जानकीवल्लभ, श्रीमान् और अप्रमेयपराक्रम – इन नामोंका>
- Unexpected character '' in text <जिनकी मनके समान गति और वायुके समान वेग है, जो परम जितेन्द्रिय और बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, उन पवननन्दन वानराग्रगण्य श्रीरामदूतकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ३३ ॥>
- Unexpected character ''' in text <'राम-राम' ऐसा घोष करना सम्पूर्ण संसारबीजोंको भून डालनेवाला, समस्त सुख-सम्पत्तिकी प्राप्ति करानेवाला तथा यमदूतोंको भयभीत करनेवाला है ॥ ३६ ॥>
- Unexpected character ';' in text <राजाओं में श्रेष्ठ श्रीरामजी सदा विजयको प्राप्त होते हैं। मैं लक्ष्मीपति भगवान् रामका भजन करता हूँ। जिन रामचन्द्रजीने सम्पूर्ण राक्षससेनाका ध्वंस कर दिया था, मैं उनको प्रणाम करता हूँ । रामसे बड़ा और कोई आश्रय नहीं है। मैं उन रामचन्द्रजीका दास हूँ। मेरा चित्त सदा राममें ही लीन रहे; हे राम ! आप मेरा उद्धार कीजिये ॥ ३७ ॥>
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