THE WORKS OF SRI SANKARACHARYA VOLUME 18 SRI VANI VILAS PRESS SRIRANGAM WWWWWOW WOW WOW WOW WOWOW WOWOW परिग्रहण सं० 10.380 प्रस्थालय, के ति शि संस्थान सारनाथ, वाराणसी Jaanans TO HIS HOLINLSS SRI JAGADCURU SRI SACHCHIDANANDA SIVABHINAVA NRISIMHA BHARATI SWAMI WHO ADORNS THE THRONE OF THE SRINGERI MUTT IS THE WORTHY RI PRESFNIALIVE OF THE (RFAL SANKARACHARYA AND THAN WHOM 11 IS IMI OSSIBLE 10 COMг ACROSS A HOLIER 1TRSONAGT A TRUER MAHATMA A NOBLER SAINT AND A MORT RICOROUS ASCTTIC THIS FDITION IS MOST RISIгCTFULI INSCRIBED IS A TOKI'N OF UNBOUNDTD ADMIRATION BY LHF HUMPLLST OF ALI HIS DISCIPLES TK BALASUBRAHMANYAM UUS नानामसु सचितन तपसा पूतन चित्तात्मना मिश्रण प्रतिबाधितेन कुतुकात्सर्वा कृती शाकरी । समुद्र्य प्रथम जगद्गुरुपद भक्त्या मयाद्यार्पिता स्वीकृत्योपहृत करातु गुरुराड् धन्य तथेम जनम् ॥ श्रीमच्छरदेशिकेन्द्ररचितान्सवान्प्रबन्धा मुदा तत्प्रीत्यै परिशाध्य पुस्तकचयै समुध साक बुधै । तच्छात्रप्रवरालिमध्यविलसच्छीदशिकेन्द्रेषु ता -कृत्वाद्योपहृतिं सभक्तिविनय नून कृतार्थोऽस्म्यहम् ॥ सौम्याद माघार्जुनपक्षराजत्सूयाङ्कतिथ्याश्रित सोमवारे । श्रीशकरायप्रतिमाप्रतिष्ठाकाल मयैषोपहृति यधायि ॥ श्रीशकरकृतिमाला गुरुवरतुष्ट्य समपिता मादात् । बालादिपदभाजा सुब्रह्मण्यन भक्तिनम्रेण ॥ ४ ॥ CONTENTS PAGE VISHNU STOTRAS 1 MISCELLANEOUS STOTRAS 70 LALITA TRISATISTOTRA BHASHYA 161 विष्णुस्तोत्राणि सकीर्णस्तोत्राणि विषया पृष्ठम् १ ७० ललितात्रिशतीस्तोत्र भाष्यम् १६१ STOTRAS. Vol 2 ॥ श्री ॥ ॥ विषयानुक्रमणिका ॥ पृष्ठम् हनुमत्पश्चरत्नम् श्रीरामभुजगप्रयातस्तोत्रम १ ३ लक्ष्मीनृसिंहपञ्चरत्नम् लक्ष्मीनृसिंहकरुणारसस्तोत्रम् श्रीविष्णुभुजगप्रयातस्तोत्रम् विष्णुपादादिकेशान्तस्तोत्रम् पाण्डुरङ्गाष्टकम् ११ १३ १८ २२ ३६ अच्युताष्टकम् ३९ कृष्णाष्टकम् ४२ हरिस्तुति ४५ गोविन्दाष्टकम् ५६ भगवन्मानसपूजा ५९ मोहमुद्रर ६२ कनकधारास्तोत्रम् अन्नपूर्णाष्टकम् 88110 ७० ७५ मीनाक्षी पञ्चरत्नम् मीनाक्षीस्तोत्रम् दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् कालभैरवाष्टकम् नर्मदाष्टकम् यमुनाष्टकम् [ २ ] ७९ ८१ ८४ ८९ ९२ ९५ यमुनाष्टकम् ९८ गङ्गाष्टकम् १०१ मणिकर्णिकाष्टकम् १०४ निर्गुणमानसपूजा १०७ प्रात स्मरणस्तोत्रम् ११२ जगन्नाथाष्टकम् ११४ षट्पदीस्तोत्रम् ११७ भ्रमराम्बाष्टकम् ११९ शिवपश्चाक्षरनक्षत्रमालास्तोत्रम् १२२ द्वादशलिङ्गस्तोत्रम् १३० अर्धनारीश्वरस्तोत्रम् १३४ शारदा भुजगप्रयाताष्टकम् १३७ गुर्वष्टकम् १४० काशीपञ्चकम् १४३ ॥ श्रीमहाविष्णु ॥ ॥ श्री ॥ ॥ हनुमत्पञ्चरत्नम् । Gourishunker Ganeriwala वीताखिलविषयेच्छ जातानन्दाश्रुपुलकमत्यच्छम् । सीतापतिदूताद्य वातात्मजमद्य भावये हृद्यम् ॥ १ ॥ तरुणारुणमुखकमल करुणारसपूरपूरितापाङ्गम् । सजीवनमाशा से मञ्जुलमहिमानमञ्जनाभाग्यम् ॥ २ शम्बरवैरिशरातिग- मम्बुजदलविपुललोचनोदारम् । कम्बुगलमनिलदिष्ट बिम्बज्वलितोष्ठमेकमवलम्बे ॥ ३ ॥ S S II 1 हनुमत्पञ्चरत्नम् । दूरीकृत सीतार्ति प्रकटीकृत रामवैभवस्फूर्ति । दारितदशमुखी पुरतो मम भातु हनुमतो मूर्ति ॥ ४ ॥ वानरनिकराध्यक्ष दानवकुलकुमुदरविकर सदृक्षम् । दीनजनावनदीक्ष पवनतप पाकपुञ्जमद्राक्षम् ॥ ५ ॥ एतत्पवनसुतस्य स्तोत्र य पठति पश्वरत्नाख्यम् । चिरमिह निखिलान्भोगा भुक्त्वा श्रीरामभक्तिभाग्भवति ॥ ६ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ हनुमत्पश्वरन सपूर्णम् ॥ 11 ft 11 ॥ श्रीराम जंगट यात स्तोत्रम् ॥ विशुद्ध पर सचिदानन्दरूप गुणाधारमाधारहीन वरेण्यम् । महान्त विभान्त गुहान्त गुणान्त सुखान्त स्वय धाम राम प्रपद्ये ॥ १ ॥ शिव नित्यमक विभु तारकाख्य सुखाकारमा कारशून्य सुमान्यम् । महेश कलेश सुरेश परेश नरेश निरीश महीश प्रपद्ये ॥ २ ॥ यदावर्णयत्कर्णमूलेऽन्तकाले शिवो राम रामेति रामेति काश्याम् । तदेक पर तारकब्रह्मरूप भजेऽह भजेऽह भजेऽह भजेऽहम् ॥ ३ ॥ ४ श्रीरामभुजङ्गप्रयातस्तोत्रम् । महारनपीठे शुभे कल्पमूले सुखासीनमादित्यकोटिप्रकाशम् । सदा जानकीलक्ष्मणोपेतमेक सदा रामचन्द्र भजेऽह भजेऽहम् ॥ ४ ॥ कणद्रत्नमञ्जीरपादारविन्द लसन्मेखलाचारुपीताम्बराढ्यम् । महाग्नहारोल्लसत्कौस्तुभाङ्ग । नदचश्वरीमञ्जरीलोलमालम् ॥ ५ ॥ सश्चन्द्रिकास्मेरशोणाधराभ समुत्पतङ्गेन्दुको दिप्रकाशम् । नमद्ब्रह्मरुद्रादिकोटीररत्न स्फुरत्कान्तिनीराजनाराधिताङ्घ्रिम् ॥ ६ ॥ पुर प्राजलीना अनेयादिभक्ता- चिन्मुद्रा भद्रया बोधयन्तम् । भजेऽह भजेऽह सदा रामचन्द्र त्वदन्य न मन्ये न मन्ये न मन्ये ॥ ७ ॥ श्रीराम भुजङ्गप्रयातस्तोत्रम् । यदा मत्समीप कृतान्त समेत्य प्रचण्डप्रकोपैर्भटैर्भीषयेन्माम् । तदाविष्करोषि त्वदीय स्वरूप सदापत्प्रणाश सकोदण्डबाणम् ॥ ८ ॥ निजे मानसे मन्दिरे सनिधेहि प्रसीद प्रसीद प्रभो रामचन्द्र । सौमित्रिणा कैकयीनन्दनेन स्वशक्त्यानुभक्त्या च ससेव्यमान ॥ ९ ॥ स्वभक्ताप्रगण्यै कपीशैर्महीशे- रनीकैरनकैश्च राम प्रसीद । नमस्ते नमोऽस्त्वीश राम प्रसीद प्रशाधि प्रशाधि प्रकाश प्रभो माम् ॥ १० ॥ त्वमेवासि देव पर मे यदेक सुचैतन्यमेतत्त्वदन्य न मन्ये । यतोऽभूदमेय वियद्वायुतेजो जलोर्व्यादिकार्य चर चाचर च ॥ ११ ॥ ६ श्रीरामभुजङ्गप्रयात स्तोत्रम् । नम सचिदानन्दरूपाय तस्मै नमो देवदेवाय रामाय तुभ्यम् । नमो जानकीजीवितेशाय तुभ्य नम पुण्डरीकायताक्षाय तुभ्यम् ॥ १२ ॥ नमो भक्तियुक्तानुरक्ताय तुभ्य नम पुण्यपुचैकलभ्याय तुभ्यम् । नमो वेदवेद्याय चाद्याय पुसे नम सुन्दरायेन्दिरावल्लभाय ॥ १३ ॥ नमो विश्वकर्त्रे नमो विश्वहर्त्रे नमो विश्वभो नमो विश्वमात्रे । नमो विश्वनेत्रे नमो विश्वजेत्रे नमो विश्वपित्रे नमो विश्वमात्र ॥ १४ ॥ नमस्ते नमस्त समस्त प्रपञ्च प्रभाग प्रयोगप्रमाणप्रवीण । मदीय मनस्त्वत्पदद्वन्द्वसेवा विधातु प्रवृत्त सुचैतन्यसिद्धये ॥ १५ ॥ श्रीरामभुजङ्गप्रयाततोत्रम् । शिलापि त्वदङ्घ्रिक्षमासङ्गिरेणु प्रसादाद्धि चैतन्यमाधन्त राम । नरस्त्वत्पदद्वन्द्वसेवाविधाना- सुचैतन्यमेतीति किं चित्रमय ॥ १६ ॥ पवित्र चरित्र विचित्र त्वदीय नरा ये स्मरन्त्यन्वह रामचन्द्र । भवन्त भवान्त भरन्त भजन्तो लभन्ते कृतान्त न पश्यन्त्यतोऽन्ते ॥ १७ ॥ स पुण्य स गण्य शरण्यो ममाय नरो वेद यो देवचूडामणिं त्वाम् । सदाकारमेक चिदानन्दरूप मनोवागगम्य पर धाम राम ॥ १८ ॥ प्रचण्डप्रतापप्रभावाभिभूत प्रभूतारिवीर प्रभो रामचन्द्र । बल ते कथ वर्ण्यतेऽतीव बाल्ये यतोऽखण्ड चण्डीकोदण्डदण्डम् ॥ १९ ॥ श्रीरामभुजङ्गप्रयातस्तोत्रम् । दशग्रीवमुत्र सपुत्र समित्र सरिदुर्गमध्यस्थरक्षोगणेशम् । भवन्त विना राम वीरो नरो वा सुरो वामरो वा जयेत्कखिलोक्याम् ॥ २० ॥ सदा राम रामेति रामामृत ते सदाराममानन्दनिष्यन्दकन्दम् । पिबन्त नमन्त सुदन्त हसन्त हनूमन्तमन्तर्भजे त नितान्तम् ॥ २१ ॥ सदा राम रामेति रामामृत ते सदाराममानन्दनिष्यन्दकन्दम् । frerrar नन्वह नैव मृत्यो बिभेमि प्रसादादसादान्तवैव ॥ २२ ॥ असीतासमेतैरकोदण्डभूषै रसौमित्रिवन्द्यैरचण्डप्रतापै । अलङ्केशकालैरसुग्रीवमित्रै- ररामाभिधेयैरल दैवतैर्न ॥ २३ ॥ श्रीरामभुजङ्गप्रयातस्तोत्रम् । अवीरासनस्थैरचिन्मुद्रिकाट्यै रभक्ताञ्जनेयादितत्त्वप्रकाशै । अमन्दारमूलैरमन्दारमालै । ररामाभिधेयैरल दैवतैर्न ॥ २४ ॥ असिन्धुप्रकोपैरवन्यप्रतापै रबन्धुप्रयाणैरमन्दस्मिताढ्यै । अदण्डप्रवासैरखण्डप्रबोधै ररामाभिधेयैरल दैवतैन ॥ २५ ॥ हरे राम सीतापते रावणारे खरारे मुरारेऽसुरार परेति । लपन्त नयन्त सदाकालमेव समालोकयालोकयाशेषबन्धो ॥ २६ ॥ नमस्ते सुमित्रासुपुत्राभिवन्द्य नमस्ते सदा कैकयीनन्दनेड्य । नमस्ते सदा वानराधीशवन्द्य नमस्ते नमस्ते सदा रामचन्द्र ॥ २७ ॥ ९ १० श्रीराम भुजङ्गप्रयातस्तोत्रम् । प्रसीद प्रसीद प्रचण्डप्रताप प्रसीद प्रसीद प्रचण्डारिकाल । प्रसीद प्रसीद प्रपन्नानुकम्पिन् प्रसीद प्रसीद प्रभो रामचन्द्र ॥ २८ ॥ भुजङ्गप्रयात पर वेदसार मुदा रामचन्द्रस्य भक्त्या च नित्यम् । पठन्सन्तत चिन्तयन्स्वान्तरङ्ग स एव स्वय रामचन्द्र स धन्य ॥ २९ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकरभगवत कृतौ श्रीरामभुजङ्गप्रयातस्तोत्रम् सपूर्णम् ॥ * ॥ श्री ॥ ॥ लक्ष्मीनृसिंहपञ्चरत्नम् ॥ त्वत्प्रभुजीवप्रियमिच्छसि चेन्नरहरिपूजा कुरु सतत प्रतिबिम्बालकृतिधृतिकुशलो बिम्बालकृतिमातनुते । चेतोभृङ्ग भ्रमसि वृथा भवमरुभूमौ विरसाया भज भज लक्ष्मीनरसिंहानघपद सरसिजमकरन्दम् ॥ शुक्तौ रजतप्रतिभा जाता कटकाद्यर्थसमर्था चें हु खमयी ते समृतिरेषा निर्वृतिदाने निपुणा स्यात् । चेतोभृङ्ग भ्रमसि वृथा भवमरुभूमौ विरसाया भज भज लक्ष्मीनरसिंहानघपदसरसिजमकरन्दम् ॥ आकृतिसाम्याच्छाल्मलिकुसुमे स्थलनलिनत्वभ्रममकरो गन्धरसाविह किमु विद्येते विफल भ्राम्यसि भृशविरसेऽस्मिन् । चेतोभृङ्ग भ्रमसि वृथा भवमरुभूमौ विरसाया भज भज लक्ष्मीनरसिंहानघपदसरसिजमकरन्दम् ॥ ३ ॥ १२ लक्ष्मीनृसिंहपञ्चरत्नम् । स्वक्चन्दनवनितादीन्विषयान्सुखदान्मत्वा तत्र विहर से गन्धफलीसदृशा ननु तेऽमी भोगानन्तरदु खकृत स्यु । चेतोभृङ्ग भ्रमसि वृथा भवमरुभूमौ बिरसाया भज भज लक्ष्मीनरसिंहानघपदसरसिजमकरन्दम ॥४॥ तव हितमेक वचन वक्ष्ये शृणु सुखकामो यदि सतत स्वप्ने दृष्ट सकल हि मृषा जाप्रति च स्मर तद्वदिति । चेतोभृङ्ग भ्रमसि वृथा भवमरुभूमौ विरसाया भज भज लक्ष्मीनरसिंहानघपद सरसिजमकरन्दम् ॥५॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचायस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ लक्ष्मीनृसिंहपश्चरत्न सपूर्णम् ॥ 11 of 11 ॥ लक्ष्मीनृसिंहकरुणारसस्तोत्रम् ॥ श्रीमत्पयोनिधिनिकेतनचक्रपाण भोगीन्द्रभोगमणिराजितपुण्यमूर्ते । योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १ ॥ ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि सघट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त । लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुह राजहस लक्ष्मीनृसिंह मम दहि करावलम्बम् ॥ २ ॥ ससारदावदहनाकरभीकरोरु- ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य । त्वत्पादपद्मसरसीरुहमागतस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ३ ॥ १४ लक्ष्मीनृसिंह करुणारसस्तोत्रम् । ससारजाल पतितस्य जगन्निवास 4 सर्वेन्द्रियार्थबडिशाप्रझषोपमस्य । प्रोत्कम्पितप्रचुरतालुक मस्तकस्य लक्ष्मीनृसिंह मम दहि करावलम्बम् ॥ ४ ॥ ससारकूपमतिघोरमागधमूल सप्राप्य दु खशतसर्पसमाकुलस्य । दीनस्य देव कृपया पदमागतस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ५ ॥ ससार भी करकरीन्द्रकराभिघात निष्पीड्यमानवपुष सकलार्तिनाश । प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ६ ॥ ससारसर्पविषदिग्धमहोप्रतीव्र दष्ट्रा कोटिपरिदष्टविनष्टमूर्ते । नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ७ लक्ष्मीनृसिंह करुणारस स्तोत्रम् । १५ ससारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म- शाखायुत करणपत्रमनङ्गपुष्पम् । आरुह्य दु खफलित चकित दयालो लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ८ ॥ ससारसागरविशालकरालकाल नक्रप्रहसितनिग्रहविग्रहस्य । व्यप्रस्य रागनिश्चयोर्मिनिपीडितस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ९ ॥ ससारसागरनिमज्जनमुहामान दीन विलोकय विभो करुणानिधे माम् । प्रह्लादखेदपरिहारपरावतार लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १० ॥ ससारघोरगहने चरतो मुरारे मारोप्रभीकरमृगप्रचुरादितस्य । आर्तस्य मत्सरनिदाघसुदु खितस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ ११ ॥ १६ बवा लक्ष्मीनृसिंहकरुणारसस्तोत्रम् । गले यमभटा बहु तर्जयन्त कर्षन्ति यत्र भवपाशशतैर्युत माम् । एकाकिन परवश चकित दयालो लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १२ ॥ लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप । ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव लक्ष्मीनृसिह मम देहि करावलम्बम् ॥ १३ ॥ एकेन चक्रमपरेण करेण शङ्ख- मन्येन सिन्धुतनयामवलम्ब्य तिष्ठन् । वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्न लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १४ ॥ अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य चोरैर्महाबलिभिरिन्द्रियनामधेये । मोहान्धकारकुहरे विनिपातितस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १५ ॥ लक्ष्मीनृसिंह करुणारसस्तोत्रम् । १७ प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक- व्यासादिभागवत पुगवहृन्निवास । भक्तानुरुक्त परिपालनपारिजात लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ १६ ॥ लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन स्तोत्र कृत शुभकर भुवि शकरेण । ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्ता स्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम ॥ १७ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचायस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छ करभगवत कृतौ लक्ष्मीनृसिंहकरुणारसस्तोत्र सपूर्णम् ॥ ssII 2 * ॥ । ॥ ॥ श्रीविष्णुभुजंगप्रयातस्तोत्रम् ॥ चिदश विभु निर्मल निर्विकल्प निरीह निराकारमोंकारगम्यम । गुणातीतमव्यक्तमेक तुरीय पर ब्रह्म य वेद तस्मै नमस्ते ॥ १ ॥ विशुद्ध शिव शान्तमाद्यन्तशून्य जगज्जीवन ज्योतिरानन्दरूपम् । अदिग्दशकालव्यवच्छ्दनीय at a य वेद तस्मै नमस्ते ॥ २ ॥ महायागपीठे परिभ्राजमाने धरण्यादितत्वात्मके शक्तियुक्त । गुणास्करे वह्निबिम्बार्धमध्ये समामीनमों कर्णिकेऽष्टाक्षराब्जे ॥ ३ ॥ श्रीविष्णु भुजगप्रयातस्तोत्रम् 1 समानोदितानेकसूर्येन्दुकोटि- प्रभापूर तुल्यद्युतिं दुर्निरीक्षम् । न शीत न चाष्ण सुवर्णावदात- प्रसन्न सदानन्दसवित्स्वरूपम् ॥ ४ ॥ सुनासापुट सुन्दर भ्रूललाट किरीटोचिताकुञ्चितस्निग्धकेशम । स्फुरत्पुण्डरीकाभिरामायताक्ष समुत्फुल्लरत्नप्रसूनावतसम् ॥ ९ ॥ लसत्कुण्डलामृष्टगण्डस्थलान्त जपारागचोराधर चारुहासम् । अलिव्याकुला मोदिमन्दारमाल महोरस्फुरत्कौस्तुभोदारहारम् ॥ ६ ॥ सुरत्नाङ्गदैरन्वित बाहुदण्डै- श्रतुर्भिश्चलत्कङ्कणालकृतायै । दादराकृत पीतवस्त्र पदद्वन्द्व निर्धूतपद्याभिरामम् ॥ ७ ॥ १९ २० श्रीविष्णुभुजगप्रयातस्तोत्रम् । स्वभक्तेषु सदर्शिताकारमेव सदा भावयन्सनिरुद्धेन्द्रियाश्व । दुराप नरो याति ससारपार परस्मै परेभ्योऽपि तस्मै नमस्ते ॥ ८ ॥ श्रिया शातकुम्भद्युतिस्निग्धकान्त्या धरण्या च दूर्वादलश्यामलाङ्गया । कलत्रद्वयेनामुना तोषिताय fararatगृहस्थra faणो नमस्ते ॥ ९ ॥ शरीर कलत्र सुत बन्धुवर्ग वयस्य धन सद्म भृत्य भुव च । समस्त परित्यज्य हा कष्टमेको गमिष्यामि दु खेन दूर किलाइम् ॥ १० ॥ जरेय पिशाचीव हा जीवतो मे वसामन्ति रक्त च मास बल व । अहो देव सीदामि दीनानुकम्पि किमद्यापि इन्त त्वयोदासितव्यम् ॥ ११ ॥ श्रीविष्णुभुजगप्रयातस्तोत्रम् । २१ कफव्याहतोष्णोल्बणश्वासवेग व्यथाविष्फुरत्सर्वमर्मास्थिबन्धाम् । विचिन्त्याहमन्त्याम सख्यामवस्था बिभेमि प्रभो किं करोमि प्रसीद ॥ १२ ॥ लपन्नच्युतानन्त गोविन्द विष्णो मुरारे हरे नाथ नारायणेति । यथानुस्मरिष्यामि भक्त्या भवन्त तथा मे दयाशील देव प्रसीद ॥ १३ ॥ भुजगप्रयात पठेद्यस्तु भक्त्या समाधाय चित्ते भवन्त मुरारे । स मोह विहायाशु युष्मत्प्रसादा त्समाश्रित्य योग व्रजत्यच्युत त्वाम् ॥ १४ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभग वत्पूज्यपाद शिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ श्रीविष्णुभुजगप्रयातस्तोत्र सपूर्णम् ॥ 11 of 11 ॥ विष्णुपादादिकेशान्तस्तोत्रम् ॥ लक्ष्मी भर्तुर्भुजाये कृतवसति सित यस्य रूप विशाल नीलाद्रेस्तुङ्गशृङ्गस्थितमिव रजनीनाथबिम्ब विभाति । पायान्न पाञ्चजन्य स दितिसुतकुलत्रासनै पूरयन्स्वै निध्वानैर्नीरदो घध्वनिपरिभवदैरम्बर कम्बुराज ॥ १ ॥ आहुर्यस्य स्वरूप क्षणमुखमखिल सूरय कालमेत ध्वान्तस्यैकान्तमन्त यदपि च परम सर्वधान्ना व धाम । चक्र तच्चक्रपाणेर्दितिजतनुगलद्रक्तधाराक्तधार वन विश्ववन्द्य वितरतु विपुल शर्म धर्माशुशोभम् ॥ अव्यान्निर्घातघोरो हरिभुजपवनामर्शनाध्मातमूर्ते रस्मान्विस्मेरनेत्र त्रिदशनुतिवच साधुकारै सुतार । सर्वे सहर्तुमिच्छोररिकुलभुवन स्फारविष्फारनाद सयत्कल्पान्तसिन्धौ शरसलिलघटावार्मुच कार्मुकस्य ॥ विष्णुपादादिकेशान्त स्तोत्रस् । २३ जीमूतश्यामभासा मुहुरपि भगवद्बाहुना मोहयन्ती युद्धेषूद्धूयमाना झटिति तटिदिवालक्ष्यते यस्य मूर्ति । सोऽसिखासाकुलाक्ष त्रिदशरिपुवपु शोणितास्वादतृप्तो नित्यानन्दाय भूयान्मधुमथनमनोनन्दनो नन्दको न ॥ कम्राकारा मुरारे करक मलतलेनानुरागाङ्गृहीता सम्यग्वृत्ता स्थिताप्र सपदि न सहते दर्शन या परेषाम् । राजन्ती दैत्यजीवासवमदमुदिता लोहितालेपनार्द्रा काम दीप्ताशुकान्ता प्रदिशतु दयितेवास्य कौमोदकी न ॥ यो विश्वप्राणभूतस्तनुरपि च हरेर्यानकेतुस्वरूपो य सचिन्त्यैव सद्य स्वयमुरगवधूवर्गगर्भा पतन्ति । चश्वचण्डोरुतुण्ड त्रुटित फणिवसारक्तपङ्काङ्कितास्य वन्दे छन्दोमय त खगपतिममलस्वर्णवर्ण सुपर्णम् ॥ ६ ॥ विष्णोर्विश्वेश्वरस्य प्रवरशयनकृत्सर्वलोकैकधर्ता सोऽनन्त सर्वभूत पृथुविमलयशा सर्ववेदैव वेद्य । पाता विश्वस्य शश्वत्सकलसुररिपुध्वसन पापहन्ता सर्वज्ञ सर्वसाक्षी सकलविषभयात्पातु भोगीश्वरो न ॥ २४ विष्णुपादादिकेशान्तस्तोत्रम् । वाग्भूगौर्यादिभेदैर्विदुरिह मुनयो या यदीयैश्व पुसा कारुण्या कटाक्षै सकृदपि पतितै सपद स्यु समप्रा । कुन्देन्दु स्वच्छ मन्दस्मितमधुरमुखाम्भोरुहा सुन्दराङ्गीं वन्दे वन्द्यामशेषैरपि मुरभिदुरोमन्दिरामिन्दिरा ताम् ॥ या सूते सन्वजाल सकलमपि सदा सनिधानेन पुसो धत्ते या तवयोगाश्चरमचरमिद भूतये भूतजातम् । धात्रीं स्थात्रीं जनित्रीं प्रकृतिमविकृतिं विश्वशक्ति विधात्रीं विष्णोविश्वात्मनस्ता विपुलगुणमयीं प्राणनाथा प्रणौमि ॥ येभ्योऽसूयद्भिरुचै सपदि पदमुरु व्यभ्यते दैत्य वर्गे- यो धर्तु च मूर्ध्ना स्यति सतत सर्वगीर्वाणवर्ग । नित्य निर्मूलयेयुर्निचिततरममी भक्तिनिघ्नात्मना न पद्माक्षस्याङ्घ्रिपद्मद्वयतलनिलया पासव पापपङ्कम् ॥ रेखा लेखादिवन्याश्चरणतलगताश्चक्रमत्स्यादिरूपा स्निग्धा सूक्ष्मा सुजाता मृदुललिततरक्षौमसूत्रायमाणा । दथुर्नो मङ्गलानि भ्रमरभरजुषा कोमलेनाब्धिजाया कोणाड्यमाना किसलयमृदुना पाणिना चक्रपाणे ॥ विष्णुपादादिकेशान्तस्तोत्रम् । २५ यस्मादाक्रामतो या गरुडमणिशिला के तुदण्डायमाना दाश्च्योतन्ती बभासे सुरसरिदमला वैजयन्तीव कान्ता । भूमिष्ठो यस्तथान्यो भुवनगृहबृहत् स्तम्भशोभा दधौ न पातामेतौ पयोजोदरललिततली पङ्कजाक्षस्य पादौ ॥ आक्रामया त्रिलोकीमसुरसुरपती तत्क्षणादेव नीतौ याभ्या वैरोचनीन्द्रौ युगपदपि विपत्सपदोरेकधाम । ताभ्या ताम्रदराभ्या मुहुरहम जितस्याश्विताभ्यामुभाभ्या प्राज्यैश्वर्यप्रदाभ्या प्रणतिमुपगत पादपङ्केरुहाभ्याम् ॥ येभ्यो वर्णचतुर्थश्वरमत उदभूदादिसग प्रजाना साहस्री चापि सरया प्रकटमभिहिता सर्ववेदेषु येषाम् । प्राप्ता विश्वभरा यैरतिवितततनोर्विश्वमूर्तेर्विराजो विष्णोस्तेभ्यो महद्भ्य सततमपि नमोऽस्त्वपिङ्केरुहेभ्य ॥ विष्णो पादद्वया विमलनखमणिभ्राजिता राजते या राजीवस्येव रम्या हिमजलकणिकालकृतामा दलाली । अस्माक विस्मयाण्यखिलजनमन प्रार्थनीया हि सेय दद्यादाद्यानवद्या ततिरतिरुचिरा मङ्गलान्यङ्गुलीनाम् ॥ २६ विष्णुपादादिकेशान्तस्तोत्रम् । यस्या दृष्ट्वामलाया प्रतिकृतिममरा सभवन्त्यानमन्त सेन्द्रा सान्द्रीकृतेर्ष्यास्त्व पर सुरकुलाशकुयातङ्कवन्त । सा स सातिरेका सकलसुखकरीं सपद साधयेन्न चार्वशुचक्रा चरणनलिनयोश्चक्रपाणेर्नखाली ॥ पादाम्भोजन्म सेवासमवनतसुरत्रात भास्वत्किरीट- प्रत्युप्तोच्चावचाश्मप्रवरकरगणैश्चिनित यद्विभाति । नम्राङ्गाना हरेनों हरिदुपलमहाकूर्म सौन्दर्यहारि छाय श्रेय प्रदायि प्रपदयुगमिद प्राप वत्पापमन्तम् ॥ श्रीमत्यौ चारुवृत्ते करपरिमलनानन्दहृष्टे रमाया सौन्दर्याढ्येन्द्रनीलोपलरचितमहादण्डयो कान्तिचोरे । सूरीन्द्रे स्तूयमाने सुरकुलसुखदे सूदितारातिसघे ज नारायणीये मुहुरपि जयतामस्मदहो हरन्त्यौ । सम्यक्सा विधातु सममिव सतत जइयो खिन्नयोर्ये भारी भूतोरुदण्डद्वय भरणकृतोत्तम्भभाव भजेते । चिन्तादर्श निधातु महितमिव सता ते समुद्रायमान वृत्ताकारे विधत्ता हृदि मुदमजितस्यानिश जानुनी न ॥ विष्णुपादादिकेशा तस्तोत्रम् । २७ देवो भीतिं विधातु सपदि विदधतौ कैटभाख्य मधु चा प्यारोप्यारूढगर्वावधिजलधि ययोरादिदैत्यौ जघान । वृत्तावन्योन्यतुल्यौ चतुरमुपचय बिभ्रतावस्वनीला वूरू चारू हरेस्तौ मुदमतिशयिनीं मानस नो विधत्ताम् ॥ पीतेन द्योतते यच्चतुरपरि हितेनाम्बरेणात्युदार जातालकारयोग जलमिव जलधेर्बाडबानिप्रभाभि । एतत्पातित्यदान्नो जघनमतिघनादेनसो माननीय सातत्येनैव चेतोविषयमवतरत्पातु पीताम्बरस्य ॥ २१ ॥ यस्या दाम्ना त्रिधाम्नो जघनकलितया भ्राजतेऽङ्ग यथाब्धे - मध्यस्थो मन्दराद्रिभुजगपतिमहाभागसनद्धमध्य । काथ्वी सा काभ्वनाभा मणिवरकिरणैरुल्लसद्धि प्रदीप्ता कल्या कल्याणदात्री मम मतिमनिश कन्ररूपा करोतु ॥ नम्र कन्रमुचैरुपचितमुदभूद्यत्र पत्रैर्विचित्रै पूर्व गीर्वाणपूज्य कमलजमधुपस्यास्पद तत्पयोजम् । यस्मिन्नीलाश्मनीलैस्तरलरुचिजलै पूरिते केलिबुद्धधा नालीकाक्षस्य नाभीसरसि वसतु नचिप्तहसश्विराय ॥ २८ विष्णुपादादिकेशा तस्तोत्रम् । पाताल यस्य नाल वलयमपि दिशा पत्रपङ्कीर्नगेन्द्रा- विद्वास केसरालीर्विदुरिह विपुला कर्णिका स्वर्णशैलम् । भूयाद्गायत्स्वयभूमधुकरभवन भूमय कामद नो नालीक नाभिपद्माकरभवमुरु तन्नागशय्यस्य शौरे ॥ आदौ कल्पस्य यस्मात्प्रभवति वितत विश्वमेतद्विकल्पै कल्पान्ते यस्य चान्त प्रविशति सकल स्थावर जङ्गम च । अत्यन्ताचिन्त्यमूर्ते श्विरतरमजितस्यान्तरिक्षस्वरूपे तस्मिन्नस्माकमन्त करणमतिमुदा क्रीडतात्क्रोडभागे ॥ कान्त्यम्भ पूरपूर्णे लसदसि तवली भङ्गभास्वत्तरङ्गे गम्भीराकारनाभीचतुरतर महावर्तशोभिन्युदारे । क्रीडत्वानद्वमोदरनहन महाबाडबानिप्रभाढ्ये काम दामोदरयोदरसलिलनिधौ चित्तमत्स्यश्चिर न ॥ नाभीनालीकमूलादधिकपरिमलोम्मोहितानामलीना माला नीलेव यान्ती स्फुरति रुचिमती वक्त्रपद्योन्मुखी या । रम्या सा रोमराजिर्महितरुचिकरी मध्यभागस्य विष्णो- चित्तस्था मा विरसीचिरतरमुचिता साधयन्ती श्रीय न ॥ विष्णुपादादिकेशा तस्तोत्रम् । २९ सस्तीर्ण कौस्तुभाशुप्रसर किसलयैर्मुग्धमुक्ताफलाढ्य श्रीवत्सोल्लास फुल्लप्रतिनववनमालाकि राजद्भुजान्तम् । वक्ष श्रीवृक्षकान्त मधुकरनिकरश्यामल शार्ङ्गपाणे ससाराध्वश्रमार्तैरुपवनमिव यत्सेवित तत्प्रपद्ये ॥ २८ ॥ कान्त वक्षो नितान्त विदधदिव गल कालिमा कालशत्रो रिन्दोम्ब यथाको मधुप इव तरोर्मश्वरीं राजत य । श्रीमान्नित्य विधेयादविरलमिलित कौस्तुभश्रीप्रतानै श्रीवत्स श्रीपत स श्रिय इव दयितो वत्स उच्चै श्रिय न ॥ सभूयाम्भोधिमध्यात्सपदि महजया य श्रिया सनिधत्ते नीले नारायणोर स्थलगगनतले हारतारोपसेव्ये । आशा सर्वा प्रकाशा विदधदपिदधञ्चात्मभासान्यतेजा स्याश्चर्यस्याकरो नो द्युमणिरिव मणि कौस्तुभ सोऽस्तु भूत्यै ॥ या वायावानुकूल्यात्सरति मणिरुचा भासमाना समाना साक साकम्पमसे वसति विदधती वासुभद्र सुभद्रम् । सार सारङ्गसधैर्मुखरितकुसुमा मेचकान्ता च कान्ता माला मालालितास्मान्न विरमतु सुखैर्योजयन्ती जयन्ती ॥ ३० विष्णुपादादिकेशान्तस्तोत्रम् । हारस्योरु प्रभामि प्रतिनववनमालाशुभि प्राशुरूपै श्रीभिश्चाप्यङ्गदाना कबलितरुचि यन्निष्कभाभिश्च भाति । बाहुल्येनैव बद्धाञ्जलिपुट मजितस्याभियाचामहे त द्वन्धार्ति बाधता नो बहुविहतिकरीं बन्धुर बाहुमूलम् ॥ विश्ववाणैकदीक्षास्तदनुगुणगुणक्षत्रनिर्माणदक्षा कर्तारो दुर्निरूपस्फुटगुणयशसा कर्मणामद्भुतानाम् । शार्ङ्ग बाण कृपाण फलक मरिगदे पद्माशङ्कौ सहस्र विभ्राणा शास्त्रजाल मम दधतु हरबहवो मोहहानिम् ॥ कण्ठाकल्पोद्गतैर्य कनकमयलसत्कुण्डलो थैरुदारै रुद्योते कौस्तुभस्याप्युरुभिरुपचितचित्रवर्णो विभाति । कण्ठाश्लेषे रमाया करवलयपदैर्मुद्रिते भद्ररूपे वैकुण्ठीयेऽत्र कण्ठे वसतु मम मति कुण्ठभाव विहाय ॥ पद्मानन्दप्रदाता परिलसदरुणश्री परीताप्रभाग काले काले च कम्बुप्रवरशशधरापूरणे य प्रवीण । वक्क्राकाशान्तरस्थस्तिरयति नितरा दन्ततारौघशोभा श्रीभर्तुर्दन्तवासोद्युमणिरघत्तमोनाशनायास्त्वसौ न ॥ विष्णुपादादिकेशा तस्तोत्रम् । नित्य स्नेहातिरेकान्निजकमितुरल विप्रयोगाक्षमा या वक्त्रेन्दोरन्तराले कृतवसतिरिवाभाति नक्षत्रराजि । लक्ष्मीकान्तस्य कान्ताकृतिरतिविलसन्मुग्धमुक्तावलिश्री- न्वाली सतत सा नतिनुतिनिरतानक्षतान्रक्षतान्न ॥ ३१ ब्रह्मन्ब्रह्मण्यजिह्मा मतिमपि कुरुषे देव सभावये त्वा aar as त्रिलोकीमवसि किममरैर्नारदाद्या सुख व । इत्थ सेवावनम्र सुरमुनिनिकर वीक्ष्य विष्णो प्रसन्न स्वास्येन्दोरात्रवन्ती वरवचनसुधाह्लादयेन्मानस न ॥ कर्णस्थ स्वर्णकम्रोज्ज्वलमकरमहाकुण्डलप्रोतदीप्य माणिक्यश्रीप्रतानै परिमिलितमलिश्यामल कोमल यत् । प्रोद्यत्सूर्यांशुराजन्मरकतमुकुराकारचोर मुरारे र्गादामागामिनीं न शमयतु विपद गण्डयोर्मण्डल तत् ॥ वक्लाम्भोजे लसन्त मुहुरधरमणि पक्कबिम्बाभिराम दृष्ट्वा द्रष्टु शुकस्य स्फुटमवतरतस्तुण्डदण्डायते य । घोण शोणीकृतात्मा श्रवणयुगलसत्कुण्डलोसैर्मुरारै प्राणाख्यस्यानिलस्य प्रसरणसरणि प्राणदानाय न स्यात् ॥ ३२ विष्णुपादादिकेशान्त स्तोत्रम् । fearat darat जगति मुहुरिमौ मचरन्तौ रवीन्दू त्रैलोक्यालोकदीपावभिदधति ययोरेव रूप मुनीन्द्रा । अस्मानब्जप्रभे ते प्रचुरतरकृपानिर्भर प्रेक्षमाणे पातामाता शुक्लासित रुचिरुचिरे पद्मनेत्रस्य नेत्रे ॥४०॥ पातात्पातालपात्तात्पतगपतिगते श्रूयुग सुम्नमध्य येनेषञ्चालितेन स्वपदनियमिता सासुरा देवसधा । नृत्यलालाटर रजनिकरतनारर्धखण्डावदाते कालव्यालद्वय वा विलमति समया वालिकामातर न ॥ लक्ष्माकारालकालिस्फुरद लिकशशाङ्कार्धसदर्शमील- नेत्राम्भोजप्रबोधोत्सुक निभृततरालीनभृङ्गच्छटाभ । लक्ष्मीनाथस्य लक्ष्यीकृत विबुधगणापाङ्गबाणासनार्ध- छाये तो भूरिभूतिप्रसवकुशलते भ्रूलते पालयेताम् ॥ रूक्षस्मारक्षुचापन्युतशरनिकरक्षीणलक्ष्मीकटाक्ष- प्रोत्फुल्लत्पद्ममालाविलसितमहितस्फाटिकैशानलिङ्गम । भूयाद्भूयो विभूत्यै मम भुवनपते भ्रूलताद्वन्द्वमध्या स्थ तत्पुण्ड्रमूर्ध्व जनिमरणतम खण्डन मण्डन च ॥ विष्णुपादादिकेशान्तस्तोत्रम् । पीठीभूतालकान्त कृतम कुट महादेव लिङ्गप्रतिष्ठे ३३ ललाटे नाट्यरने विकटतरतटे कैटभारेश्विराय । प्रोद्वाट्यैवात्मतन्द्रीप्रकटपटकुटीं प्रस्फुरन्ती स्फुटान पट्टीय भावनारया चटुलमतिनटी नाटिका नाटयेन्न ॥ मालालीवालिधाम्न कुवलयकलिता श्रीपते कुन्तलाली कालिन्याय मूर्ध्नो गलति हरशिर स्वर्धुनीस्पर्धया नु । राहुर्वा याति वक्त्र सकलशशिकला भ्रान्तिलोलान्तरात्मा लोकैरालोक्यते या प्रदिशतु मतत साखिल मङ्गल न ॥ सुप्ताकारा प्रसुप्ते भगवति विबुधैरप्यदृष्टस्वरूपा व्याप्तव्योमान्तरालास्तरलमणिरुचा रञ्जिता स्पष्टभास । देहच्छायोगमाभा रिपुवपुरगरुलोषरोषाग्निधूम्या केशा केशिद्विषो नो विदधतु विपुलक्केशपाशप्रणाशम् ॥ यत्र प्रत्युप्तरत्नप्रवरपरिलसद्भूरिरोचिष्प्रतान- स्फूर्त्या मूर्तिर्मुरारेद्युमणिशतचितव्योमवदुर्निरीक्ष्या । कुर्वत्पारेपयोधि ज्वलदकृशशिखाभास्वदौर्वाभिशङ्का शश्वन शर्म दिश्यात्कलिकलुषतम पाटन तत्किरीटम् ॥ ss II 3 ३४ विष्णुपादादिकेशान्तस्तोत्रम् । भ्रान्त्वा भ्रान्त्वा यदन्तस्त्रिभुवनगुरुण्यब्दकोटीरनेका गन्तु नान्त समर्थो भ्रमर इव पुनर्नाभिनालीकनालात् । उन्मज्जन्नूर्जितश्रीस्त्रिभुवनमपर निममे तत्सदृक्ष देहाम्भोधि स देयान्निरवधिरमृत दैत्यविद्वेषिणो न ॥ मत्स्य कूर्मो वराहो नरहरिणपतिवामनो जामदग्न्य काकुत्स्थ कसघाती मनसिजविजयी यश्च कल्किर्भविष्यन् । विष्णोरशावतारा भुवनहितकरा धर्मसस्थापनाथा पायासुर्मी त एते गुरुतरकरुणा भारखिन्नाशया ये ॥ ४९ ॥ यस्माद्वाचो निवृत्ता सममपि मनसा लक्षणामीक्षमाणा स्वार्थालाभात्परार्थव्यपगमकथनश्लाघिनो वेदवादा । नित्यानन्द स्वसविनिरवधिविमलस्वान्तसङ्क्रान्तबिम्ब छायापत्यापि नित्य सुसयति यमिनो यत्तदव्यान्महो न ॥ आपादादा च शीर्षाद्वपुरिदमनघ वैष्णव य स्वचित्ते धत्ते नित्य निरस्ताखिलकलिकलुष सततान्त प्रमोदम् । जुह्वज्जिह्वाकुशानौ हरिचरितद्वि स्तोत्रमन्त्रानुपाठे T तत्पादाम्भोरुहाभ्या सततमपि नमस्कुर्महे निर्मलाभ्याम् ॥ विष्णुपादादिकेशा तस्तोत्रम् । ३५ मोदात्पादादिकेश स्तुतिमितिरचिता कीर्तयित्वा त्रिधाम्न पादाब्जद्व- द्वसेवासमयनतमतिर्मस्तकेनानमेय । उन्मुक्यैवात्मनैनोनिचयकवचक पश्चतामेत्य भानो- बिम्बान्तर्गोचर स प्रविशति परमानन्दमात्मस्वरूपम् ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकरभगवत कृतौ विष्णुपादादिकेशान्तस्तोत्र सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ पाण्डुरङ्गाष्टकम् ॥ महायोगपीठे तटे भीमरथ्या वर पुण्डरीकाय दातु मुनीन्द्रै । समागत्य तिष्ठन्तमानन्दकन्द परब्रह्मलिङ्ग भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ १ ॥ तटिद्वासस नीलमेघावभास रमामन्दिर सुन्दर चित्प्रकाशम । वर त्विष्टकाया समन्यस्तपाद परब्रह्मलिङ्ग भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ २ ॥ प्रमाण भवान्धेरिद मामकाना नितम्ब कराभ्या घृतो यन तस्मात् । विधातुर्वसत्यै घृतो नाभिकोश परब्रह्मलिङ्ग भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ३ ॥ पाण्डुरङ्गाष्टकम् । स्फुरत्कौस्तुभालकृत कण्ठदेशे श्रिया जुष्टकेयूरक श्रीनिवासम् । शिव शन्तमीड्य वर लोकपाल परब्रह्मलिङ्ग भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ४ ॥ शरचन्द्रबिम्बानन चारुहास लसत्कुण्डलाक्रान्तगण्डस्थलान्तम् । जपारागबिम्बाधर कजनेत्र परब्रह्मलिङ्ग भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ५ ॥ किरीटोज्ज्वलत्सर्वदिक्प्रान्तभाग सुरैरर्चित दिव्यरत्नैरन । त्रिभङ्गाकृतिं बर्हमाल्यावतस परब्रह्मलिङ्ग भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ६ ॥ विभु वेणुनाद चरन्त दुरन्त स्वय लीलया गोपवेष दधानम् । गवा बृन्दकानन्दद चारुहास परब्रह्मलिङ्ग भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ७ ॥ ३७ ३८ पाण्डुरङ्गाष्टकम् । अज रुक्मिणीप्राणसजीवन त पर धाम कैवल्यमेक तुरीयम् । प्रसन्न प्रपन्नार्तिह देवदेव परब्रह्मलिङ्ग भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ८ ॥ स्तव पाण्डुरङ्गस्य वै पुण्यद ये पठन्त्येकचित्तेन भक्त्या च नित्यम् । भवाम्भोनिधि ते वितीर्त्वान्तकाले हरेरालय शाश्वत प्राप्नुवन्ति ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोवि दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रामच्छकरभगवत कृतौ पाण्डुरङ्गाष्टक सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ अच्युताष्टकम् ॥ अच्युत केशव रामनारायण कृष्णदामोदर वासुदेव हरिम् । श्रीधर माधव गोपिकावल्लभ जानकीनायक रामचन्द्र भजे ॥ १ ॥ अच्युत केशव सत्यभामाधव माधव श्रीधर राधिकाराधितम् । इन्दिरामन्दिर चेतसा सुन्दर देवकीनन्दन नन्दज सदधे ॥ २ ॥ विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मणीरागिणे जानकीजानये । वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने कसविध्वसिने वशिने ते नम ॥ ३ ॥ ४० अच्युताष्टकम् । कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे । अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ॥ ४ ॥ राक्षसक्षोभित सीतया शोभितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणम् । लक्ष्मणेनान्वितो वानरै सेवितो ऽगस्त्यसपूजितो राघव पातु माम् ॥ ५ ॥ धेनुकारिष्टानिष्टकृद्वेषिणा केशिहा सद्वशिकावादक । पूतनाकापक सूरजाखलनो बालगोपालक पातु मा सर्वदा ॥ ६ ॥ विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वासस प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लस द्विग्रहम् । वन्यथा मालया शोभितोर स्थल लोहिताद्द्द्विय वारिजाक्ष भजे ॥ ७ ॥ अच्युताष्टकम् । कुचितै कुन्तलैर्भ्राजमानानन रत्नमौलिं लसत्कुण्डल गण्डयो । हारकेयूरक कङ्कणप्रोज्ज्वल किंकिणीमञ्जुल श्यामल त भजे ॥ ८ ॥ अच्युतस्याष्टक य पठेदिष्टद प्रेमत प्रत्यह पूरुष सस्पृहम् । वृत्तत सुन्दर वेद्यविश्वभर तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्रजकाचायस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ अच्युताष्टक सपूर्णम् ॥ ४१ ॥ श्री ॥ ॥ कृष्णाष्टकम् ॥ श्रियाश्लिष्ट विष्णु स्थिरचरगुरुर्वेद विषयो धिया साक्षी शुद्धो हरिरसुरहन्ताब्जनयन । गदी शङ्खी चक्री विमलवनमाली स्थिररुचि शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषय ॥१॥ यत सर्व जात वियदनिलमुख्य जगदिद स्थितौ निशेष योsवति निजसुखाशेन मधुहा । लये सर्वे स्वस्मिन्हरति कलया यस्तु स विभु शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषय ॥२॥ असूनायम्यादौ यमनियममुरयै सुकरणै निरुद्धयेद चित्त हृदि विलयमानीय सकलम् । मी पश्यन्ति प्रवरमतयो मायिनमसो शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषय ॥ कृष्णाष्टकम् । पृथिव्या तिष्ठन्यो यमयति महीं वेद न धरा यमित्यादौ वेदो वदति जगतामीशममलम् । नियन्तार ध्येय मुनिसुरनृणा मोक्षदमसौ । शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषय । महेन्द्रादिदेवो जयति दितिजान्यस्य बलतो न कस्य स्वातन्त्र्य कचिदपि कृतौ यत्कृतिमृते । बलारातेर्गर्व परिहरति योऽसौ विजयिन शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषय ॥ ४३ विना यस्य ध्यान व्रजति पशुता सूकरमुखा विना यस्य ज्ञान जनिमृतिभय याति जनता । विना यस्य स्मृत्या कृमिशतजनिं याति स विभु शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषय ॥ ६ ॥ नरातङ्कोदृङ्क शरणशरणो भ्रान्तिहरणो घनश्यामो बामो व्रजशिशुवयस्योऽर्जुनसख । स्वयंभूर्भूताना जनक उचिताचारसुखद शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषय ॥७॥ ४४ कृष्णाष्टकम् । यदा धर्मग्लानिर्भवति जगता क्षोभकरणी तदा लोकस्वामी प्रकटितवपु सेतुवृदज । सता धाता स्वच्छो निगमगणगीतो व्रजपति शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषय ॥ ८ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यवादशिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ कृष्णाष्टक सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ हरिस्तुतिः ॥ स्तोष्ये भक्त्या विष्णुमनादिं जगदादिं यस्मिन्नेतत्ससृतिचक्र भ्रमतीत्थम् । यस्मिन्दृष्टे नश्यति तत्ससृतिश्चक्र त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ १ ॥ यस्यैकाशादित्थमशेष जगदेत- प्रादुर्भूत येन पिनद्ध पुनरित्थम् । येन व्याप्त येन विबुद्ध सुखदुखै स्त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ २ ॥ सर्वज्ञो यो यश्च हि सर्व सकलो यो यश्चानन्दोऽनन्तगुणो यो गुणधामा । यश्चाव्यक्तो व्यस्तसमस्त सदसद्य स्त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ३ ॥ ४६ हरिस्तुति । यस्मादन्यन्नास्त्यपि नैव परमार्थ दृश्यादन्यो निर्विषयज्ञानमयत्वात् । ज्ञातृज्ञानज्ञेयविहीनाऽपि सदा ज्ञ स्त संसारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ४ ॥ आचार्येभ्यो लब्धसुसूक्ष्माच्युततत्त्वा वैराग्येणाभ्यासबलाश्चैव द्रढिम्ना । भक्त्यैकाग्र्यध्यानपरा य विदुरीश त समारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ५ ॥ प्राणानायम्यमिति चित्त हृदि रुध्वा नान्यत्स्मृत्वा तत्पुनरत्रैव विलाप्य । क्षीणे चित्त भातशिरस्मीति विदुर्य त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ६ ॥ य ब्रह्माख्य देवमनन्य परिपूर्ण हृत्स्थ भक्तैर्लभ्यमज सूक्ष्ममतम् । ध्यात्वात्मस्थ ब्रह्मविदो य विदुरीश त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ७ ॥ हरिस्तुति । मानातीत स्वात्मविकासात्मविबोध ज्ञेयातीत ज्ञानमय हृद्युपलभ्य । भावग्राह्यानन्दमनन्य च विदुर्य त ससारध्वान्नविनाश हरिमीडे ॥ ८ ॥ यद्यद्वेय वस्तुतत्व विषयाख्य तत्तद्ब्रह्मैवेति विदित्वा तदह च । ध्यायन्त्येव य सनकाद्या मुनयोऽज त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ९ ॥ यद्यद्वेय तत्तदह नेति विहाय स्वात्मज्योतिर्ज्ञानमयानन्दमवाप्य । तस्मिन्नस्मीत्यात्मविदो य विदुरीश त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ १० ॥ हित्वाहित्वा दृश्यमशेष सविकल्प मत्वा शिष्ट भादृशिमात्र गगनाभम् । त्यक्त्वा देह य प्रविशन्त्यच्युतभक्ता- स्त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ११ ॥ ४७ ४८ हरिस्तुति । सर्वत्रात सर्वशरीरी न च सर्व सर्व वेवेह न य वेत्ति च सव । सर्वत्रान्तर्यामितयेत्थ यमयन्य- स्त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ १२ ॥ सर्व दृष्ट्वा स्वात्मनि युक्त्या जगदेत- दृष्ट्वात्मान चैवमज सर्वजनेषु । सर्वात्मैकोऽस्मीति विदुर्य जनहत्स्थ त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ १३ ॥ सर्वत्रैक पश्यति जिघ्रत्यथ भुङ्क्ते स्प्रष्टा श्रोता बुध्यति चेत्याहुरिम यम । साक्षी चास्ते कर्तृषु पश्यन्निति चान्ये त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ १४ ॥ पश्यशृण्वन्नव विजानन्रसयन्स free मम जीवतयेत्थम् । इत्यात्मान य विदुरीश विषयज्ञ त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ १५ ॥ हरिस्तुति । जाद्दृष्ट्वा स्थूल पदार्थानथ माया दृष्ट्वा स्वप्नेऽथापि सुषुमौ सुखनिद्राम । इत्यात्मान वीक्ष्य मुदास्त च तुरीये त समारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ १६ ॥ पश्य शुद्धोऽप्यश्नर एका गुणभेदा न्नानाकारान्स्फाटिकवद्भाति विचित्र । भिन्नश्छिन्नश्चायमज कर्मफलैर्य स्त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ १७ ॥ ब्रह्मा विष्णू रुद्रहुताशौ रविचन्द्रा विन्द्रो वायुर्यज्ञ इतीत्थ परिकल्प्य । एक सन्त य बहुधाहुर्मतिभेदा त्त समाग्ध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ १८ ॥ सत्य ज्ञान शुद्धमनन्त व्यतिरिक्त शान्त गूढ निष्कलमानन्दमनन्यम् । इत्यादौ य वरुणोऽसौ भृगवेऽज त मसारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ १९ ॥ 55 11 4 ४९ ५० हरिस्तुति । कोशानेतान्पञ्च रसादीनतिहाय ब्रह्मास्मीति स्वात्मनि निश्चित्य रशिम्थम । पित्रा शिष्टो वेद भृगुर्य यजुरन्ते त ममारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ २० ॥ येनाविष्टो यस्य च शक्त्या यदधीन क्षेत्रज्ञोऽय कारयिता जन्तुषु कर्तु । कर्ता भोक्ता मात्र हि यछक्त्यधिरूढ म्त मसारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ २१ ॥ सृष्ट्वा सर्वे स्वात्मतयैवत्थमतयै व्याप्याथान्त कृत्स्नमिद सृष्टमशेषम् । सच्च त्यचाभूत्परमात्मा स य एक स्त समारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ २२ ॥ वेदान्तैश्वाध्यात्मिकशास्त्रैश्च पुराणे शास्त्रैश्वान्यै सात्त्वततन्त्रैश्च यमीशम । वास बुढा विविशुर्य त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ २३ ॥ हरिस्तुति । श्रद्धाभक्तिध्यानशमाद्यैर्यतमाने- तु शक्यो देव इहैवाशु य ईश । दुर्विज्ञेयो जन्मशतैश्चापि विना तै- म्त मसारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ २४ ॥ यम्यात स्वात्मविभूत परमार्थ सर्वे खल्वित्यत्र निरुक्त श्रुतिविद्धि । तज्जातित्वादधितरङ्गाभमभिन्न त साध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ २५ ॥ दृष्ट्वा गीतास्वक्षरतत्त्व विधिनाज भक्त्या गुर्व्या लभ्य हृदिस्थ दृशिमात्रम् । ध्यात्वा तस्मिन्नस्म्यहमित्यव विदुर्य तमसारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ २६ ॥ क्षेत्रज्ञत्व प्राप्य विभु पञ्चमुखैर्यो sra भोग्यपदार्थान्प्रकृतिस्थ । क्षेत्रे क्षेत्रेऽविन्दुवदेको बहुधास्ते त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥। २७ ॥ ५१ ५२ हरिस्तुति । युक्त्या लोड्य व्यासवचाम्यन हि लभ्य श्रश्नत्रज्ञान्तरावद्भि पुरुषारय । ग्राऽह माऽसौ माऽस्म्यहमवात विदुर्य त समारभ्वान्तविनाश हरिमीड ॥ २८ ॥ एकाकृत्यानकशरीरस्थामम ज्ञ य विज्ञायहैव म एवाशु भवन्ति । मिल्लीना नह पुनजन्म लभन्त त समारध्वान्तावनाश हरिमीड ॥ २९ ॥ द्वन्द्वैकत्व यच्च मधुब्राह्मणवाक्यै कृत्वा शकापामनमासान विभूत्या । योऽसौ मोह माऽस्म्यहमेवेति निदुर्य त समारभ्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ३० ॥ याsय दह चेयितान्त करणम्थ सूर्ये चासौ तापायता सोऽम्म्यहमेव । इत्यात्मैक्यापासनया य विदुरीश त समारध्वान्तावनाश हरिमीडे ॥ ३१ ॥ हरिस्तुति । विज्ञानाशो यस्य सत शक्त्यधिरूढा बुद्धिर्बुध्यत्यत्र बाहबध्यपदार्थान । नैवान्त स्थ बुध्यति य बोधयितार त समारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ३२ ॥ कोsय देह देव इतात्थ सुविचार्य ज्ञाता श्राता मन्तयिता चैष हि देव । इत्यालोच्य ज्ञाश इहास्मीति विदुर्य त मसारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ३३ ॥ का हावान्यादात्मनि न म्यादयमष ह्येवानन्द प्राणिति चाषानिति चेति । इत्यस्तित्व वक्त्युपपत्त्या श्रुतिरषा त ममारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ३४ ॥ प्राणो वाह वाक्छ्रवणादीनि मना वा बुद्धिर्वा व्यस्त उताहोऽपि समस्त । इत्यालोच्य ज्ञप्तिरिहास्मीति विदुर्य त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ३५ ॥ ५४ हरिस्तुति । नाह प्राणो नैव शरीर न मनोऽह नाह बुद्धिर्नाहमहकारधियौ च । योsa ज्ञाश मोsस्म्यहमेवेति विदुर्य तमसारध्वान्तविनाश हरिमीड ॥ ३६ ॥ सत्तामात्र कवलविज्ञानमज म- त्सूक्ष्म नित्य तत्त्वमसीत्यात्मसुताय । सानामन्ते प्राह पिता य विभुमाद्य त समारध्वान्तविनाश हरिमीड ॥ ३७ ॥ मूर्तामूर्ते पूर्वमपाद्याथ समाधौ दृश्य सर्व नेति च नतीति विहाय । चैतन्याशे स्वात्मनि सन्त च विदुर्य त समारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ३८ ॥ ओत प्रोत यत्र च सर्वे गगनान्त योsस्थूलानण्वादिषु सिद्धोऽक्षरसज्ञ । ज्ञातातोऽन्यो नेत्युपलभ्यो न च वेद्य स्त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ३९ ॥ हरिम्तुति । तावत्सर्वे सत्यमिवाभाति यदेत - यावत्सोऽस्मीत्यात्मनि यो ज्ञो न हि दृष्ट । दृष्टे यस्मिन्सर्वमसत्य भवतीद त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ४० ॥ रागामुक्त लोहयुत हेम यथाभौ योगाष्टाङ्गैरुज्ज्वलितज्ञानमयाग्नौ । दग्ध्वात्मान ज्ञ परिशिष्ट च विदुर्य त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ४१ ॥ य विज्ञानज्योतिषमाद्य सुविभान्त हृथकेंन्द्रग्न्योक समीड्य तटिदाभम् । भक्त्याराध्येहैव विशन्त्यात्मनि मन्त त समारध्वान्तविनाश हरिमीड ॥ ४२ ॥ पायाद्भक्त स्वात्मनि सन्त पुरुष या भक्त्या स्तोतीत्याङ्गिरम विष्णुरिम माम । इत्यात्मान स्वात्मनि महत्य सदैक स्त ससारध्वान्तविनाश हरिमीडे ॥ ४३ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचायस्य श्रीगोविदभग- वत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकरभगवत कृतौ हरिस्तुति सपूर्णा ॥ ५५ ॥ श्री ॥ ॥ गोविन्दाष्टकम् ॥ ** सत्य ज्ञानमनन्त नित्यमनाकाश परमाकाश गोष्ठप्राङ्गणरिङ्खणलालमनायाम परमायासम् । मायाकल्पितनानाकारमनाकार भुवनाकार क्ष्मामानाथमनाथ प्रणमत गोविन्द परमानन्दम् ॥ १ ॥ मृत्स्नामत्सीहोत यशोदाताडनशैशवसत्राम व्यादितवक्रालाकितलाकालोकचतुदशलोकालिम् । लोकत्रयपुरमूलस्तम्भ लोकालाकमनालोक लोकेश परमेश प्रणमत गोविन्द परमानन्दम् ॥ २ ॥ त्रैविष्टपरिपुवीरन क्षितिभारन्न भवरागन कैवल्य नवनीताहारमनाहार भुवनाहारम । वैमल्यस्फुटचेतोवृत्तिविशेषाभासमनाभाम शैव केवलशान्त प्रणमत गोविन्द परमानन्दम् ॥ ३ ॥ गोविन्दाष्टकम् । गोपाल प्रभुलीलाविग्रहगोपाल कुलगोपाल गोपीखेलनगोवधनधृति लीलालालितगोपालम् । गोभिर्निगदित गोविन्दस्फुटनामान बहुनामान गोधीगोचरदूर प्रणमत गोविन्त परमानन्दम् ॥ ४ ॥ गोपीमण्डल गोष्ठीभेद भदावस्थमभेदाभ शश्वद्गोखुरनिर्धूतोद्गतधूली धूसर सौभाग्यम् । श्रद्धाभक्तिगृहीतानन्दमचिन्त्य चिन्तितसद्भाव चिन्तामणिमहिमान प्रणमत गोविन्द परमानन्दम् ॥ स्नानव्याकुलयोषिद्वखमुपादायागमुपारुढ व्यादित्सन्तीरथ दिग्वखा दातुमुपाकर्षन्त ता । निर्धूतद्वयशोकविमोह बुद्ध बुद्धेरन्त स्थ ५७ सत्तामात्रशरीर प्रणमत गोविन्द परमानन्दम् ॥ ६ ॥ कान्त कारणकारणमादिमनादि कालघनाभास कालिन्दीगत कालिय शिरसि सुनृत्यन्त मुहुरत्यन्तम् । काल कालकलातीत कलिताशष कलिदोषघ्न कालत्रयगतिहेतु प्रणमत गोविन्द परमानन्दम् ॥ ७ ५८ गोविन्दाष्टकम् । वृन्दावनभुवि वृन्दारकगणवृन्दाराधितवन्याया कुन्दाभामलमन्दस्मेरसुधानन्द सुमहानन्दम । वन्याशेष महामुनिमानसवन्द्यानन्दपदद्वन्द्व नन्याशेषगुणाधि प्रणमत गोविन्द परमानन्दम् ॥८॥ गोविन्दाष्टकमेतदधीत गोविन्दार्पितचता या गोविन्दाच्युत माधव विष्णा गोकुलनायक कृष्णेति । गोविन्दाहि सरोजध्यानसुधाजलधौत समस्ताघा गोविन्द परमानन्दामृतमन्तम्थ स तमभ्येति ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोवि दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छ करभगवत कृतौ गाविन्दाष्टक सपूर्णम ॥ ॥ श्रीः ॥ ॥ भगवन्मानसपूजा ॥ हृदम्भोजे कृष्ण सजलजलदश्यामलतनु सरोजाक्ष स्रग्वी मकुटकटकाद्याभरणवान् । शरद्राकानाथप्रतिमवदन श्रीमुरलिका वहन्ध्येयो गोपीगणपरिवृत कुङ्कुमचित ॥ १ ॥ पयोम्भोधेद्वपान्मम हृदयमायाहि भगव न्मणिव्रात भ्राजत्कनकवरपीठ भज हरे । सुचिहौ ते पादौ यदुकुलज ननेज्मि सुजलै ग्रहाद दूर्वा फलजलवदर्भ्य मुररिपो ॥ २ ॥ त्वमाचामोपेन्द्र त्रिदशसरिदम्भोऽतिशिशिर भजस्वम पश्चामृतफलर साप्लावमघहन । नया कालिन्या अपि कनककुम्भस्थितमिद जल तेन स्नान कुरु कुरु कुरुष्वाचमनकम ॥ ३ ॥ ६० भगव मानसपूजा । तद्विर्णे वस्त्र भज विजयकान्ताधिहरण प्रलम्बारिभ्रातमृदुलमुपवीत कुरु गल । ललाट पाटीर मृगमन्युन धारय हरे ग्रहाणेद माल्य गतदलतुलस्यादिरचितम् ॥ ४ ॥ दशाङ्ग धूप सद्वरद चरणाऽपितामद मुख दीपनेन्दुप्रभविरजम एव कलय । इम पाणी वाणीपतिनुत सकपूररजमा विशोध्यायेत सलिलमिदमाचाम नृहरे ॥ ५ ॥ सदा तृप्तान्न षड्रसवदखिलव्य जनयुत सुवर्णामत्रे गोघृतचषकयुक्त स्थितमिदम् । शादासूना तत्परमदययाशान सखिभि प्रमाद वाञ्छद्धि मह तदनु ना प विभा ॥ ६ ॥ मचूर्ण ताम्बूल मुखशुचिकर भक्षय हर फल स्वादु प्रीत्या पारमलवदास्वादय चिरम् । सपर्यापर्यात्यै कनकमणिजात स्थितमिद प्रदीपैरारार्ति जलधितनयाश्लिष्ट रचये ॥ ७ ॥ भगवन्मानसपूजा । ६१ विजातीयै पुष्पैरतिसुरभिभिर्बिस्व तुलसी युतैश्म पुष्पा खालमजित त मूर्ध्नि निन्ध । तव प्रादक्षिण्यक्रमणमघविध्वमि रचित चतुर्वार विष्णा जनिपथगतश्चान्तविदुषा ॥ ८ ॥ नमस्कारोऽष्टाङ्ग सकलदुरितध्वसनपटु कृत नृत्य गीत म्तुानरपि रमाकान्त त इयम । तव प्रीत्यै भूयादहमपि च मस्तव विभा कृत छिद्र पूर्ण कुरु कुरु नमस्तऽस्तु भगवन ॥ ९ ॥ सदा सेव्य कृष्ण सजलघननील करतले दधाना दध्यन्न तदनु नवनीत मुरलिकाम । कदाचित्कान्ताना कुचकलशपनालिरचना समासक्त निग्धै सह शिशुविहार विरचयन् ॥ १० ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकरभगवत कृतो भगवन्मानसपूजा सपूर्णा ॥ x ॥ श्री ॥ ॥ मोहमुद्गरः ॥ भज गाविन्द भज गोविन्द भज गोविन्द मूढमते । प्राप्ते सनिहिते काले न हि न हि रक्षति डुकृव्करण ॥ १ ॥ मूढ जहीहि धनागमतृष्णा कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम । यस निजकर्मोपान्त वित्त तेन विनोदय चित्तम् ॥ २ ॥ नारीस्तनभरनाभीदेश दृष्ट्वा मा गा माहावशम् । एतन्मासवसादिविकार मनसि विचिन्तय वार वारम् ॥ ३ ॥ मोहमुद्रर । नलिनीदलगत जलमतितरल तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् । विद्धि व्याध्यभिमानप्रस्त लाक शोकहत च समस्तम् ॥ ४ ॥ यावद्वित्तोपार्जनसक्त स्तावनिजपरिवारो रक्त पश्चाज्जीवति जर्जरदेह वात कोऽपि न प्रच्छति गेहे ॥ ५ ॥ यावत्पवनो निवसति देहे तावत्पृच्छति कुशल गेहे । गतवति वायो दहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥ ६ ॥ बालस्तावत्क्रीडासक्त तरुणस्तावत्तरुणी सक्त । वृद्धस्तावचिन्तासक्त परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्त ॥ ७ ॥ ६३ ६४ माहमुद्गर । का कान्ता कम्त पुत्र मसारोऽयमतीव नाचन कस्य त्वं क कुत आयात स्तत्व चिन्तय यदि भ्रान्त ॥ ॥ मत्सङ्गत्वे नि मङ्गत्व नि सङ्गत्व निर्मोहत्वम । निर्मोहत्व निश्चलितत्व निश्चलितत्व जीव मुक्ति ॥ ९ ॥ वयसि गते क कामात्रकार शुष्क नीर क कासार । क्षीणे वित्तक परिवारो ज्ञात तवे क समार ॥ १० ॥ मा कुरु धनजन यौवनगर्ने हरति निमेषात्काल सर्वम । मायामयमिदमखिल हित्वा ब्रह्मपद त्व प्रविश विदित्वा ॥ ११ ॥ मोहमुद्रर । दिनयामिन्यौ साय प्रात शिशिरवसन्तौ पुनरायात । काल क्रीडति गच्छत्यायु स्तदपि न मुचत्याशावायु ॥ १२ ॥ का ते कान्ताघनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता । त्रिजगति सज्जनसगतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका ॥ १३ ॥ जटिली मुण्डी लुश्चितकेश काषायाम्बरबहुकृतवेष । पश्यन्नपि च न पश्यति मूढो ह्युदरनिमित्त बहुकृतवेष ॥ १४ ॥ अङ्ग गलित पलित मुण्ड दशनविहीन जात तुण्डम् । वृद्धो याति गृहीत्वा दण्ड तदपि न मुचत्याशापिण्डम् ॥ १५ ॥ 8 S II 5 ६६ मोहमुद्गर अत्रे वह्नि पृष्ठे भानू रात्रौ चुबुकसमर्पितजानु । करतलभिक्षस्तरुतलवास स्तदपि न मुचत्याशापाश ॥ १६ ॥ कुरुत गङ्गासागरगमन व्रतपरिपालनमथवा दानम् । ज्ञानविहीन सर्वमतेन मुक्ति न भजति जन्मशतेन ॥ १७ ॥ सुरमन्दिरतरुमूलनिवास शय्या भूतलमजिन वास । सर्वपरिग्रहभोगत्याग कस्य सुख न करोति विराग ॥ १८ ॥ योगरतो वा भोगरतो वा सगरतो वा सगविहीन । यस्य ब्रह्मणि रमते चित्त नन्दति नन्दति नन्दत्येव ॥ १९ ॥ मोहमुद्गर । भगवद्गीता किंचिदधीता गङ्गाजललवकणिका पीता । सकृदपि येन सुरारिस्रमर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ॥ २० ॥ पुनरपि जनन पुनरपि मरण पुनरपि जननीजठरे शयनम् । इह ससारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥ २१ ॥ रध्याकर्पटविरचितकन्थ पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थ । योगी योगनियोजितचित्तो रमते बालोन्मत्तवदेव ॥ २२ ॥ कस्त्व कोsह कुत आयात का मे जननी को मे तात । इति परिभावय सर्वमसार विश्व त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥ २३ ॥ मोहमुद्रर । त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णु व्यर्थ कुप्यसि मन्य सहिष्णु । सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मान सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥ २४ ॥ शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्न विप्रहसन्धौ । भव समचित्त सर्वत्र त्व वाकस्यचिरायदि विष्णुत्वम् ॥ २५ ॥ काम क्रोध लोभ मोह त्यक्त्वात्मान भावय काऽहम । आत्मज्ञानविहीना मूढा स्ते पच्यन्ते नरकनिगूढा ॥ २६ ॥ गेय गीतानामसहस्र ध्यय श्रीपतिरूपमजस्रम् । नेय सज्जनसके चित्त देय दीनजनाय च विश्वम् ॥ २७ ॥ मोहमुद्गर । सुखत क्रियते रामाभोग पश्चाद्धन्त शरीरे रोग । यद्यपि लोके मरण शरण तदपि न मुभ्यति पापाचरणम् ॥ २८ ॥ अर्थमनर्थे भाव नित्य नास्ति तत सुखलेश सत्यम् । पुत्रादपि धनभाजा भीति सर्वत्रैषा विहिता रीति ॥ २९ ॥ प्राणायाम प्रत्याहार नित्यानित्य विवेकविश्वारम् । जायसमेत समाधिविधान कुर्ववधान महदवधानम् ॥ ३० ॥ गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्त ससारादचिराद्भव मुक्त । सेन्द्रियमानसनियमादेव द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थ देवम् ॥ ३१ ॥ इति मोहमुद्गर सपूर्ण ॥ ६९ 11 of 11 ॥ कनकधारास्तोत्रम् ॥ अङ्ग हरे पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव सुकुलाभरण तमालम् । अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदवताया ॥ १ ॥ मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे प्रेमपाप्रणिहितानि गतागतानि । मालादृशोमधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रिय दिशतु सागरसभवाया ॥ २ ॥ विश्वामरन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष मानन्दहेतुरधिक मुरविद्विषोऽपि । ईषनिषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्ध मिन्दीवरोदर सहा दर मिन्दिराया ॥ ३ ॥ कनकधारास्तोत्रम् । आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द मानन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् । आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्र भूत्यै भवेन्मम भुजगशयाङ्गनाया ॥ ४ ॥ बाह्नन्तरे मधुजित श्रितकौस्तुभेया हारावलीव हरिनीलमयी विभाति । कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयाया ॥ ५ ॥ कालाम्बुदा लिललितारसि कैटभार- धराधरे स्फुरति यत्तटिदङ्गनेव । मातु समस्तजगता महनीयमूर्ति भद्राणि मे दिशतु भागवन दनाया ॥ ६ ॥ प्राप्त पद प्रथमत खलु यत्प्रभावा- न्माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन । मय्यात्तदिह मन्थरमीक्षणार्ध मन्दालस च मकरालयकन्यकाया ॥ ७ ॥ ve कनकधारास्तोत्रम् । दयाहयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा मस्मिन्न किंचन विहगशिशौ विषण्णे । दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूर नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाह ॥ ८ ॥ इष्टाविशिष्टतयोऽपि यया दयार्द्र- दृष्ट्या त्रिविष्टपपद सुलभ लभन्ते । दृष्टि प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टा पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया ॥ ९ ॥ गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति शाकभरीति शशिशेखरवल्लभेति । सृष्टिस्थितिप्रलयकलिषु सस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥ १० ॥ श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्म फलप्रसूत्यै त्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै । शक्त्यै नमोsस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्टयै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ ११ ॥ कनकधारास्तोत्रम् । नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै । नमोऽस्तु सोमाभृतसोदरायै नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥ १२ ॥ पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि । द्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिश कलयन्तु मान्ये ॥ १३ ॥ यत्कटाक्षसमुपासनाविधि सेवकस्य सकलार्थसपद । सतनोति वचनाङ्गमानसै स्त्वा मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १४ ॥ सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवळतमाशुकगन्धमाल्यशोभे । भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ १५ ॥ ७४ कनकधारास्तोत्रम् । दिघ्वस्तिभि कनककुम्भमुखावसृष्ट स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् । प्रातर्नमामि जगता जननीमशष लोकाधिनाथगृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम् ॥ १६ ॥ कमल कमलाक्षवल्लभ त्व करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गे । अवलोकय मामकिंचनाना प्रथम पात्रमकृत्रिम दयाया ॥ १७ ॥ स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वह त्रयीमयीं त्रिभुवनमातर रमाम् । गुणाधिका गुरुतरभाग्यभाजिनो भवन्ति त भुवि बुधभाविताशया ॥ १८ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचायस्य श्रीगोवि दभग- वत्पूज्यपाद शिष्यस्य श्रीमच्छकरभगवत कृतौ कनकधारास्तोत्र सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ अन्नपूर्णाष्टकम् ॥ नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी निर्धूताखिलदोषपावनकरी प्रत्यक्ष माहेश्वरी । प्रालयाचलवशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षा दहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १ ॥ नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी मुक्ताहारविडम्बमान विलमद्वक्षोजकुम्भान्तरी । काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिर काशीपुराधीश्वरी भिक्षा दाह कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ २ ॥ योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मैकनिष्ठाकरी चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी । सर्वैश्वर्यकरी तप फळकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षा देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ३ ॥ ७६ अन्नपूर्णाष्टकम् । कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी ह्युमाशाकरी कौमारी निगमार्थगोचरकरी लोंकारबीजाक्षरी । मोक्षद्वारकवाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षा देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ४ ॥ दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी लीलानाटकसूत्रखेलनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी । श्रीविश्वेशमन प्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षा देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ५ ॥ आदिक्षान्त समस्तवर्णनकरी शभुप्रिया शाकरी काश्मीर त्रिपुरेश्वरी त्रिनयनी विश्वेश्वरी शर्वरी । स्वर्गद्वारक वाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षा देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ६ ॥ सर्वजनेश्वरी जयकरी माता कृपासागरी । नारीनीलसमानकुन्तलधरी नित्यान्नदानेश्वरी साक्षान्मोक्षकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी fear देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ७ ॥ अन्नपूर्णाष्टकम् । देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी वामा स्वादुपयाधरा प्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी । भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षा देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ८ ॥ चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशी चन्द्राशुबिम्बाधरी चन्द्रार्काग्निसमानकुण्डलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी । मालापुस्तकपाशसाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षा देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ९ ॥ क्षत्रत्राणकरी महाभयहरी माता कृपासागरी सर्वानन्दकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरी श्रीधरी । दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षा देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १० अन्नपूर्णे सदापूर्णे शकरप्राणवल्लभे । ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थ भिक्षा देहि च पार्वति ॥ ११ ॥ अन्नपूर्णाष्टकम् । माता च पार्वतीदेवी पिता दवा महेश्वर । बान्धवा शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥ १२ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छ करभगवत कृतौ अन्नपूर्णाष्टक सपूर्णम् ॥ ॥ श्रीः ॥ ॥ मीनाक्षीपञ्चरत्नम् ॥ उद्यद्भानुसहस्रकोटिसदृशा केयूरहारोज्ज्वला बिम्बोष्ठीं स्मितदन्तपतिरुचिरा पीताम्बरालकृताम् । विष्णुब्रह्मसुरेन्द्रसेवितपदा तस्वस्वरूपा शिवा मीनाक्षीं प्रणतोऽस्मि सततमह कारुण्यवारानिधिम् ॥ मुक्ताहारलसत्किरीटरुचिरा पूर्णेन्दुवक्रप्रभा शिजन्नूपुर किंकिणीमणिधरा पद्मप्रभाभासुराम् । सर्वाभीष्टफलप्रदा गिरिसुता वाणीरमासेविता मीनाक्षीं प्रणतोऽस्मि सततमह कारुण्यवारानिधिम् ॥ श्रीविद्या शिववामभागनिलया ह्रींकारमन्त्रोज्ज्वला श्रीचक्राङ्कित बिन्दुमध्यवसतिं श्रीमत्सभानायकीम् । श्रीमत् षण्मुखविघ्नराजजननीं श्रीमज्जगन्मोहिनीं मीनाक्षीं प्रणतोऽस्मि सततमह कारुण्यवारानिधिम् ॥ मीनाक्षीपञ्चरत्नम् । श्रीमत्सुन्दरनायकी भयहरा ज्ञानप्रदा निर्मला श्यामामा कमलासनार्चितपदा नारायणस्यानुजाम् । वीणावेणुमृदङ्गवायरसिका नानाविधाडम्बिका मीनाक्षी प्रणतोऽस्मि सततमह कारुण्यवारानिधिम् ॥ नानायोगमुनीन्द्रहृन्निवसतीं नानार्थसिद्धिप्रदा नानापुष्पविराजितायुिगला नारायणेनार्चिताम् । नादब्रह्ममय परात्परतरा नानार्थतत्वात्मिका मीनाक्षी प्रणतोऽस्मि सततमह कारुण्यवारानिधिम् ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविद भगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ मीनाक्षीश्वरन सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ मीनाक्षीस्तोत्रम् ॥ -* श्रीविद्ये शिववामभागनिलये श्रीराजराजार्चिते श्रीनाथादिगुरुस्वरूपविभवे चिन्तामणीपीठिके । श्रीवाणीगिरिजानता किमले श्रीशाभवि श्रीशिवे मध्याह्ने मलयध्वजाधिपसुते मा पाहि मीनाम्बिके ॥ १ ॥ चक्रस्थेऽचपले चराचरजगन्नाथे जगत् पूजिते आर्तालीवरदे नताभयकर वक्षोजभारान्विते । विद्ये वेदकलापमौलिविदिते विद्युल्लताविप्रहे मात पूर्णसुधारसार्द्रहृदये मा पाहि मीनाम्बिके ॥ २ ॥ कोटीराङ्गदरत्नकुण्डलधरे कादण्डबाणावि कोकाकारकुचद्वय। परिसत्प्रालम्बहाराविते । शिअनूपुरपादसारसमणी श्रीपादुकालकृते मद्दारिद्र्यभुजगगारुडखगे मा पाहि मीनाम्बिके ॥ ३ ॥ ss II 6 ८२ मीनाक्षीस्तात्रम् । ब्रह्मेशाच्युतगीयमानचरिते प्रतासनान्तस्थिते पाशोदङ्कुशचापबाणकलित बालन्दुचूडाञ्चित । बाले बालकुरङ्ग लालनयन बालाककाटघुज्ज्वल मुद्राराधितदैवते मुनिसुत मा पाहि मीनाम्बिके ॥ ४ ॥ गन्धर्वामरयक्षपन्नगनुत गङ्गाधरालिङ्गित गायत्रीगरुडासन कमलजे सुश्यामले सुस्थित । खातीते खलदारुपावकशिखे खद्यात कोट्युज्ज्वले मन्त्राराधितदैवते मुनिसुते मा पाहि मीनाम्बिके ॥ ५ ॥ नादे नारदतुम्बुराविनुते नादान्तनादात्मिक नित्ये नीललतात्मिके निरुपम नीवारशूकोपम । कान्त कामकल कदम्बनिलय कामश्वराङ्कस्थित द्विद्य मदभीष्टकल्पलतिके मा पाहि मीनाम्बिके ॥ ६ ॥ वीणानादनिमीलिताधनयन विस्रस्तचूलीभर ताम्बूलारुणपल्लवाधरयुते ताटङ्कहारान्वित । श्यामे चन्द्रकलावतसकलित कस्तूरिका फालिक पूर्णे पूर्णकलाभिरामवदने मा पाहि मीनाम्बिक ॥ ७ ॥ मीनाक्षीस्तोत्रम् । शब्दब्रह्ममयी चराचरमयी ज्योतिर्मयी वाङ्मयी ૮૨ नित्यानन्दमयी निरञ्जनमयी तत्त्वमयी चिन्मयी । तत्त्वातीतमयी परात्परमयी मायामयी श्रीमयी सर्वैश्वयमयी सदाशिवमयी मा पाहि मीनाम्बिके ॥८॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचायस्य श्रीगोविदभग वत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकरभगवत कृतौ मीनाक्षीस्तोत्र सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ " दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् ॥ उपासकाना यदुपासनीय मुपात्तवास वटशास्त्रिमूले । तद्धाम दाक्षिण्यजुषा स्वमूर्त्या जागर्तु चित्ते मम बोधरूपम् ॥ १ ॥ अद्राक्षमक्षीणदयानिधान- माचार्यमाद्य वटमूलभागे । मौनेन मन्दस्मितभूषितन महालोकस्य तमो नुदन्तम् ॥ २ ॥ विद्राविताशषतमोगणन मुद्राविशेषण मुहुमुनीनाम । निरस्य माया दयया विधन्ते देवो महास्तवमसीति बोधम् ॥ ३ ॥ दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् । h अपारकारुण्यसुधातरजै पाङ्गपातैरवलोकयन्तम् । कठोरससारनिदाघ तप्ता न्मुनीनह नौमि गुरु गुरूणाम् ॥ ४ ॥ ममाद्यदेवो वटमूलवासी कृपाविशेषात्कृतसनिधान । ओंकाररूपामुपदिश्य विद्या माविद्यकध्वान्तमपाकरोतु ॥ ५ ॥ कलाभिरिन्दोरिव कल्पितान मुक्ताकलापैरिव बद्धमूर्तिम् । आलोकये देशिकमप्रमेय मनाद्यविद्यातिमिरप्रभातम् ॥ ६ ॥ स्वदक्षजानुस्थित वामपाद पादोदराळकृतयोगपट्टम् । अपस्मृतेराहितपादमङ्गे प्रणौमि देव प्रणिधानवन्तम् ॥ ७ ॥ ૮૬ दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् । तत्वार्थमन्तेवसतामृषीणा युवापि य सन्नुपदेष्टुमी । प्रणमित प्राक्तन पुण्यजालै राचार्यमाश्चर्यगुणाधिवासम् ॥ ८ ॥ एकेन मुद्रा परशु करेण करेण चान्येन मृग दधान । स्वजानुविन्यस्तकर पुरस्ता दाचायचूडामणिराविरस्तु ॥ ९ ॥ आलेपवन्त मदनाङ्गभूत्या शार्दूलकृत्त्या परिधानवन्तम् । आलोकये कचन देशिकेन्द्र मज्ञानवाराकरबाडवाग्निम् ॥ १० ॥ चारस्थित सोमकलावतस वीणाधर व्यक्तजटाकलापम । उपासते केचन योगिनस्त्व मुपान्तनादानुभवप्रमोदम् ॥ ११ ॥ दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् । उपासते य मुनय शुकाद्या निराशिषो निर्ममताधिवासा । त दक्षिणामूर्तितनु महेश मुपास्मह मोहमहार्तिशान्यै ॥ १२ ॥ कान्त्या निन्दितकुन्दकदलवपुयप्रोधमूले वस कारुण्यामृतवारिभिमुनिजन सभावयन्वीक्षितै । मोहध्वान्तविभेदन विरचयन्बोधेन तत्तादृशा ८७ देवस्तवमसीति बोधयतु मा मुद्रावता पाणिना ॥ १३ ॥ अगौर नेत्रैरलल टनेत्रै रशान्तवेषैरभुजगभूषे । अबोधमुद्रैरनपास्तनिद्रै रपूरकामैरमरैरल न ॥ १४ ॥ देवतानि कति सन्ति चावनौ नैव तानि मनसो मतानि मे । दीक्षित जडधियामनुग्रहे दक्षिणाभिमुखमव दैवतम् ॥ १५ ॥ ८८ दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् । मुदिताय मुग्धशशिनावत सिने भसितावलेपरमणीयमूर्तये । जगदिन्द्रजालर चनापटीयसे महसे नमोऽस्तु वटमूलवासिने ॥ १६ ॥ व्यालम्बिनीभि परितो जटाभि कलावशषेण कलाधरेण पश्यल्ललाटेन मुखेन्दुना च प्रकाशसे चेतसि निर्मलानाम् ॥ १७ ॥ उपासकाना त्वमुमासहाय पूर्णेन्दुभाव प्रकटीकरोषि । यदद्य ते दर्शनमानता मे द्रवत्यहो मानसचन्द्रकान्त ॥ १८ ॥ यस्त प्रसज्ञामनुसदधानो मूर्ति मुदा मुग्धशशाङ्कमौले । ऐश्वर्यमायुलभत च विद्या मन्त च वेदान्तमहा रहस्यम् ॥ १९ ॥ इति दक्षिणामूर्तिस्तोत्र संपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ कालभैरवाष्टकम् ॥ देवराजसेव्यमानपावनापिज व्यालयज्ञसूत्र बिन्दुशेखर कृपाकरम् । नारदादियोगिबृन्दवन्दित दिगम्बर काशिकापुराधिनाथकालभैरव भजे ॥ १ ॥ भानुकोटिभाखर भवाब्धितारक पर नीलकण्ठमीप्सिताथदायक त्रिलोचनम् । कालकालमम्बुजाक्षमक्षशूलमश्नर काशिकापुराधिनाथकालभैरव भजे ॥ २ ॥ शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारण श्यामकायमादिदेवमक्षर निरामयम् । भीमविक्रम प्रभु विचित्रताण्डवप्रिय काशिकापुराधिनाथकालभैरव भजे ॥ ३ ॥ कालभैरवाष्टकम् । भुक्तिमुक्तिदायक प्रशस्तचारुविग्रह भक्तवत्सल स्थिर समस्तलाक विग्रहम् । निक्कणन्मनोज्ञमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरव भज ॥ ४ ॥ धर्मसेतुपालक त्वधममागनाशक कर्मपाशमोचक सुशर्मदायक विभुम् । स्वर्णवर्णकशपाशशोभिताङ्गनिर्मल काशिकापुराधिनाथकालभैरव भजे ॥ ५ ॥ रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मक नित्यमद्वितीयमिष्टदैवत निरञ्जनम् । मृत्युदपनाशन करालदष्ट्रभूषण काशिकापुराधिनाथ कालभैरव भज ॥ ६ ॥ अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसततिं दृष्टिपातनष्टपापजालमुप्रशासनम् । अष्टसिद्धिदायक कपालमालिकाघर काशिकापुराधिनाथकालभैरव भजे ॥ ७ ॥ कालभैरवाष्टकम् । ९१ भूतसङ्घनायक विशालकीर्तिदायक काशिवासिलोक पुण्यपापशोधक विभुम् । नीतिमार्गकोविद पुरातन जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरव भजे ॥ ८ ॥ कालभैरवाष्टक पठन्ति ये मनोहर ज्ञानमुक्तिसाधक विचित्र पुण्यवर्धनम् । शोकमोहलोभदैन्य कोपतापनाशन ते प्रयान्ति कालभैरवासिनिधि भुवम् ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ कालभैरवाष्टक सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ नर्मदाष्टकम् ॥ सबिन्दुसिन्धुसुस्खलन्तरङ्गभङ्गरश्चित द्विषत्सु पापजातजातकादिवारिसयुतम् । कृतान्तदूतकालभूत भीतिहारिवर्मदे त्वदीयपादपङ्कज नमामि देवि नर्मदे ॥ १ । त्वदम्बुलीनदीन मीनदिव्यस प्रदायक कलौ मलौषभारहारिसवतीर्थ नायकम् । सुमच्छकच्छनक्रचक्रवाकचक्रशर्मदे त्वदीयपादपज नमामि देवि नर्मदे ॥ २ ॥ महागभीरनीरपूरपापधूत भूतल ध्वनत्समस्तपातकारिदारितापदाचलम् । जगलये महाभये मृकण्डुसूनुहर्म्यदे त्वदीयपादपङ्कज नमामि देवि नर्मदे ॥ ३ । नर्मदाष्टकम् । गस तदैव मे भय त्वदम्बु बीक्षित यदा मृकण्डुसूनुशौनकासुरारिसेवित सदा । पुनर्भवाब्धिजन्मज भवान्धिदु खवर्मदे त्वदीयपादपङ्कज नमामि देवि नर्मदे ॥ ४ ॥ अलक्ष्यलक्ष किन्नरामरासुरादिपूजित सुलक्षनीर तीरधीरपक्षिलक्षकूजितम् । वसिष्ठशिष्टपिप्पलादिकर्दमादिशर्मंद त्वदीयपादपङ्कज नमामि देवि नर्मदे ॥ ५ ॥ सनत्कुमारनाचिकेत कश्यपात्रिषट्पदै धृत स्वकीयमानसेषु नारदादिषट्पदे । रवीन्दुरन्तिदेवदेवराजकर्मशर्मदे त्वदीयपादपङ्कज नमामि देवि नर्मदे ॥ ६ ॥ अलक्षलक्षलक्षपापलक्षसारसायुध ततस्तु जीवजन्तुतन्तुभुक्तिमुक्तिदायकम् । विश्वविष्णुश कर स्वकीयधामवर्मदे त्वदीयपादपङ्कज नमामि देवि नर्मदे ॥ ७ ॥ ૧૪ नर्मदाष्टकम् । अहो धृत स्वन श्रुत महेशिकेशजातट किरातसूतवाडवेषु पण्डित शठ नटे । दुरन्तपापतापहारि सर्वजन्तुशर्मद त्वदीयपादपङ्कज नमामि देवि नमद ॥ ८ ॥ इद तु नर्मदाष्टक त्रिकालमेव ये सदा पठन्ति ते निरन्तर न यन्ति दुगतिं कदा । सुलभ्यदेह दुर्लभ महशधामगौरव पुनर्भवा नरा न वै विलोकयन्ति रौरवम ॥ ९॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकरभगवत कृतौ नर्मदाष्टक सपूर्णम् ॥ 11 & 11 ॥ यमुनाष्टकम् ॥ मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी । मनोनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जधूतदुर्मदा धुनोतु नो मनामल कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ १ ॥ मलापहारिवारिपूरिभूरिमण्डितामृता भृश प्रवातकप्रपञ्चनातिपण्डितानिशा । सुनन्दनन्दिनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता धुनोतु नो मनोमल कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ २ ॥ लसत्तरङ्गसङ्गधूतभूतजातपातका नवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका । तटान्तवासदासहससवृताहिकामदा धुनोतु नो मनोमल कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ३ ॥ ९६ यमुनाष्टकम् । विहाररासखेदभदधीरतीर मारुता गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता । प्रवाह साहचर्यपूतमेदिनी नदीनदा धुनोतु नो मनोमल कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ४ ॥ तरङ्गसङ्गसे कतान्तरातित सदासिता शरन्निशाकराशुममञ्जरी सभाजिता । भवार्चनाप्रचारुणाम्बुनाधुना विशारदा धुनातु नो मनोमल कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ५ ॥ जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणी स्वभर्तुरन्यदुलभाङ्गताङ्गतागभागिनी स्वदत्त सुप्तसप्तसिन्धुभेदिनातिकोविदा धुनोतु नो मनोमल कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ६ ॥ जलच्युतायुताङ्गरागलम्पटालिशालिनी विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी । सदावगाहनावतीर्ण भर्तृभृत्यनारदा धुनोतु नो मनोमल कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ यमुनाष्टकम् । सदैव नन्दिनन्द के लिशालिकुलम जुला तटोत्थफुल्ल मल्लिका कदम्ब रेणुसूज्ज्वला । जलावगाहिना नृणा भवाब्धिसिन्धुपारदा ९७ धुनोतु नो मनोमल कलिन्दनन्दिनी सदा ॥ ८ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छ करभगवत कृतौ यमुनाष्टक सपूर्णम् ॥ S S II 7 ॥ श्री ॥ ॥ यमुनाष्टकम् ॥ कृपापारावारा तपनतनया तापशमना मुरारिप्रेयस्या भवभयदवा भक्तिवरदाम् । वियज्ज्वालोन्मुक्ता श्रियमपि सुखाप्ते परिदिन सदा धीरो नून भजति यमुना नित्यफलदाम् ॥ १ ॥ मधुवनचारिणि भास्करवाहिनि जाह्रविसङ्गिनि सिन्धुसुते मधुरिपुभूषणि माधवतोषिणि गोकुल भीतिविनाशकृते । जगदघमोचिनि मानसदायिनि केशवकलिनिदानगते जय यमुने जय भीतिनिवारिणि सकटनाशिनि पावय माम् ॥ अयि मधुरे मधुमोदविलासिनिं शैलविदारिणि वेगपरे परिजनपालिनि दुष्टनिषूदिनि वातिकामविलास धरे । व्रजपुरवासिजनार्जितपातकहारिणि विश्वजनोद्धरिके जय यमुने जय भीतिनिवारिणि सकटनाशिनि पावय माम् ॥ यमुनाष्टकम् । अतिविपदाम्बुधिमग्नजन भवतापशताकुलमानसक गतिमतिहीनमशेषभयाकुलमागतपाद सरोजयुगम् । ऋणभयभीतिमनिष्कृतिपातककोटिशतायुतपुञ्जतर ९९ जय यमुने जय भीतिनिवारिणी सकटनाशिनि पावय माम् ॥ नवजलदद्युतिकोटिलसत्तनुहेम भयाभरर जितके तडिदवहेलिपदाभ्वलचभ्वलशोभित पीतसुचेलघर । मणिमयभूषणचित्रपटासनर जितगञ्जितभानुकरे जय यमुने जय भीतिनिवारिणि सकटनाशिनि पावय माम् ॥ शुभपुलिने मधुमत्तयदूद्भवरासमहोत्सव केलिभरे उच्चकुलाचलराजितमौक्तिकहारमयाभररोदसिके । नवमणिकोटिक भास्करक चुकिशोभिततारकहारयुते जय यमुने जय भीतिनिवारिणि सकटनाशिनि पावय माम् ॥ करिवरमौक्तिक नासिकभूषणवातचमत्कृतच भ्चलके मुखकमलामलसौरभचभ्वलमत्त मधुव्रतलोचनिक । मणिगणकुण्डललोलपरिस्फुरदाकुलगण्डयुगामलके जय यमुने जय भीतिनिवारिणि सकटनाशिनि पावय माम् ॥ १०० यमुनाष्टकम् । कलरवनूपुर हेममयाचितपादसरोरुहसारुणिके धिमिधिमिधिमिधिमिताल विनोदितमानसम जुलपाद्गते । तव पदपङ्कजमाश्रितमानवचित्तसदाखिलतापहर जय यमुने जय भीतिनिवारिणि सकटनाशिनि पावय माम् ॥ भवोत्तापाम्भोधौ निपतितजनो दुर्गतियुता यदि स्तौति प्रात प्रतिदिनमनन्याश्रयतया । हयाद्वेषे काम करकुसुमपुले रविसुता सदा भोक्ता भोगान्मरणसमये याति हरिताम् ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचायस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ यमुनाष्टक सपूर्णम् ॥ 11 of 11 ॥ गङ्गाष्टकम् ॥ भगवति भवलीलामौलिमाल तवाम्भ कणमणुपरिमाण प्राणिनो य स्पृशन्ति । अमरनगर नारीचामरमाहिणीना विगतकलिकलङ्कातङ्कमक्के लुठन्ति ॥ १ ॥ ब्रह्माण्ड खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती स्वर्लोकादापतन्ती कनकगिरिगुहा गण्डशैला स्खलन्ती । क्षोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूनिर्भर भर्त्सयन्ती पाथोधि पूरयन्ती सुरनगर सरित्पावनी न पुनातु ॥२॥ मज्जन्मातङ्गकुम्भयुतमदमदिरामादमत्तालिजाल स्नानै सिद्धाङ्गनाना कुचयुगविगलत् कुङ्कुमा सङ्गपिङ्गम् । साथ प्रातर्मुनीना कुशकुसुमचयैश्छिन्नतीरस्थनीर पायानो गाङ्गमम्भ करिकरमकराक्रान्तरहस्त रङ्गम् ॥ पारस 10 380 प्रन्थालय, क उ ति शिवा सारनाथ, बारामती १०२ गङ्गाष्टकम् । आदावादिपितामहस्य नियमव्यापारपाते जल पश्चात्पन्नगशायिनो भगवत पादोदक पावनम् । भूय शभुजटाविभूषणमणिर्जहोर्महर्षेरिय कन्या कल्मषनाशिनी भगवती भागीरथी पातु माम् ॥ शैलन्द्रादवतारिणी निजजल मज्जज्जनोत्तारिणी पारावारविहारिणी भवभयश्रणीसमुत्सारिणी । शषाङ्गैरनुकारिणी हरशिरोवल्लीदलाकारिणी काशीप्रान्तविहारिणी विजयत गङ्गा मनोहारिणी ॥५॥ कुतो वीची वीचिस्तव यदि गता लोचनपथ त्वमापीता पीताम्बरपुर निवास वितरसि । त्वदुत्सङ्गे गङ्गे पतति यदि कायस्तनुभृता तदा मात शान्तक्रतवपदलाभाऽन्यतिलघु ॥ ६ ॥ भगवति तव तीरे नीरमात्राशनोऽह विगतविषयतृष्ण कृष्णमाराधयामि । सकलकलुषभङ्गे स्वर्गसोपानस के तरलतरतरङ्गे देवि गङ्गे प्रसीद ॥ ७ ॥ गङ्गाष्टकम् । मातर्जाह्नविशभुसङ्गमिलिते मौलौ निधायाञ्जलिं १०३ वीरे वपुषोऽवमानसमये नारायणाङ्घ्रिद्वयम । सानन्द स्मरतो भविष्यति मम प्राणप्रयाणोत्सवे भूयाद्भक्तिरविच्युता हरिहराद्वैतात्मिका शाश्वती ॥ ८ ॥ गङ्गाष्टकमिद पुण्य य पठेत्प्रयतो नर । सर्वपापविनिर्मुको विष्णुलोक स गच्छति ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमह सपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रामच्छकर भगवत कृतौ गङ्गाष्टक सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ मणिकर्णिकाष्टकम् ॥ त्वत्तीरे मणिकर्णिके हरिहरौ सायुज्य मुक्तिप्रदौ वादन्तौ कुरुत परस्परमुभौ जन्तो प्रयाणोत्सवे । मद्रूपो मनुजोऽयमस्तु हरिणा प्रोक्त शिवस्तत्क्षणा तन्मध्याद्भूगुलाञ्छनो गरुडग पीताम्बरो निगत ॥ इन्द्राद्यास्त्रिदशा पतन्ति नियत भोगक्षये ये पुन जयन्त मनुजास्ततोपि पशव कीटा पतङ्गादय । ये माणिकर्णिके तव जले मज्जन्ति निष्कल्मषा सायुज्य ऽपि किरीटकौस्तुभधरा नारायणा स्युनरा ॥ काशी धन्यतमा विमुक्तनगरी सालकृता गङ्गया तत्रेय मणिकर्णिका सुखकरी मुक्तिर्हि तत्किंकरी । स्वर्लोकतुलित सहैव विबुधै काश्या सम ब्रह्मणा काशी क्षोणितल स्थिता गुरुतरा स्वर्गे लघुत्व गत ॥ मणिकर्णिकाष्टकम् । १०५ गङ्गातीरमनुत्तम हि सकल तत्रापि काश्युत्तमा तस्या सा मणिकर्णिकोत्तमतमा यत्रेश्वरो मुक्तिद । देवानामपि दुर्लभ स्थलमिद पापौघनाशक्षम पूर्वोपार्जितपुण्यपुखगमक पुण्यैर्जनै प्राप्यते ॥ ४ ॥ दुखाम्भोधिगतो हि जन्तुनिवहस्तेषा कथ निष्कृति ज्ञात्वा तद्धि विरिञ्चिना विरचिता वाराणसी शर्मदा । लोका स्वगसुखास्ततोऽपि लघवो भोगान्तपातप्रदा काशी मुक्तिपुरी सदा शिवकरी धर्माथमोक्षप्रदा ॥ ५ ॥ एको वेणुधरो धराधरधर श्रीवत्सभूषाधर योsयेक किल शकरो विषधरो गङ्गाधरो माधव । ये मातर्मणिकर्णिके तव जले मज्जन्ति ते मानवा रुद्रा वा हरयो भवन्ति बहवस्तेषा बहुत्व कथम् ॥ ६ ॥ त्वत्तीरे मरण तु मङ्गलकर देवैरपि श्लाध्यते शक्रस्त मनुज सहस्रनयनैद्रष्टु सदा तत्पर । आयान्त सविता सहस्रकिरणै प्रत्युद्वतोऽभूत्सदा पुण्योऽसौ वृषगोऽथवा गरुडग किं मन्दिर यास्यति ॥ १०६ मणिकर्णिकाष्टकम् । मध्याह्ने मणिकर्णिकास्नपनज पुण्य न वक्तु क्षम स्वीयैरब्धशतैश्चतुर्मुखधरो वेदाथदीक्षागुरु । योगाभ्यासबलेन चन्द्रशिखरस्तत्पुण्य पारगत स्त्वन्त्तीरे प्रकराति सुप्तपुरुष नारायण वा शिवम् ॥ ८ ॥ कृच्छ्रे कोटिशतै स्वपापनिधन यश्चाश्वमेधै फल तत्सर्व मणिकर्णिका नपनजे पुण्ये प्रविष्ट भवेत् । स्नात्वा स्तोत्रमिद नर पठति चेत्ससारपाथोनिधिं ती पल्वलवत्प्रयाति सदन तेजोमय ब्रह्मण ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचायस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ मणिकर्णिकाष्टक सपूर्णम ॥ ॥ श्री ॥ ॥ निर्गुणमानसपूजा ॥ शिष्य उवाच- - अखण्डे सचिदानन्दे निर्विकल्पैकरूपिणि । स्थितेऽद्वितीयभावेऽपि कथ पूजा विधीयते ॥ १ ॥ पूर्णस्यावाहन कुत्र सर्वाधारस्य चासनम् । स्वच्छस्य पाद्यमर्घ्य च शुद्धस्याचमन कुत ॥ २ ॥ निर्मलस्य कुत स्नान वासो विश्वोदरस्य च । अगोत्रस्य त्ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम् ॥ ३॥ निर्लेपस्य कुता गन्ध पुष्प निर्वासनस्य च । निर्विशेषस्य का भूषा कोऽलकारो निराकृते ॥ ४ ॥ निरञ्जनस्य किं धूपैर्दीपैर्वा सर्वसाक्षिण निजानन्दैकतृप्तस्य नैवेद्य किं भवेदिह ॥ ५ ॥ विश्वानन्दयितुस्तस्य किं ताम्बूल प्रकल्पते । । स्वयप्रकाशविद्रूपा योऽसावर्कादिभासक ॥ ६ ॥ ૧૦૮ निर्गुणमानसपूजा । गीयते श्रुतिभिस्तस्य नीराजनविधि कुत । प्रदक्षिणमनन्तस्य प्रमाणोऽद्वयवस्तुन ॥ ७ ॥ वेदवाचामवेद्यस्य किं वा स्तोत्र विधीयते । अन्तर्बहि सस्थितस्योद्वासनविधि कुत ॥ ८ ॥ श्रीगुरुरुवाच --- आराधयामि मणिसनिभमात्मलिङ्ग मायापुरीहृदयपङ्कजसनिविष्टम । श्रद्धानदीविमलचित्तजलाभिषेकै नित्य समाधिकुसुमैरपुनर्भवाय ॥ ९ ॥ अयमेकोऽवशिष्टोऽस्मीत्येवमावाहयेच्छिवम् । आसन कल्पयेत्पश्चात्स्वप्रतिष्ठात्मचिन्तनम् ॥ १० ॥ पुण्यपापरज सङ्गो मम नास्तीति वेदनम् । पाद्य समर्पयेद्विद्वान्सव कल्मषनाशनम् ॥ ११ ॥ अनादिकल्प विधृतमूलाज्ञानजलाञ्जलिम् । विसृजेदात्मलिङ्गस्य तदेवासमर्पणम् ॥ १२ ॥ ब्रह्मानन्दाब्धिकलोलकणकोट्यशलेशकम् । पिबन्तीन्द्रादय इति ध्यानमाचमन मतम् ॥ १३ ॥ निर्गुणमानसपूजा । ब्रह्मानन्दजलेनैव लोका सर्वे परिता । अच्छेयोऽयमिति ध्यानमभिषचनमात्मन ॥ १४ ॥ १०९ निरावरणचैतन्य प्रकाशाऽस्मीति चिन्तनम । आत्मलिङ्गस्य सद्वत्रमित्येव चिन्तयेन्मुनि ॥ १५ ॥ त्रिगुणात्माशेषलोकमालिकासूत्रमस्म्यहम् । इति निश्चयमेवात्र ह्युपवीत पर मतम् ॥ १६ ॥ अनेकवासनामिश्रप्रपञ्चोऽय धृतो मया । नान्येनेत्यनुसंधानमात्मनश्चन्दन भवेत् ॥ १७ ॥ रज सत्त्वतमोवृत्तित्यागरूपैस्तिलाक्षतै । आत्मलिङ्ग यजेन्नित्य जीवन्मुक्तिप्रसिद्धये ॥ १८ ॥ ईश्वरो गुरुरात्मेति भेदत्रयविवर्जिते । बिल्वपत्रैरद्वितीयैरात्मलिङ्ग यजेच्छिवम् ॥ १९ ॥ समस्तवासनात्याग धूप तस्य विचिन्तयेत् । ज्योतिर्मयात्मविज्ञान दीप सदर्शयेद्बुध ॥ २० ॥ नैवेद्यमात्मलिङ्गस्य ब्रह्माण्डारय महोदनम् । पिबानन्दरस स्वादु मृत्युरस्यापसचनम् ॥ २१ ॥ ११० निगुणमानसपूजा । अज्ञानोच्छिष्टकरस्य क्षालन ज्ञानवारिणा । विशुद्धस्यात्मलिङ्गस्य हस्तप्रचालन म्मरेत ॥ २२ ॥ रागादिगुणशून्यस्य शिवस्य परमात्मन । सरागविषयाभ्यासत्यागस्ताम्बूलचवणम् ॥ २३ ॥ अज्ञानध्वान्तविध्वसप्रचण्डमतिभास्करम् । आत्मनो ब्रह्मताज्ञान नीराजनमिहात्मन ॥ २४ ॥ विविधब्रह्मसदृष्टिर्मालिकाभिरलङ्कृतम् । पूर्णानन्दात्मतादृष्टिं पुष्पाञ्जलिमनुस्मरेत् ॥ २५ ॥ परिभ्रमन्ति ब्रह्माण्डसहस्राणि मयीश्वरे । कूटस्थाचलरूपोऽहमिति ध्यान प्रदक्षिणम् ॥ २६ ॥ विश्ववन्द्योऽहमेवास्मि नास्ति वन्धो मदन्यत । इत्यालोचनमेवात्र स्वात्मलिङ्गस्य वन्दनम् ॥ २७ ॥ आत्मन सत्क्रिया प्रोक्ता कर्तव्याभावभावना । नामरूपव्यतीतात्मचिन्तन नामकीर्तनम् ॥ २८ ॥ श्रवण तस्य देवस्य श्रोतव्याभावचिन्तनम् । मनन त्वात्मलिङ्गस्य मन्तव्याभावचिन्तनम् ॥ २९ ॥ निर्गुणमानसपूजा । ध्यातव्याभावविज्ञान निदिध्यासनमात्मन । समस्त भ्रान्तिविक्षेपराहित्येनात्मनिष्ठता ॥ ३० ॥ समाधिरात्मनो नाम नान्यश्चित्तस्य विभ्रम । तत्रैव ब्रह्मणि सदा चित्तविश्रान्तिरिष्यते ॥ ३१ ॥ एव वेदान्तकल्पोक्तस्वात्मलिङ्गप्रपूजनम् । कुर्वना मरण वापि क्षण वा सुसमाहित ॥ ३२ ॥ सर्वदुर्वासनाजाल पदपासुमिव त्यजेत् । विधूयाज्ञानदु खौध मोक्षानन्द समश्नुते ॥ ३३ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचायस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छ्रकरभगवत कृतौ निगुणमानसपूजा सपूणो ॥ १११ ॥ श्री ॥ ॥ प्रातःस्मरणस्तोत्रम् ॥ प्रात स्मरामि हृदि सस्फुरदात्मतत्त्व सच्चित्सुख परमहसगतिं तुरीयम् । यस्तु प्रजागर सुषुप्तमवैति नित्य तद्ब्रह्म निष्कलमह न च भूतसङ्घ ॥ १ ॥ प्रतिभजामि मनसा वचसामगम्य वाचो विभान्ति निखिला यदनुग्रहेण । यत्रेति नेति वचनैर्निगमा अवोच स्त देवदेवमजमच्युतमाहुरग्र्यम् ॥ २ ॥ प्रातर्नमामि तमस परमर्कवर्ण पूर्ण सनातनपद पुरुषोत्तमारयम् । यस्मिन्निद जगदशेषमशेषमूर्ती रज्ज्वा भुजगम इव प्रतिभासित वै ॥ ३ ॥ प्रात स्मरणस्तोत्रम् । लोकत्रयमिद पुण्य लोकत्रयविभूषणम् । प्रात काले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परम पदम् ॥ ४ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकरभगवत कृतौ प्रात स्मरणस्तोत्र सपूर्णम् ॥ BSIT8 ११३ ॥ BIT: ॥ ॥ जगन्नाथाष्टकम् ॥ कदाचित् कालिन्दीतटविपिनसगीतकवरो मुदा गापीनारीवदनकमलास्वादमधुप । रमाशभुब्रह्मामरपतिगणशार्चितपदो जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामा भवतु मे ॥ १ ॥ भुजे सव्ये वेणु शिरसि शिखिपिञ्छ कटितटे दुकूल नेत्रान्त सहचरकटाक्ष विदधत् । सदा श्रीमद्वृन्दावनवसतिलीलापरिचयो जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ २ ॥ महाम्भोधेस्तीरे कनकरुचिर नीलशिखरे वसन्प्रासादान्त सहजबलभद्रेण बलिना । सुभद्रामध्यस्थ सकलसुर सेवावसरदो जगनाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ३ ॥ जगन्नाथाष्टकम् । ११५ कृपापारावार सजलजलद श्रेणिरुचिरो रमावाणी सोमस्फुरदमलपद्मोद्भवमुखै । सुरेन्द्रैराराध्य श्रुतिगणशिखागीतचरितो जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ४ ॥ रथारूढो गच्छन्पथि मिलित भूदेवपटलै स्तुतिप्रादुर्भाव प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदय । दयासिन्धुर्बन्धु सकलजगता सिन्धुसुतया जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे 11 4 11 परब्रह्मापीड कुवलयदलो फुल्लनयनो निवासी नीलाद्रौ निहितचरणोऽनन्तशिरसि । रसानन्दो राधासरसवपुरालिङ्गनसुखो जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ६ ॥ न वै प्रार्थ्य राज्य न च कनकता भोगविभवे न याचेऽह रम्या निखिलजनकाम्या वरवधूम् । सदा काले काले प्रमथपतिना गीतचरितो जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ७ ॥ ११६ जगन्नाथाष्टकम् । हर त्व ससार द्रुततरमसार सुरपते हर त्व पापाना विततिमपरा यादवपते । अहो दीनानाथ निहितमचल पातुमनिश जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ८ ॥ इति श्रीमत्परमह सपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्द भगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ जगन्नाथाष्टक सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ षट्पदीस्तोत्रम् ॥ अविनयमपनय विष्णो दमय मन शमय विषय मृगतृष्णाम् । भूतदया विस्तारय तारय ससारसागरत ॥ १ ॥ दिव्यधुनीमकरन्दे परिमलपरिभोगसच्चिदानन्द । श्रीपतिपदारविन्दे भवभयखेदच्छिदे वन्दे ॥ २ ॥ सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाह न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्ग कचन समुद्रो न तारङ्ग ॥ ३ ॥ ११८ षट्पदीस्तोत्रम् । उद्धतनग नगभिदनुज दनुजकुलामित्र मित्रशशिष्टष्ठे । टे भवति प्रभवति न भवति किं भवतिरस्कार ॥ ४ ॥ मत्स्यादिभिरवतारे- रवतारवतावता सदा वसुधाम् । परमेश्वर परिपाल्यो भवता भवतापभीतोऽहम् ॥ ५ ॥ दामोदर गुणमन्दिर सुन्दरवदनारविन्द गोविन्द । भवजलधिमथनमन्दर परम दरमपनय त्व मे ॥ ६ ॥ नारायण करुणामय शरण करवाणि तावकौ चरणौ 1 इति षट्पदी मदीये वदनसरोजे सदा वसतु ॥ ७ ॥ इति षट्पदीस्तोत्र सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ भ्रमराम्बाष्टकम् ॥ चावल्यारुणलोचनाश्चितकृपा चन्द्राकचूडामणि चारुस्मेरमुखा चराचरजगत्सरक्षणीं तत्पदाम् । चचचम्पकनासिकाप्रविलसन्मुक्तामणीरञ्जिता श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवती श्रीमातर भावये ॥ १ ॥ कस्तूरी तिलकाचितेन्दु विलसत्प्रोद्भासिफालस्थली कर्पूरद्रवमिश्रचूर्णखदिरामोदोल्लसद्वीटिकाम् । लोलापाङ्गतरङ्गितैरधिकृपासारैर्नतानन्दिनीं श्रीशैलस्थलवासिनी भगवत श्रीमातर भावये ॥ २ ॥ राजन्मत्तमरालमन्दगमना राजीवपत्रेक्षणा राजीवप्रभवादिदेवमकुटै राजत्पदाम्भोरुहाम् । राजीवायत मन्दमण्डितकुचा राजाधिराजेश्वरीं श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातर भावये ॥ ३ ॥ १२० भ्रमराम्बाष्टकम् । षट्तारा गणदीपिका शिवसती षडैरिवर्गापहा षट्चक्रान्तरसस्थिता वरसुधा षड्योगिनीवेष्टिताम् । षट्चक्राश्चितपादुकाञ्चितपदा षड्भावगा षोडशीं श्रीशैलस्थलवासिनी भगवती श्रीमातर भावये ॥ ४ ॥ श्रीनाथादृतपालितत्रिभुवना श्रीचक्रसचारिणीं ज्ञानासक्तमनोजयौवनलसगन्धर्व कन्यादृताम् । दीनानामतिवेलभाग्यजननीं दिव्याम्बरालकृता श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवती श्रीमातर भावये ॥ ५ ॥ लावण्याधिक भूषिताङ्गलतिका लाक्षालसद्रागिणीं सेवायात समस्त देववनिता सीमन्तभूषान्विताम् । भावोल्लासवशीकृतप्रियतमा भण्डासुरच्छेदिनी श्रीशैलस्थलवासिनी भगवती श्रीमातर भावये ॥ ६ ॥ धन्या सोमविभावनीयचरिता धाराधरश्यामला मुन्याराधनमेधिनी सुमवता मुक्तिप्रदानव्रताम् । कन्यापूजनसुप्रसन्नहृदया का चीलसन्मध्यमा श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातर भावये ॥ ७ ॥ भ्रमराम्बाष्टकम् । १२१ कर्पूरागरुकुङ्कुमाङ्कितकुचा कर्पूरवर्णस्थिता कृष्टोत्कृष्टसुकृष्टकमदहना कामेश्वरीं कामिनीम् । कामाक्षी करुणारसार्द्रहृदया कल्पान्तरस्थायिनीं श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातर भावये ॥ ८ ॥ गायत्री गरुडध्वजा गगनगा गान्धर्वगानप्रिया गम्भीरा गजगामिनीं गिरिसुता गन्धाक्षतालकृताम् । गङ्गा गौतम गर्गमनुतपदा गा गौतमी गोमतीं श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातर भावये ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रागोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छ्करभगवत कृतौ भ्रमराम्बाष्टकं सपूर्णम् ॥ 11 of 11 ॥ शिवपञ्चाक्षरनक्षत्रमालास्तोत्रम् ॥ श्रीमदात्मने गुणैकसिन्धवे नम शिवाय धामलेशधूतकोकबन्धवे नम शिवाय । नामशेषितानमद्भवान्धवे नम शिवाय पामरेतरप्रधानबन्धवे नम शिवाय ॥ १ ॥ कालभीतविप्रबालपाल ते नम शिवाय शूलभिन्न दुष्टदक्षफाल ते नम शिवाय । मूलकारणाय कालकाल ते नम शिवाय पालयाधुना दयालवाल ते नम शिवाय ॥ २ ॥ इष्टवस्तुमुख्यदानहेतवे नम शिवाय दुष्ट दैत्यवधूमकेतवे नम शिवाय । सृष्टिरक्षणाय धर्मसेतवे नम शिवाय अष्टमूर्तये वृषेन्द्रकेतवे नम शिवाय ॥ ३ ॥ शिवपञ्चाक्षरनक्षत्रमालास्तोत्रम् । १२३ आपदद्रिभेदहस्त ते नम शिवाय पापहारिदिव्यसिन्धुमस्त ते नम शिवाय । पापदारिणे लसन्नमस्ते नम शिवाय शापदोषखण्डनप्रशस्त ते नम शिवाय ॥ ४ ॥ व्योमकेश दिव्यभव्यरूप ते नम शिवाय हेममेदिनीधरेन्द्रचाप ते नम शिवाय । नाममात्रदग्ध सर्वपाप ते नम शिवाय कामनैकतानहृहुराप ते नमः शिवाय ॥ ५ ॥ ब्रह्ममस्तकावलीनिबद्ध ते नम शिवाय जिझगेन्द्र कुण्डलप्रसिद्ध ते नम शिवाय । ब्रह्मणे प्रणीतवेदपद्धते नम शिवाय जिंहकालदेहदत्तपद्धते नम शिवाय ॥ ६ ॥ कामनाशनाय शुद्धकर्मणे नम शिवाय सामगानजायमानशर्मणे नम शिवाय । हेमकान्तिश्चाकचक्यवर्मणे नम शिवाय सामजासुराङ्गलब्धचर्मणे नम शिवाय ॥ ७ ॥ १२४ शिवपञ्चाक्षरनक्षत्रमालास्तोत्रम् । जन्ममृत्युघोरदु खहारिणे नम शिवाय चिन्मयैकरूपदेद्दधारिणे नम शिवाय । मन्मनोरथावपूर्तिकारिणे नम शिवाय सन्मनोगताय कामनैरिणे नम शिवाय ॥ ८ ॥ यक्षराजबन्धवे दयालवे नम शिवाय दक्षपाणिशोभिकाञ्चनालवे नम शिवाय । पक्षिराजवाहहृच्छयालवे नम शिवाय अक्षिफाल वेदपूततालवे नम शिवाय ॥। ९ ॥ दक्षहस्तनिष्ठजातवेदसे नम शिवाय अक्षरात्मने नमद्विडौजसे नम शिवाय । दीक्षित प्रकाशितात्मतेजसे नम शिवाय उक्ष राजवाह ते सता गते नम शिवाय ॥ १० ॥ राजताचलेन्द्र सानुवासिने नम शिवाय राजमाननित्यमन्दहा सिने नम शिवाय । राजकोरकावतसभासिने नम शिवाय राजराजमित्रताप्रकाशिने नमः शिवाय ॥ ११ ॥ शिवपञ्चाक्षरनक्षत्रमालास्तोत्रम् । १२५ दीनमानवालिकामधेनवे नम शिवाय सूनबाणदाहकृत्कृशानवे नम शिवाय । स्वानुरागभक्तरत्नखानवे नम शिवाय दानवान्धकारचण्डभानवे नम शिवाय ॥ १२ ॥ सर्वमङ्गलाकुचाग्रशायिने नम शिवाय सवदेवतागणातिशायिन नम शिवाय पूर्वदेवनाशसविधायिने नम शिवाय सर्वमन्मनोजभङ्गदायिने नम शिवाय ॥ १३ ॥ स्तोकभक्तितोऽपि भक्तपोषिणे नम शिवाय माकरन्दसारवर्षिभाषिणे नम शिवाय । एकबिल्वदानतोऽपि तोषिणे नम शिवाय नैकजन्मपापजालशोषिणे नमः शिवाय ॥ १४ ॥ सर्व जीवरक्षणैकशीलिने नम शिवाय पार्वतीप्रियाय भक्तपालिने नम शिवाय । दुर्विदग्धदैत्यसैन्यदारिण नम शिवाय शर्वरीशधारिणे कपालिने नम शिवाय ॥। १५ ॥ १२६ शिवपञ्चाक्षरनक्षत्रमालास्तोत्रम् । पाहि मामुमामनोज्ञदेह ते नम शिवाय देहि मे वर सिताद्रिगेह ते नम शिवाय । मोहितfर्षकामिनीसमूह ते नम शिवाय स्वहितप्रसन्न कामदोह ते नम शिवाय ॥ १६ ॥ मङ्गलप्रदाय गोतुरग ते नम शिवाय गङ्गया तरङ्गितोत्तमाङ्ग ते नम शिवाय । सङ्गरप्रवृत्तवैरिभङ्ग त नम शिवाय अङ्गजारय करेकुरङ्ग त नम शिवाय ॥ १७ ॥ ईहितक्षणप्रदानहेतवे नम शिवाय आहिताग्निपालको केतने नम शिवाय । देहकान्तिधूत रौप्यधातवे नम शिवाय गेदु खधूमकेतवे नम शिवाय ॥ १८ ॥ त्र्यक्ष दीनसत्कृपाकटाक्ष ते नम शिवाय दक्षसप्ततन्तुनाशदक्ष ते नम शिवाय । ऋक्षराजभानुपावकाक्ष त नम शिवाय रक्ष मा प्रपन्नमात्ररक्ष ते नम शिवाय ॥ १९ ॥ शिवपञ्चाक्षरनक्षत्रमालास्तोत्रम् । न्यङ्कपाणये शिवराय ते नम शिवाय सकटाव्धितीर्ण किंकराय ते नम शिवाय । पङ्कभीषिताभयकराय ते नम शिवाय १२७ पङ्कजाननाय शकराय ते नम शिवाय ॥ २० ॥ कर्मपाशनाश नीलकण्ठ ते नम शिवाय शर्मदाय नर्यभस्मकण्ठ ते नम शिवाय । निर्ममर्षिसेवितोपकण्ठ ते नम शिवाय कुर्महे नतीर्नमद्विकुण्ठ ते नम शिवाय ॥ २१ ॥ विष्टपाधिपाय नम्रविष्णवे नम शिवाय शिष्टविप्रहृदुहाचरिष्णवे नम शिवाय । इष्टवस्तुनित्यतुष्ट जिष्णवे नम शिवाय कष्टनाशनाय लोकजिष्णवे नम शिवाय ॥ २२ ॥ अप्रमेयदिव्यसुप्रभाव ते नम शिवाय सत्प्रपन्नरक्षणस्वभाव ते नम शिवाय । स्वप्रकाश निस्तुलानुभाव ते नम शिवाय विप्रडिम्भदर्शितार्द्रभाव ते नम शिवाय ॥ २३ ॥ १२८ शिवपञ्चाक्षरनक्षत्रमालास्तोत्रम् । सेवकाय मे मृड प्रसीद ते नम शिवाय भावलभ्य तावकप्रसाद ते नम शिवाय । पावकाक्ष देवपूज्यपाद ते नम शिवाय तावकाभितदुत्तमोद ते नमः शिवाय ॥ २४ ॥ भुक्तिमुक्तिदिव्य भोगदायिने नमः शिवाय शक्तिकल्पितप्रपञ्चभागिने नमः शिवाय । भक्तसकटापहारयोगिने नम शिवाय युक्तसन्मन सरोजयोगिने नम शिवाय ॥ २५ ॥ अन्तकान्तकाय पापहारिण नम शिवाय शान्तमायदन्तिवर्मधारिणे नमः शिवाय । सतताश्रितव्यथाविदारिणे नम शिवाय जन्तुजात नित्य सौख्य कारिणे नम शिवाय ॥ २६ ॥ शूलिने नमो नम कपालिने नम शिवाय पालिने विरिवितुण्डमालिने नम शिवाय । लीलिने विशेषरुण्डमालिने नम शिवाय शीलिने नम प्रपुण्यशालिने नम शिवाय ॥ २७ ॥ शिवपञ्चाक्षरनक्षत्रमालास्तोत्रम् । १२९ शिवपञ्चाक्षरमुद्रा चतुष्पदोल्लासपद्यमणिघटिताम् । नक्षत्रमालिका मिह दधदुपकण्ठ नरो भवेत्सोम ॥ २८ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचायस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छ करभगवत कृतौ शिवपञ्चाक्षरनक्षत्रमालास्तोत सपूर्णम् ॥ * 8 11 9 ॥ 87 ॥ ॥ द्वादशलिङ्गस्तोत्रम् ॥ सौराष्ट्रदेशे वसुधावकाशे ज्योतिमय चन्द्रकलावतसम् । भक्तिप्रदानाय कृतावतार त सोमनाथ शरण प्रपद्ये ॥ १ ॥ श्रीशैलशृङ्ग विविधप्रसङ्गे शेषाद्रिशृङ्गेऽपि सदा वसन्तम् । तमर्जुन मल्लिक पूर्वमेन नमामि ससारसमुद्र सेतुम् ॥ २ ॥ अवन्तिकाया विहितावतार मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् । अकालमृत्यो परिरक्षणार्थ वन्दे महाकालमह सुरेशम् ॥ ३ ॥ द्वादश लिङ्गस्तोत्रम् । कावेरिकानर्मदयो पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय । सदैव मान्धातृपुरे वसन्त मोंकारमीश शिवमेकमीढे ॥ ४ ॥ पूर्वोत्तरे पालिकाभिधाने सदाशिव त गिरिजासमेतम् सुरासुराराधितपादपद्म श्रीवैद्यनाथ सतत नमामि ॥ ५ ॥ आमसज्ञे नगरे च रम्ये विभूषिताङ्ग विविधैश्व भोगे । सद्भुक्तिमुक्तिप्रदमीशमेक 1 श्रीनागनाथ शरण प्रपद्ये ॥ ६ ॥ सानन्दमानन्दवने वसन्त मानन्दकन्द हर्तपापवृन्दम् । वाराणसीनाथमनाथनाथ श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपये ज १११ १३२ द्वादशलिङ्गस्तोत्रम् । यो डाकिनीशा किनिकासमाजे निषेव्यमाण पिशिताशनैश्च । सदैव भीमादिपदप्रसिद्ध त शकर भक्तहित नमामि ॥ ८ ॥ श्री ताम्रपर्णीजलराशियोगे निबद्ध सेतु निशि बिल्वपत्रै । श्रीरामचन्द्रेण समर्चित त रामेश्वराख्य सतत नमामि ॥ ९ ॥ सिंहाद्रिपार्श्वेऽपि तट रमन्त गोदावरीतीर पवित्रदेशे । यद्दर्शनात्पातकजातनाश प्रजायते त्र्यम्बकमीशमीडे ॥ १० ॥ हिमाद्रिपार्श्वेऽपि तटे रमन्त सपूज्यमान सतत मुनीन्द्रे । सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यै केदारसज्ञ शिवमीशमीडे ॥ ११ ॥ द्वादशलिङ्गस्तोत्रम् । १३३ एलापुरीरम्यशिवालयेऽस्मि समुल्लसन्त त्रिजगद्वरेण्यम् । वन्दे महोदारतरस्वभाव सदाशिव त विषणेश्वराख्यम् ॥ १२ ॥ एतानि लिङ्गानि सदैव मर्त्या प्रात पठन्तोऽमलमानसाश्च । ते पुत्रपौत्रैश्च धनैरुदारै सत्कीर्तिभाज सुखिनो भवन्ति ॥ १३ ॥ इति श्रीमत्परमह सपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्द भगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छ करभगवत कृतौ द्वादशलिङ्गस्तोत्र सपूर्णम् । ॥ श्री ॥ ॥ अर्धनारीश्वरस्तोत्रम् ॥ चाम्पेयगौरार्धशरीरकायै कर्पूरगौराधशरीरकाय । धम्मिल्लकायै च जटाधराय नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥। १ ॥ कस्तूरिकाकुङ्कुम चर्चितायै चितारज पुलविचर्चिताय । कृतस्मरायै विकृतस्मराय नम शिवायै च नम शिवाय ॥ २ ॥ झणत्कणत्कङ्कणनूपुरायै पादाब्जराजत्फणिनू पुराय । हेमाङ्गदायै भुजगाङ्गदाय नम शिवायै च नमः शिवाय ॥ ३ ॥ अर्धनारीश्वरस्तोत्रम् । विशालनीलोत्पललोचनायै विका सिपङ्केरुहलोचनाय । समेक्षणायै विषमेक्षणाय नम शिवायै च नमः शिवाय ॥ ४ ॥ मन्दारमालाकलितालकायै कपालमालाङ्कितकन्धराय । दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम शिवायै च नमः शिवाय ॥ ५ ॥ अम्भोधरश्यामलकुन्तलायै तटित्प्रभाताम्रजटाधराय । निरीश्वरायै निखिलेश्वराय नम शिवायै च नमः शिवाय ॥ ६ ॥ प्रपश्वसृष्ट्युन्मुखलास्य कायै समस्त सहारकताण्डवाय । जगज्जनन्यै जगदेकपित्रे नम शिवायै च नम शिवाय ॥ ७ ॥ १३५ १३६ अर्धनारीश्वरस्तोत्रम् । प्रदीप्तरत्नोज्ज्वलकुण्डलायै स्फुरन्महापन्नगभूषणाय । शिवान्वितायै च शिवान्विताय नम शिवायै च नमः शिवाय ॥ ८ ॥ एतत्पठेदष्ठकमिष्टद या भक्त्या स मान्यो भुवि दीर्घजीवी । प्राप्नोति सौभाग्यमनन्तकाल भूयात्सदा तस्य समस्त सिद्धि ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्द भगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छ करभगवत कृतौ अर्धनारीश्वरस्तोत्रम् सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ " शारदा भुजंगप्रयाताष्टकम् ॥ ___+2+88**%88+--- सुवक्षोजकुम्भा सुधापूर्णकुम्भा प्रसादावलम्बा प्रपुण्यावलम्बाम् । सदास्येन्दुबिम्ब सदानोष्ठबिम्बा भजे शारदाम्बामजस्र मदम्बाम् ॥ १ ॥ कटाक्षे दयाद्री करे ज्ञानमुद्रा कलाभिर्विनिद्रा कलापै सुभद्राम् । पुरस्त्रीं विनिद्रा पुरस्तुङ्गभद्रा भजे शारदाम्बामजस्र मदम्बाम् ॥ २ । ललामाङ्कफाला लसद्गानलोला स्वभक्तैकपाला यश श्रीकपोलाम् । करे त्वक्षमाला कनत्प्रत्नलोला भजे शारदाम्बामजस्र मदम्बाम् ॥ ३ ॥ १३८ शारदाभुजगप्रयाताष्टकम् । सुसीमन्तवेण दृशा निर्जितैणीं रमत्कीरवाणीं नमद्वज्रपाणीम् । सुधामन्थरास्या मुदा चिन्त्यवेणीं भजे शारदाम्बामजस्र मदम्बाम् ॥ ४ ॥ सुशान्ता सुदेहा हगन्ते कचान्ता लसत्सल्लताङ्गीमनन्तामचिन्त्याम् । स्मरेत्तापसे सङ्गपूर्वस्थिता ता भजे शारदाम्बामजस्र मदम्बाम् ॥ ५ ॥ कुरने तुरगे मृगेन्द्रे खगेन्द्रे मराले मद्रेभे महोक्षेऽधिरूढाम् । महत्या नवम्या सदा सामरूपा भजे शारदाम्बामजस्र मदम्बाम् ॥ ६ ॥ ज्वलत्कान्तिवहिं जगन्मोहनाङ्गी भजे मानसाम्भोजसुभ्रान्तभृङ्गीम् । निजस्तोत्रसगीतनृत्यप्रभाङ्गीं भजे शारदाम्बामजस्र मदम्बाम् ॥ ७ ॥ शारदा भुजगप्रयाताष्टकम् । भवाम्भोजनेत्राजस पूज्यमाना लसन्मन्दहासप्रभावक्त्रचिह्नाम् । चलचभ्वलाचारुताटङ्कुकर्णी भजे शारदाम्बामजस्र मदम्बाम् ॥ ८ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्य॑स्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ शारदाभुजगप्रयाताष्टक सपूर्णम् ॥ १३९ ॥ श्री ॥ ॥ गुर्वष्टकम् ॥ शरीर सुरूप तथा वा कलन यशश्चारु चित्र धन मेरुतुल्यम् । मनश्चेन्न लग्न गुरोरङ्घ्रिपद्म तत किं तत किं तत किं तत किम् ॥ १ ॥ कलत्र धन पुत्रपौत्रादि सर्व गृह बान्धवा सर्वमेतद्धि जातम् । मनश्चेन्न लग्न गुरोरङ्घ्रिपद्ये तत किं तत किं तत किं तत किम् ॥ २ ॥ षडङ्गादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या कवित्वादि गद्य सुपद्य करोति । मनश्चेन्न लग्न गुरोरङ्घ्रिपद्मे तस किं तत किं तत किं तत किम् ॥ ३ ॥ गुर्वष्टकम् । विदेशेषु मान्य स्वदेशेषु धन्य सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्य । मनश्चेन्न लग्न गुरोरङ्घ्रिपद्म तत किं तत किं तत किं तत किम् ॥ ४ ॥ क्षमामण्डले भूपभूपालवृन्दै सदा सेवित यस्य पादारविन्दम् । मनश्चेन्न लग्न गुरोरङ्घ्रिपद्मे तत किं तत किं तत किं तत किम् ॥ ५ ॥ यशो मे गत दिक्षु दानप्रतापा ज्जगद्वस्तु सर्व करे यत्प्रसादात् । मनश्चेन्न लग्न गुरोरङ्घ्रिपद्मे १४१ तत किं तत किं तत किं तत किम् ॥ ६॥ न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ न कान्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम् । मनश्चेन्न लग्न गुरोरङ्घ्रिपद्ये तत किं तत किं तत किं तत किम् ॥ ७ ॥ १४२ गुर्वष्टकम् । अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्थे । मनश्चेन्न लग्न गुरोरङ्घ्रिपद्मे तत किं तत किं तत किं तत किम् ॥ ८ ॥ गुरोरटक य पठेत्पुण्यदेही यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही । लभेद्वाञ्छितार्थ पद ब्रह्मसज्ञ गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम् ॥ ९ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोवि दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकरभगवत कृतौ गुर्वष्टक सपूर्णम् ॥ ॥ श्री ॥ ॥ काशीपञ्चकम् ॥ मनो निवृत्ति परमोपशान्ति सा तीर्थवर्या मणिकर्णिका च । ज्ञानप्रवाहा विमलादिगङ्गा सा काशिकाह निजबोधरूपा ॥ १ ॥ यस्यामिद कल्पितमिन्द्रजाल चराचर भावि मनोविलासम् । सच्चित्सुखैका परमात्मरूपा सा काशिकाह निजबोधरूपा ॥ २ ॥ कोशेषु पश्वस्वधिराजमाना बुद्धिर्भवानी प्रतिदेह गेहम् । साक्षी शिव सर्वगतोऽन्तरात्मा ar काशिकाह निजबोधरूपा ॥ ३ ॥ १४४ काशीपञ्चकम् । काश्या हि काशत काशी काशी सर्वप्रकाशिका । सा काशी विदिता येन तेन प्राप्ता हि काशिका ॥ ४ ॥ -काशीक्षेत्र शरीर त्रिभुवनजननी व्यापिनी ज्ञानगङ्गा भक्ति श्रद्धा गयेय निजगुरुचरणध्यानयोग प्रयाग । विश्वेशोऽय तुरीय सकलजनमन साक्षिभूतोऽन्तरात्मा देहे सर्व मदीये यदि वसति पुनस्तीर्थमन्यत्किमस्ति ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकर भगवत कृतौ काशीपश्वक संपूर्णम् ॥ श्लोकानुक्रमणिका 5 4 11 10 ॥ श्रीः ॥ ॥ श्लोकानुक्रमणिका ॥ पृष्ठम् पृष्ठम् अ अनादिकल्प ૧૦૮ अखण्डे सच्चिदान दे १०७ अनेकवासनामिश्र १०९ अगौरने ८७ अतका तकाय १२८ अग्रे वह्नि ६६ अधस्य मे हृतविवेक १६ अङ्ग गलित ६५ अन्नपूर्ण सदापूर्णे ७७ अङ्ग हरे पुलक ७० अपारकारुण्य ८५ अच्युत केशव राम ३९ अप्रमेयदि य १२७ अच्युत केशव सत्य ३९ अम्भोधरश्यामल १३५ अच्युतस्याष्टक य ४१ अयमेकोऽवशिष्टो १०८ अज रुक्मिणीप्राण ३८ अयि मधुरे ९८ अज्ञानध्वान्त ११ अरण्ये न वा स्वस्य १४२ अज्ञानोच्छिष्टकरस्य ११० अर्थमनर्थ ६९ अट्टहासभिन्न ९० अलक्षलक्ष ९३ अतिविपदाम्बुधि ९९ अलक्ष्यलक्ष ९३ अद्राक्षमक्षीण ૪ अवन्तिकाया १४८ कानुक्रमणिका । पृष्ठम् पृष्ठम् अविनयमपनय अवीरासनस्थै ० अन्यानिर्घात after gaiyo असीतासमेत ० असूनायम्यादौ अहो धृत खन आ ११७ आहुयस्य स्वरूप २२ इ २२ इद तु नमदाष्टक ९४ ० ९ इद्रायास्त्रिदशा १०४ इष्टवस्तुमुरय १२२ ४२ इष्टाविशिष्टमतयो ० ७२ ९४ ईश्वरो गुरुरात्मेति १०९ आकृतिसाम्याच्छाल्म ० ११ हितक्षण प्रदान १२६ आक्रामद्भया त्रिलोकी २५ आचार्येभ्यो लब्ध ४६ उद्धृतनग ११८ आत्मन सत्क्रिया ११० उद्यद्भानुसहस्र ७९ आदावादिपितामहस्य १०२ उन्नम्र कम्रमु० २७ आदिक्षान्त ७६ उपासकाना त्व० ८८ आदौ कल्पस्य २८ उपासकाना य० ८४ आपदद्रिभेद १२३ उपासते य ८७ आपादादा च शीर्षात् ३४ उर्वी सर्वजनेश्वरी ७६ आमर्दस १३१ आमीलिताक्ष• ७१ एकीकृत्यानेक ५२ आराधयामि १०८ एकेन चक्रमपरेण १६ आलेपवन्त ८६ एकेन मुद्रा ८६ श्लोकानुक्रमणिका । १४९ पृष्ठम् पृष्ठम् एको वेणुधरो एतत्पठेदष्टमिष्टद १०५ कलाभिरिदो ० ८५ १३६ कस्तूरिकाकुङ्कुम १३४ एतत्पवनसुतस्य २ कस्तूरी तिलका ० ११९ एतानि लिङ्गानि १३३ कस्त्व कोsह ૬ एलापुरीरम्य १३३ का ते कान्ता क० ૪ एव वेदान्त • १११ का ते काताच • ६५. कात कारणकारण ५७ ओत प्रोत ५४ कात वक्षो नितान्त २९ क कान्त्यम्भ पूरपूर्णे २८ कटाक्षे दयार्द्रा १३७ कान्त्या निदित ८७ कण्ठाकल्पोद्रतैर्य ३० काम क्रोध ઢ ११४ कामनाशनाय १२३ कफव्याइतोष्ण २१ कालभीतविप्र १२२ कमले कमलाक्ष ७४ कालभैरवाष्टक ९१ कम्राकारा २३ कालाम्बुदालिललितो • ७१ करवर मौक्तिक ९९ कावेरिकानर्मदयो १३१ कर्णस्थस्वर्णको ३१ काशीक्षेत्र शरीर १४४ कर्पूरागरुकुङ्कुमा • १२१ काशी धन्यतमा १०४ कर्मपाशनाश १२७ काश्या हि काशते १४४ कलत्र धन १४० किरीटोज्ज्वलत्सर्व ३७ कलरवनूपुर १०० कुञ्चितै कुन्तलै ૪૧ १५० श्लोकानुक्रमणिका । पृष्ठम् पृष्ठम् कुतो वीची १०२ मधवामर ८२ कुरङ्गे तुरंगे १३८ गायत्री गरुडध्वजा १२१ कुरुते गङ्गा ६६ गायते श्रुतिभि १०८ कृच्छ्रे कोटिशतै १०६ गीर्देवतति ७२ कृपापारावार ११५ गुरुचरणाम्बुज ६९ कृपापारावारा ९८ गुरोरष्टक य १४२ कृष्ण गोविन्द ४० गेय गीतानाम ६८ कैलासाचल ७६ गोपाल प्रभुलाला ५७ कोटीराङ्गदरत्न ८१ गोपीमण्डलगोष्ठी ५७ कोsय देहे देव ५३ गोवि दाष्टकमेतत् ५८ कोशानेता पश्च ५० कोशेषु पञ्चस्वधि० १४३ चक्रस्थेऽचपले ८१ को वायादात्मनि ५३ चद्रार्कानल ७७ चाञ्चल्यारुण ११९ क्षत्रत्राणकरी ७७ १३४ क्षमामण्डले १४१ चारुस्थित सोम ८६ क्षेत्रज्ञत्व प्राप्य ५१ चिदशे विभु १८ ग गङ्गातीरमनुत्तम १०५ जटिली मुण्डी ६५ गङ्गाष्टकमिद पुण्य १०३ जन्ममृत्युघोर १२४ तदैव ९३. जरेय पिशाचीव २० श्लोकानुक्रमणिका । १५१ पृष्ठम् पृष्ठम् जलच्युताच्युता • ९६ त्वदम्बुलीन ९२ जलान्तकेलि ९६ त्वमाचामोपेन्द्र ५९ जाग्रद्दृष्ट्वा स्थूल ४९ त्वमेवासि दैव पर जीमूतश्यामभासा २३ त्वयि मयि चा० ज्वलत्कान्तिवह्निं १३८ द ७२ झणत्वणत्कङ्कण १३४ दशग्रीवमुग्र ८ दशाङ्ग धूप ६० तद्विर्णे वस्त्रे ६० दक्षहस्तनिष्ठ १२४ तटद्वासस नील ३६ दामोदर गुणमन्दिर ११८ तत्त्वार्थम तेवस • ८६ दिक्कालो वेदयती ३२ तरङ्गसङ्ग ९६ दिध्वस्तिभि ७४ तरुणारुणमुखकमल १ दिनयामियौ ६५ तव हितमेक वचन १२ दियधुनीमकरद ११७ तावत्सव सत्य ५५ दीनमानवालि ० १२५ त्रिगुणात्माशेष १०९ दुखाम्भोधिगतो १०५ त्रैविष्टपरिपुवीरघ्न ५६ दूरीकृतसीतार्ति २ यक्ष दीनसत्कृपा ० १२६ दृश्यादृश्य० ७६ त्वत्तीरे मणिकर्णिके १०४ दृष्टा गीतास्वक्षरतत्व ५१ त्वत्तीरे मरण १०५ देवराज से यमान ८९ स्वत्प्रभुजीवप्रिय० ११ देवी सर्वविचित्र ७७ १५२ श्लोकानुक्रमणिका । पृष्ठम् पृष्ठम् देवो भीतिं विधातु २७ नादे नारद• ८२ दैवतानि कति ८७ नानायोगिनी द्र ८० द्वद्वैकत्व यच्च ५२ नानारत्नविचित्र ७५ ध नाभीनालीकमूलात् २८ धन्या सोमविभावनीय १२० नारायण करुणामय ११८ धर्मसेतुपालक ९० नारीस्तनभर ६२ धेनुकारिष्टहा ० ૪. नाह प्राणो नैव ५४ ध्यात याभाव १११ निजे मानसे मन्दिरे न नित्य स्नेहातिरेकात् ३१ न भीगे न योगे १४१ नित्यान दकरी ७५ नम सच्चिदानन्द ६ निरञ्जनस्य किं १०७ नमस्कारोsarr ६१ निरावरणचैतय १०९ नमस्ते नमस्ते ६ निर्मलस्य कुत १०७ नमस्ते सुमित्रा सुपुत्रा • ९ निर्लेपस्य कुतो १०७ नमो भक्तियुक्तानुरक्ताय ६ नैवेद्यमात्मलिङ्गस्य १०९ नमो विश्वक ६ न्यङ्कुपाणये १२७ नमोsस्तु नालीक ७३ प ४३ पद्मान प्रदाता ३० नलिनीदलगत ६३ पयोम्भोधेद्वीपात् ५९ नवजलदद्युति ९९ परब्रह्मापीड ११५ न वै प्रार्थ्य ११५ परिभ्रमन्ति ब्रह्मा० ११० श्लोकानुक्रमणिका । १५३ पृष्ठम् पृष्ठम् पवित्र चरित्र पश्यशुद्धोऽप्यक्षर ७ प्रह्लादनारदपराशर १७ पश्यशृण्वन्नत्र पातात्पातालपातात् ४८ ४९ प्राणानायम्यो मिति प्राणायाम ४६ ६९ ३२ प्राणो वाह वाक् ५३ पाताल यस्य नाल २८ प्रात स्मरामि ११२ पादाम्भोज मसेवा २६ प्रातर्नमामि ११२ पायाद्भक्त स्वात्मनि ५५ प्रातर्भजामि ११२ पाहि मामुमामनोज्ञ १२६ प्राप्त पद प्रथमत ७१ पीठीभूतालकान्त ३३ ब पीतेन द्योतते २७ बद्धा गले यमभटा १६ पुण्यपापरज सो १०८ बालस्तावत् ६३ पुनरपि जनन ६७ बाह्र तरे मधुजित ७१ पुर प्राञ्जलीनाञ्जनेया० ૪ बुदवनभुव ५८ पूर्णस्यावाहन १०७ ब्रह्म ब्रह्मण्यजिह्मा ३१ पूर्वोत्तरे पालिका ० १३१ ब्रह्ममस्तकावली १२३ पृथिया तिष्ठयो ४३ ब्रह्माण्ड खण्डयन्ती १०१ प्रचण्डप्रतापप्रभावा ० ७ ब्रह्मा दजलेनैव १०९ प्रदीप्तरत्नोज्ज्वल १३६ ब्रह्मान दाब्धि १०८ प्रपञ्चसृष्टद्युन्मुख १३५ ब्रह्मा विष्णू रुद्र ४९ प्रमाण भवाब्धे ० ३६ ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदक १३ प्रसीद प्रसीद प्रचण्ड १० ब्रह्मेशाच्युत ૨ १५४४ लोकानुक्रमणिका । पृष्ठम् पृष्ठम् मध्याह्ने मणि० १०६ भगवति तव १०२ मनोनिवृत्ति १४३ भगवति भवलीला १०१ मदारमाला १३५ भगवद्गाता ६७ ममाद्यदेवो ८५ भज गोविद ६२ मलापहारि ९५ भवाम्भोजनेत्रा ० १३९ महागभीर ९२ १०० महाम्भोधेस्तीरे ११४ भानुकोटिभास्वर ८९ महायोगपीठे तटे ३६ भुक्तिमुक्तिदायक ९० महायोगपीठ परि० १८ भुक्तिमुक्तिदिय ११८ महारक्षपीठ ४ भुजगप्रयात पठ● २१ महेद्रादिदेवो ४३ भुजगप्रयात पर १० मा कुरु धनजन ६४ भुजये वेणु ११४ मातर्जाह्नवि १०३ भूतसङ्घनायक ९ १ माता च पार्वती ७८ भूत्वा भूत्वा यदन्त ० ३४ मात्रातीत स्वात्म० ४७ मालालीवालिधान ३३ मङ्गलप्रदाय १२६ मुक्ताहारलसत्कि ० ७९ मजन्मातङ्ग १०१ मुग्धा मुहुर्विदधती ७० मत्स्य कूर्मों वराहो ३४ मुदिताय मुग्ध ० ८८ मत्स्यादिभिरवतारै ११८ मुरारिकाय कालिमा ९५ मधुवनचारिणि ९८ मूढ जहाहि ६२ श्लोकानुक्रमणिका । १५५ पृष्ठम् पृष्ठम् मूर्तीमूत पूर्व० ५४ यस्यात स्वात्म ० ५१ मृत्स्नाम सीत मोदात्पादादिकेश य ब्रह्मारय य विज्ञानज्योतिष ५६ यस्या दाम्ना २७ ३५ यस्यामिद कल्पित ० १४३ यस्यैकाशादित्थ० ४५ ૪૬ यावत्पवनो ६३ ५५ यावद्वित्तोपार्जन • ૬૨ यक्ष राजबध १२४ या वायावानुकूल्यात् २९ यत सर्व जात ४२ या सूते सत्त्वजाल २४ यत्कटाक्षसमुपासना ० ७३ युक्त्यालोड्य व्यास ५२ यत्र प्रत्युत्तरत्न ३३ येनाविष्टा यस्य ५० यदा घमग्लानि ૪૪ येभ्यो वर्णश्वतुर्थ २५ यदा मत्समीप ५ येभ्योऽसूयद्भिरुचै २४ यदावणय कर्णमूले ३ योगरतो वा ६६ यद्यद्वेद्य तत्तदह ४७ योगान करी ७५ यद्यद्वेद्य वस्तु ४७ यो डाकिनीशाकिनि ० १३२ यशो मे गत १४१ योऽय देहे चेष्टयिता ० ५२ यस्ते प्रसन्ना ८८ यो विश्वप्राणभूत • २३ यस्माद यन्नास्त्यपि ४६ र यस्मादाक्रामतो द्या २५ रज सवतमो० १०९ यस्माद्वाचो निवृत्ता ३४ रत्नपादुकाप्रभा० ९० यस्या दृष्ट्वामलाया २६ रथारूढो ११५ १५६ श्लोकानुक्रमणिका । पृष्ठम् पृष्ठम् ६७ वयसि गते ૬૪ रागादिगुणशून्यस्य ११० वाग्भूगौर्यादिभेदै ૨૪ रागामुक्त ५५ वानरनिकराध्यक्ष राजताचन्द्र १२४ विजातीयै पुष्पै ६१ राजन्मत्तमराल ११९ विज्ञानाशो यस्य ५३ राक्षसक्षोभित रुक्षस्मारेक्षुचाप रेखा लेखादिवद्या ल लक्ष्माकारालकालि० ૪૦ विदेशेषु मान्य १४१ ३२ विद्युदुद्योतवत्प्र० ४० २४ विद्राविताशेष ૪ विना यस्य ध्यान ४३ ३२ विभु वेणुनाद ३७ लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्ज १७ विविधब्रह्म ११० लक्ष्मीपते कमलनाथ १६ विशालनीलोत्पल १३५ लक्ष्मी भर्तुर्भुजा २२ विशुद्ध पर सच्चिदा• ३ लपन्नच्युतानन्त २१ विशुद्ध शिव १८ referenc ४ विश्वत्राणैकदीक्षा ० ३० लसत्कुण्डलामृष्ट १९ विश्ववन्द्योऽह ० ११० लसत्तरङ्ग ९५ विश्वानन्दयितु १०७ ललामाङ्कफाला १३७ विश्वामरेद्र ७० oraण्याधिक १२० विष्णवे जिष्णवे ३९ व विष्णो पादद्वयात्रे २५ वक्राम्भोजे लसत ३१ विष्णोर्वश्वश्वरस्य २३ लोकानुक्रमणिका । १५७ पृष्ठम् पृष्ठम् विष्ठपाधिपाय १२७ शूलिने नमो नम १२८ विहारसखेद १६ शैलेद्रादवतारिणी १०२ वीणानादनिमीलिता ० ८२ श्रद्धाभक्तिध्यान ५१ वीताखिलविषयेच्छ १ श्रवण तस्य देवस्य ११० १०८ श्रिया शातकुम्भद्युति २० वेदातैश्चाध्यात्मिक ५० श्रियाश्लिष्ट विष्णु ૪૧ व्यालम्बिनीभि ८८ श्री ताम्रपर्णी १३२ व्योमकेश दिव्य १२३ श्रीनाथाहत १२० श श्रीमत्पयोनिधिनिकेतन १३ शत्रौ मित्रे ६८ श्रीमत्यौ चारुवृत्ते २६ शब्दब्रह्ममयी ८३ श्रीमत्सुदरनायकीं ८० शम्बरवैरिशरातिग ० १ श्रीमदात्मने १२२ शरश्च द्रबिम्बानन ३७ श्रीविद्या शिववाम ० O ७९ शरीर कलत्र २० श्रीविद्य शिववाम ० ८१ शरीर सुरूप १४० श्रीशैलशृङ्गे १३० शिलापि त्वदङ्घ्रिक्षमा ७ श्रुत्यै नमोऽस्तु ७२ शिव नित्यमेक ३ श्लोकत्रयमिद ११३ शिवपञ्चाक्षरमुद्रा १२९ ष शुक्तौ रजतप्रतिमा ११ तारा गणदीपिका १२. शुभपुलिने ९९ षडङ्गादिवेदो १० शूलटङ्कपाश ८९ १५८ श्लोकानुक्रमणिका । पृष्ठम् पृष्ठम् सप कराणि सकले ० ७३ सदा से य कृष्ण ६१ सभूयाम्भोधिमध्यात् सदैव नन्दिन द० ९७ ससारकूपमतिघोर १४ सनत्कुमार ९३ ससारघोर गहने १५ स पुण्य स गण्य ७ ससारजाल पतितस्य १४ सबि ९२ ससारदावदहना ० १३ समस्तवासनात्याग १०९ ससारभीकरकरी द्र १४ समाधिरात्मनो १११ संसारवृक्षमखबीज १५ समानोदितानेक १९ ससारसर्पविषदिग्ध १४ सम्यक्साह्य २६ ससारसागर निमज्जन १५ सरसिजनिलये ७३ संसारसागर विशाल १५ सव दृष्ट्वा स्वात्मनि ४८ सस्तीर्ण कौस्तुभाशु २९ सर्वजीवरक्षणैक १२५ सचूर्ण ताम्बूल सवज्ञो यो यश्व ४५ सत्तामात्र केवल ७४ सर्वत्रास्ते सर्वशरीरी ४८ सत्य ज्ञान शुद्ध ४९ सर्वचैक पश्यति ४८ सत्य ज्ञानमनत ५६ सर्वदुर्वासनाजाल १११ सत्यपि भेदापगमे ११७ सर्वमङ्गलाकुचा ० १२५ ૬૪ सान मानव १३१ सदा तृप्तान्न ६० सिंहाद्रिपार्श्वेऽपि १३२ सदा राम पिबत ० ८ सुखत क्रियते ६९ सदा राम पिबन्न ० ረ सुनासापुट सुन्दर० १९ श्लोकानुक्रमणिका । १५९ पृष्ठम् पृष्ठम् सुताकारा प्रसुते सुरनादैरवित ३३ स्नानव्याकुलयोषित् ५७ १९ स्फुरत्कौस्तुभालकृत ३७ सुरमन्दिरतरु ६६ खच दनवनितादीन् १२ सुवक्षोजकुम्भा १३७ स्वदक्षजानु • ८५ सुशा ता सुदेहा १३८ स्वभक्ताग्रगण्यै ५ सुसीम तवेणीं १३८ स्वभक्तेषु सदर्शिताकार सर्व स्वात्म ० ५ ह सेवकाय मे १२८ हर त्व ससार ११६ सौराष्ट्रदेशे १३० हरे राम सीतापते ९ स्तव पाण्डुरङ्गस्य ३८ हारस्योरुप्रभाभि ३० स्तुवतिय ७४ हित्वा हित्वा ४७ स्तोकभक्तितोऽपि १२७ हिमाद्रिप्रार्श्वेऽपि १३२ स्तोष्ये भक्त्या ४५ हृदम्भोज कृष्ण ५९ 11 ft 11 ललितात्रिशतीभाष्यम् श्रीमच्छकरभगवत्पूज्यपादै. विरचितम् । ॥ श्री ॥ ॥ललितात्रिशतीभाष्यम् ॥ वन्दे विघ्नेश्वर दव सर्वसिद्धिप्रदायिनम् । वामाङ्कारूढवामाक्षीकरपल्लवपूजितम् ॥ १ ॥ पाशाङ्कुशेक्षुसुमराजितपञ्चशाखा पाटल्यशालिसुषुमाचितगालवल्लीम् । प्राचीन वास्तुतपदा परदवता त्वा पञ्चायुधार्चितपदा प्रणमामि देवीम् ॥ २ ॥ लोपामुद्रापतिं नत्वा हयग्रीवमपीश्वरम् । श्रीविद्याराजससिद्धिकारिपकजवीक्षणम् ॥ ३॥ विस्तारिता बहुविधा बहुभि कृता च टीकां विलोकयितुमक्षमता जनानाम् । तत्रत्यसवपदयोगविवकभानु तुष्ट करामि ललितापदभक्तियोगात् ॥ ४ ॥ SU VII 11 १६२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । अगस्त्य उवाच- हयग्रीव दयासिन्धो भगवन् शिष्यवत्सल । त्वत्त. श्रुतमशेषेण श्रोतव्य यद्यदस्ति तत् ॥ रहस्यनामसाहस्रमपि त्वत्त' श्रुत मया । इत' पर मे नास्त्येव श्रोतव्यमिति निश्चय' ॥ तथापि मम चित्तस्य पर्याप्तिर्नैव जायते । कात्यर्थ प्राप्य इत्येव शोचयिष्याम्यह प्रभो ॥ किमिद कारण ब्रूहि ज्ञातव्याशोऽस्ति वा पुन । अस्ति चेन्मम तद्ब्रूहि ब्रूहीत्युक्त्वा प्रणम्य तम् ॥ सूत उवाच- । समाललम्बे तत्पादयुगल कलशोद्भव' । हयाननो भीतभीत किमिद किमिद त्विति ॥ मुञ्च मुश्चेति त चोक्त्वा चिन्ताक्रान्तो बभूव सः । चिर विचार्य निश्चिन्वन्वक्तव्य न मयेत्यसौ ॥ तूष्णीं स्थित स्मरन्नाज्ञां ललिताम्बाकृता पुरा । ललितात्रिशतीभाष्यम् । १६३ प्रणम्य विप्र स मुनिस्तत्पादावत्यजस्थित ॥ ७ ॥ वर्षावधि तथा गुरुशिष्यौ तथा स्थितौ । तच्छृण्वन्तश्च पश्यन्त सर्वे लोका सुविस्मिताः॥ तत. श्रीललितादेवी कामेश्वरसमन्विता । प्रादुर्भूय हयग्रीव रहस्येवमचोदयत् ॥ ९ ॥ श्रीदेव्युवाच- अश्वाननावयोः प्रीति शास्त्रविश्वासिनि त्वयि । राज्य देय शिरो देय न देया षोडशाक्षरी ॥ १०॥ स्वमातृजारवद्गोप्या विद्यैषेत्यागमा जगुः । ततोऽतिगोपनीया मे सर्वपूर्तिकरी स्तुति ॥ मया कामेश्वरेणापि कृता सगोपिता भृशम् । मदाज्ञया बच्चो देव्यश्चक्रुर्नामसहस्रकम् ॥ १२ ॥ आवाभ्या कथिता मुख्या सर्वपूर्तिकरी स्तुतिः । सर्वक्रियाणा वैकल्यपूर्तिर्यज्जपतो भवेत् ॥ १३ ॥ सर्वपूर्तिकर तस्मादिद नाम कृत मया । १६४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । तद्ब्रूहि त्वमगस्त्याय पात्रमेव न सशय ॥ १४ ॥ पत्न्यस्य लोपामुद्राख्या मामुपास्तेऽतिभक्तित. । अय च नितरा भक्तस्तस्मादस्य वदस्व तत् ॥ अमुञ्चमानस्त्वत्पादौ वर्षत्रयमसौ स्थित । एतज्ज्ञातुमतो भक्त्या हीदमेव निदर्शनम् ॥ चित्तपर्याप्तिरेतस्य नान्यथा सभविष्यति । सर्वपूर्तिकर तस्मादनुज्ञातो मया वद ॥ १७ ॥ सूत उवाच- इत्युक्त्वान्नरधादम्बा कामेश्वरसमन्विता । अथोत्थाप्य हयग्रीव पाणिभ्या कुम्भसभवम् ॥ सस्थाप्य निकटे वाचमुवाच भृशविस्मित । हयग्रीव उवाच - कृतार्थोऽसि कृतार्थोऽसि कृतार्थोऽसि घटोद्भव ॥ त्वत्समो ललिताभक्तो नास्ति नास्ति जगन्नये । येनागस्त्य स्वय देवी तब वक्तव्यमन्वशात् ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । १६५ सच्छिष्येण त्वया चाह द्रष्टवानस्मि ता शिवाम् । यतन्ते दर्शनार्थाय ब्रह्मविष्ण्वीशपूर्वका ॥ अत पर ते वक्ष्यामि सर्वपूर्तिकर स्तवम् । यस्य स्मरणमात्रेण पर्याप्तिस्ते भवेद्धृदि ॥ २२ ॥ रहस्यनामसाहस्रादपि गुह्यतम मुने । आवश्यक ततोऽप्येतल्ललिता समुपासितुम् ॥ तदह सप्रवक्ष्यामि ललिताम्बानुशासनात् । श्रीमत्पश्चदशाक्षर्या कादिवर्णान्क्रमान्मुने ॥ पृथग्विंशतिनामानि कथितानि घटोद्भव । आहत्य नाम्ना त्रिशती सर्वसपूर्तिकारिणी ॥ रहस्यातिरहस्यैषा गोपनीया प्रयत्नत । ता शृणुष्व महाभाग सावधानेन चेतसा ॥ केवल नामबुद्धिस्ते न कार्या तेषु कुम्भज । मन्त्रात्मकत्वमेतेषा नाम्ना नामात्मतापि च ॥ १६६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । तस्मादेकाग्रमनसा श्रोतव्य च त्वया सदा । सूत उवाच- इत्युक्त्वा त हयग्रीव प्रोचे नामशतत्रयम् ॥ बहुकाल सुभक्तिमहिना गुरुपादाम्बुजमवलम्ब्य स्थिताय कुम्भयोनिमुनये शिवदपतिकृतनामशतत्र योक्त्या प्रेरितो हय ग्रीव उवाच - ककाररूपा कल्याणी कल्याणगुणशालिनी । कल्याणशैलनिलया कमनीया कलावती ॥ ककाररूपेति । ककार कवर्ण रूप ज्ञापकविशेषण यस्या सा, कादिविद्याविग्रहत्यर्थ । अथवा ककार रूप वाचक येषा त ककाररूपा हिरण्यगर्भ उदकम् उत्तमाङ्ग सुखादयश्च । हिरण्यगर्भनिष्ठजगद्धारक जगत्कर्तृत्वादिगुण बत्व ककारस्य व्यञ्जनादिमवर्णत्वेन वतत इति तद्वाच्य तया तथा । उदकनिष्ठानादिद्वारा जगत्सजीवनहेतुत्वमपि ककारस्य विद्याग्रिमवर्णतयास्तीति तद्रूपा वा । सर्वेषा प्राणिना शिरस्यमृतमस्तीति योगमार्गेण कुण्डलिनीगमने तत्रत्यतत्प्रवाहाप्लुतयोगिनामीश्वरसाम्य जायत इति योगशा त्रेषु प्रसिद्धम् । तद्वत् कवर्ण मन्त्रादिमभागस्थ तत्पु- ललितात्रिशतीभाष्यम् । १६७ रश्चर्यापरायणाना शिवभावमेव यच्छतीति वा तद्रूपत्यर्थ, " क ब्रह्मख ब्रह्म' इति श्रुते । दहराकाशस्य सुखस्वरूप त्वेन परमप्रेमास्पदतया अभिलाषविषयत्ववत् ककारोऽप्य तिप्रीतिविषयमूलमन्त्रादिमाक्षरतया अभ्यर्हितत्वाद्वा तद्रूपे त्यर्थ ॥ ॐ ककाररूपायै नम ॥ कल्याणी । कल्याणानि सुखानि । युवसार्वभौमानन्दा- दारभ्य ब्रह्मानन्दपर्यन्त तैत्तिरीयकादौ प्रतिपादितानि । तत्तदुपाधिभेदेष्ववच्छिन्न स्वरूपतया तानि कल्याणशब्दवा च्यानि, ' एतस्यैवानन्दस्य अन्यानि भूतानि मातामुपजी वन्ति' इति श्रुते । समष्टिव्यष्टिवत्वमुपहितस्वरूपेण सभ वतीति मतुप्समामोपपत्ति । तथा च राहो शिर इतिवत् समासान्तर्गतषष्ठद्यर्थभेदस्याविवक्षिततया आनन्दैकविग्रहव तीत्यर्थ, 'विज्ञानमानन्द ब्रह्म' इति श्रुत्युक्तब्रह्मस्वरूपल क्षणवतीत्यर्थ ॥ ॐ कल्याण्यै नम ॥ कल्याणगुणशालिनी । कल्याणा सुखकर्तार ये गुणा सत्यकामसत्यसकल्पसर्वाधिपत्य सर्वेशानत्ववामनी त्वसयद्वाम- त्वादय, ते अस्या शालयन्त इति, तथा एना शोभयन्ती ति वा, तै शाल्यत इति वा कल्याणगुणशालिनी । तथा च कल्याणाश्च ते गुणाश्च कल्याणगुणा शालयन्त्येनामिति १६८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । कल्याणगुणशालिनी, अस्मिन समासे देवताया पराधीन गुणवत्व स्वत शुद्धचैतन्यत्व च स्फुरितम् । कल्याणगुणै शाल्यत इत्यत्र गुणवत्त्वमात्र देवताया द्योत्यते । तस्थौपा धिकत्व वादकमपि स्तुतौ तदप्रकटन न दोषाय । यदि गुणानामारोपितत्वेन तत्सकीर्तनस्य भेदबुद्धिसमये तत्कृपा प्राप्तिहेतुत्वेनावश्यकत्वम्, तथापि तदपवादपुर सर शुद्ध चैतन्या भेदभ्यानरूपमुख्यभजन मुख्यमवति सपादयितु स्व- गुरूपदिष्टमार्गेण सुकरमेवेति नातिविस्तार्यते ॥ ॐ कल्या णगुणशालिन्यै नम ॥ ' कल्याणशैलनिलया । शिलाना विकार शैल शिलाघन इत्यर्थ, कल्याण सुखमेव शैल घनीभूत इत्यर्थ, तस्मिन् कल्याणशैले स्वस्वरूप आनन्दघने निलयति तिष्ठतीति कल्याणशैलनिलया, ' स भगव कस्मिन प्रतिष्ठित इति स्वे महिनीति होवाच' इति श्रते देवदत्त म्वस्मिन्नेव स्वय वर्तते इति लौकिकप्रयागाश्व, देवताया स्वस्वरूपे स्वावस्थान युज्यत इति । कल्याणमेव शैलवत् घनीभूत कल्याणशैल आनन्दमयकोश कल्याणशैलो निलय यस्या सा इति बहु व्रीहिसमास न विरुद्ध 'ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा' इति उक्त श्रुतिप्रामाण्यात् । अथवा कल्याणशैल महामेरु निलय गृह ' ललितात्रिशतीभाष्यम् । १६९ यस्या सा तथा, सुमेरुमध्यशृङ्गस्थेत्यर्थ ॥ ॐ कल्या शैलनिलयायै नमः ॥ कमनीया । परमानन्दस्वरूपत्वन परमप्रेमास्पदा, ' को वान्या प्राण्यात् । यदष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इति श्रुते । सुखस्य मनोहरत्वेन सर्वेप्साविषयत्ववत् मायावृता- ना सुखप्रापकत्वेन स्वस्वेष्टदेवतासु प्रीत्यतिशयेन तत्पूजादौ प्रवर्तता तत्फलदानेन मनोहरत्वाद्वा कमनीया । ज्ञानिनामा नन्दघनीभावात्मक सुन्दरमूतिमत्तया वा कमनीया ॥ ॐ कमनीयायै नमः ॥ ' कलावती । कला शिर पाण्याद्यवयवा चतु षाष्टकला विद्यारूपा वा, चन्द्रकला वा, भक्तध्यानाय अभ्या सन्ती- ति कलावती ॥ ॐ कलावत्यै नमः ॥ कमलाक्षी कल्मषनी करुणामृतसागरा । कदम्बकाननावामा कदम्बकुसुमप्रिया ॥ कमलाक्षी । कमले इव अक्षिणी यस्या सा तथा । कमलाया लक्ष्म्या अभिशब्देन तनिमित्तक ज्ञान लक्ष्यते विषयतासब धेन तद्वतीति वा । कमलाया ऐहिकामुष्मि कश्रिय हेतुभूते अक्षिणी यस्या सा- इति स्वकीयेक्षणमा १७० ललितात्रिशतीभाष्यम् । वेण महश्वयप्रापिकेति भाव ॥ ॐ कमलाक्ष्यै नमः ॥ कल्मषन्नी । कल्मषाणि पापानि हन्ति नाशयतीति क- ल्मषनी, 'अह त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि इति भग वद्वचनात् । अथवा वेदान्तमहावाक्यजन्य साक्षात्काररूप- ब्रह्मविद्या 'ज्ञानाभि सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा' इति स्मृते, 'न स पाप५ श्लोक शृणोति' इति श्रुतेश्व ॥ ॐ कल्मषघ्न्यै नमः ॥ करुणामृतसागरा । करुणया कृपया जात यदमृत मोक्षरूप तस्य सागर इव सागरा । यथा अमृतसमुद्र स्वयममृतस्वरूप सन् अन्यानपि लोकान् अमृतपायिमेघाद्विमुक्तामृतेन सजी- वयति, तथा 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' इत्यादिश्रुत्या स्वयममृतस्वरूपा सती । ' लभते च तत कामान्मयैव विहितान्दितान्' इति भगवद्वचनेन तत्तदधि कारिकृतकर्मोपासनादिफलस्य देवताप्रापणीयस्य सप्राप्तौ त- तदधिकारिणा तत्तत्फल स्थितमिति सभाव्यत इति सागरो पमा । अमृतवत्सर्वमजीवनी करुणामृतस्य अभिन्नाश्रयत्वात् सागरा, करुणा च भक्तविषयकपरिपाल्यताबुद्धि । यद्वा, करुणया कृपया अमृता शाश्वतकीर्तिमत्वेन ब्रह्मादिलोक गता सागरा सगरराजवश्या यस्या सा तथा यद्वा, ललितात्रिशतीभाष्यम् । १७१ करुणया दयया हेतुना अमृताय प्राप्त सागर समुद्रो यया सा भागीरथी, करुणामृतसागरा ॥ ॐ करुणामृतसाग- रायै नमः ॥ ॐ कदम्बकान- कदम्बकाननावासा । कदम्बनामककल्पवृक्षयुक्त यत्का- नन वन तत्रावास गृह यस्या सा तथा ॥ नावासायै नमः ॥ कदम्बकुसुमप्रिया । कदम्बाना कुसुमानि कदम्बकुसुमानि तेषु प्रिया प्रीतिमतीति यावत् । यद्यपि प्रियशब्द प्रीतिवि- षयवाचक, तथापि कुसुमजन्यप्रीतरभावेन तद्विषयताया वक्तमशक्यत्वात् तथोक्तम ॥ ॐ कदम्बकुसुमप्रियायै नमः ॥ कदर्पविद्या कदर्पजनकापावीक्षणा । कर्पूरवीटी सौरभ्यकल्लोलितककुसटा ॥ ३ ॥ कदर्पविद्या । दर्पस्य विद्या तन्निष्ठप्रत्यग्ब्रह्मैक्यज्ञान- मित्यर्थ । अथवा विद्याप्रापकत्वात्तद्दृष्टमूलमन्त्रवर्णमयो विद्येत्युच्यत वेदवाक्येषु उपनिषत्पदवत् । तद्वान्यार्थत्वात् तथा देवी सून्यते ॥ ॐ कदर्पविद्यायै नमः ॥ कदर्पजनकापाङ्गवीक्षणा । अपाङ्गाभ्या वीक्षणमपाङ्गवी क्षणम्, ईषद्दर्शनमिति यावत् । कदर्पस्य जनक अपाङ्ग १७२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । वीक्षण यस्या सा । अनेन नाम्ना येषा जडानामपि कुरू- पिणा जनाना उपरि सकृदीषद्वीक्षणमभिजायते, ते कदर्प- बद्रूपयौवनसामर्थ्यलक्ष्मी भाजो भवन्तीति ध्वनितम् । यद्वा कदर्पस्य जनक श्रीनारायण स यम्या अपाङ्गवीक्षणे ईषद्भूवल्लिचलन वर्तते, यस्या आज्ञामात्रवश्यतया महा विष्णु जगद्रक्षादिकार्य करोतीति सा तथा इति । अथवा, कदर्पजनका महालक्ष्मी यथा अपाङ्गवीक्षणे प्रर्यतया व र्तते सा तथा । कदपस्य मन्मथस्य जनका उत्पादका स्रक्चन्दनादिभोग्यविषया ते यस्या अपाङ्गवीक्षणात् भ- वन्ति मा तथा अथवा, चन्द्रस्य वामनेत्रतया अपाङ्ग वीक्षण चन्द्रिकोन्यते । कदपजनक अपाङ्गवीक्षण यस्या सा तथा । कदर्पजनकाशब्देन लक्ष्मीनिवासकमल ल क्ष्यते, तद्वत् अपाङ्ग कमलाक्षीत्यथ तन्निरूपितवीक्षण लोकसजीवन यम्या सा तथा ॥ ॐ कदर्पजनकापाङ्ग वीक्षणायै नमः ॥ कर्पूरवीटी सौरभ्यकल्लोलितककुप्पटा । कर्पूरयुक्ताश्च ता वीटयश्च ताम्बूलकबलानि तासा सौरभ्य सौगन्ध्य तै कल्लोलितानि असकृत्परिमलितानि ककुभा दिशा तटानि प्रदेशा यस्या मा । मुखवासितपरिमलेन जगन्मात्र सुर- ललितात्रिशतीभाष्यम् । ' १७३ भीकृतमिति स्वरूपातिशयोक्ति अस्मिन्नानि व्यज्यत महा राजभोगवतीत्यर्थ । ॐ कर्पूरवीटीसौरभ्यकल्लोलितककुप्त टायै नमः ॥ कलिदोषहरा कजलोचना कम्रविग्रहा । कर्मादिसाक्षिणी कारयित्री कर्मफलप्रदा ॥ ४ ॥ कलिदोषहरा । कले निन्द्या जायमानाना पुरुषाणा जन्ममात्रण ये दोषा पापानि आयाति तान दृष्टा श्रुता कीर्तिता सस्तुता पूजिता ध्याता सती हरतीति तथा । कले अन्योन्यवादिना कलहात्तत्तन्मताभिनिवेशवशाज्जायमाना ये दोषा परब्रह्मविषये अस्तित्वनास्तित्वदेहादिव्यतिरिक्तत्वभि नत्वाभिन्नत्वगुणित्वादिसाधकयुक्त्याभासतदनुगुणसमत्याभा सश्रुतितात्पर्यविघटनान्यथाकरणदुराग्रह जन्यकामक्रोधपरुष परवशक्रियमाणनिन्दासहनादिरूपा बहुविधा दोषा, तान- द्वैत ब्रह्मज्ञानसाधनमुक्तिरूपेण हरतीति कलिदोषहरा ॥ ॐ कलिदोषहरायै नम । कजलोचना । केभ्य जायन्त इति कजानि, कजशब्द न अरविन्दनीलोत्पलानि लक्ष्यन्ते तद्वल्लाचने यस्या सा तथा । अथवा कज ब्रह्माण्डम् । 'अय पूर्वमप सृष्ट्वा तासु वीर्यम १७४ ललितात्रिशतीभाष्यम । पासृजत् तदण्डमभवद्धैमम्' इति वचनात् कजानि अनेक कोटिब्रह्माण्डानि लोचनयो लोचनकृतवीक्षणात् यस्या सा तथा, 'सेय देवतैक्षत' इति श्रुते ॥ ॐ कजलोच नायै नमः ॥ कम्रविग्रहा । कम्र अतिमनोज्ञ, गाम्भीर्यधैर्यमाधुर्यादि- बहुगुणोदितत्वात्, विग्रह मूर्ति यस्या मा तथा, ● आ नन्दरूपममृत यद्विभाति' इति श्रुते । आनन्दस्वरूपत्वाद्वा कम्रविग्रहा, ललितारूपेत्यर्थ ॥ ॐ कम्रविग्रहायै नम ॥ कर्मादिसाक्षिणी । कर्म आदिर्येषा तानि कर्मादीनि उपासनायोगश्रवणमनननिदिध्यासनानि । तेषा साक्षिणी अ- सबन्धी द्रष्ट्री, 'साक्षी चेता' इति श्रुते । अथवा कर्मा दय साक्षिभूता जीवनिष्ठा तदनाश्रयतया आत्मदर्शन साधनानि सृज्यमानजगदुपादानभूतानि यस्या सा तथा ॥ ॐ कर्मादिसाक्षिण्यै नमः ॥ कारयित्री कारयितृत्व नाम कुर्वित्याज्ञापयितृत्व जाय मानकार्यं गोचरकृत्युत्पत्तिहेतुकर्मोद्बोधकत्वरूप लिङ्लोट्तव्य प्रत्ययाना धर्म विधिनिष्ठ भावनेत्युच्यते । तेषा शब्दा त्मकतया जडाना तथात्वासभवात्तदधिष्ठानचैतन्यरूपतया ललितात्रिशतीभाष्यम् । १७५ 'सर्वे वेदा यत्रैक भवन्ति' इति श्रुत्या वेदस्यात्माभेदेन स्व प्रकाशकतया अर्थप्रकाशनद्वारा प्रामाण्यविधीनामपि वेदैक देशतया प्रेरणरूपत्वात् तदधिष्ठानचैतन्यात्मनाकारयतीति तथा, 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति' इति श्रुते ॥ ॐ कारयित्र्यै नमः ॥ कर्मफलप्रदा । कृताना कर्मणा कालान्तरभाविफलप्र- दाने अदृष्ट कारणमित्यनीश्वर मी मासकादिमतम, तन । जडाना सूक्ष्माणामदृष्टाना चतनधर्मकर्मफलप्रदानसामर्थ्या योगात् कृताना कर्मणा फलावश्यभावे ' कर्माध्यक्ष ' इति श्रुते, 'मयैव विहितान्हितान्' इति स्मृतेश्व, 'फलमत उप पत्ते ' इति न्यायाच परदेवता कर्मफलप्रदा ॥ ॐ कर्म फलप्रदायै नमः ॥ एकाररूपा चैकाक्षर्येकानेकाक्षराकृतिः । एतन्तदित्यनिर्देश्या चैकानन्दचिदाकृनि' । प्रकाररूपा । एकार रूप मन्त्रद्वितीयावयवसज्ञापक यस्या सा तथा ॥ ॐ एकाररूपायै नम ॥ एकाक्षरी । एक मुख्यम् ईश्वरोपाधित्वेन । न क्षरति आत्मज्ञानेन विनामुक्ते न नश्यतीति अक्षर कूटस्थशब्दवाच्य १७६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । माया । तत्प्रतिबिम्ब निष्ठ सर्वज्ञत्वाद्याधायक विशेषणत्वेन अ स्या अस्तीति एकाक्षरी । एकम् अक्षर सवप्रकृतित्वात्परा- परब्रह्मप्रतीकतया तदुपासनया तदुभयप्राप्तिसाधनत्वेन शब्द ब्रह्मरूपलक्षितलक्षकशब्द प्रणव अस्या अस्तीति वा एक अखण्डैक चैतन्यरूप अक्षर अनश्वर अविनाशी परमश्वर अर्धशरीरत्वन अस्यामस्तीति वा । एकान्यक्ष राणि मायाबीजादीनि तदुपासनाप्रतीकत्वेन अस्या सन्ती ति वा । 'अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ' इति श्रुत अखण्डाकारवृत्तिप्रतिफलनयोग्यचैतन्यरूपतया तद्वृत्तिव्याप्ति मात्रेण अक्षरपदलक्ष्य चैतन्य विषयतासबन्धेन अस्या अस्तीति एकाक्षरी । चकार निर्गुणब्रह्मणोऽपि सगुणब्रह्मविशेषणसद्भा समुच्चयपर सर्वत्रापि द्रष्टव्य । सच्चिन्मय शिव सा क्षात्तस्यानन्दमयी शिवा' इति वचनेन, 'स्त्रीरूपा चिन्त Dear पुरुपामथवेश्वरीं । अथवा निष्कल ध्यायत्सश्चिदान न्दविग्रहाम्' इति स्मृत्या च, 'त्व स्त्रीत्व पुमान्' इति श्वेताश्वतरोपनिषदि उपाधिकृतनानारूपसभवोक्तेश्च । भत एव 'सेय देवतैक्षत' इत्यादौ ' तत्सत्य स आत्मा' इत्यन्ते च श्रुतौ स्त्रीलिङ्गान्तदेवतादिपदाना तत्सत्यमिति नपुसका- तस्य स आत्मेति पुंल्लिङ्गात्मशब्दस्य एकार्थत्वम् अविवक्षि ललितात्रिशतीभाष्यम् । तापाधिमत्तया तस्वपदलक्ष्यार्थस्यैकत्वात् । तस्मात् तत्व पदलक्ष्यार्थे सर्वेऽपि गुणा वर्णितु सभवन्तीति हय ग्रीवेण अस्या त्रिशत्या बहव वय सर्वेषा सर्वत्र न पार्थक्यन ॐ एकाक्षर्यै नमः ॥ चकारा उपान्ता । तेन प्रयोजनान्तर पश्याम ॥ एकानेकाक्षराकृति । एकम् ईश्वरप्रतिबिम्बोपाधितया शु द्धसन्त्वप्रधानम् अक्षरमज्ञानम् । अनेकानि मलिन सत्त्वप्रधान तया जीवोपाधिभूतान्यक्षराणि अज्ञानानि, 'माया चाविद्या च स्वयमेव भवति' इति श्रुते । एक चानेकानि च एकानका नि तानि च अक्षराणि च तानि तथा ' माया तु प्रकृतिम्' इति श्रुते । तेष्वाकृतय प्रतिबिम्बान्यवच्छिन्नानि वा चैतन्यानि घटस्थोदकावच्छिन्नप्रतिबिम्बिताकाशवद्यस्या सा तथा । अथवा एकानि च प्रणवाद्यानि अनेकानि च अकारादि क्षकारान्तानि अक्षराणि वर्णा आकृति स्वरूप यस्या सा, मातृका स्वरूपत्वेन वा । ' अकारादिक्षकारान्ता मा तृकेत्यभिधीयते' इति वचनात् । अथवा एच कश्च एकार- ककारौ तौ चेतराण्यनेकाक्षराणि च सर्वे मिलित्वा पश्चद शवर्णात्मिका मूलविद्या आकृति स्वरूप यस्या सा । साक्षि तथा एकीभूता अनेकाक्षरेषु अनेकाज्ञानेषु आकृति स्वरूप SUVIT 12 १७८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । शोधिततत्त्वपदार्थ सामरस्यात्मक यम्या एकाने काक्षराकृतये नम ॥ सा तथा ॥ एतत्तदित्यनिर्देश्या । एतत् एतत्कालेऽपि इयत्तापरिच्छे- वस्तु तत् परोक्षमनिश्चितस्वरूपम् । एतत्र तच एतत्तत् । इतिकार इत्थभावतृतीयार्थे । तथा च एतस्वतस्वाभ्यामि त्यर्थ । एतत्तदित्यनेन निर्देष्टु निर्वक्तु योग्या निर्देश्या सा न भवतीति अनिर्देश्या । लोके सविशेषो हि पदार्थ परोक्षत्वापरोक्षत्वादिधर्मविशेषेण तद्गतेन निर्वक्तु शक्य । शब्दप्रवृत्तिनिमित्तजातिगुणक्रियाषष्ठ्यर्थाना यत्र सबन्धो नास्ति, 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्', 'निर्गुण निष्क लम्' इत्यादिश्रुत्या, तादृग्वस्तु केन करणेन केन वा वचनेन निर्देष्टु शक्यम् । 'यद्वाचानभ्युदितम्' इति श्रुते । अत एतत्तदित्यनिर्देश्या वामनसातीतेत्यर्थ । अथवा, एतत् प्रत्यक्षादिप्रमाणसिद्ध कार्य पश्चाद्भावि । तत् परोक्षत्वादि- विशिष्ट पूर्वकालसबन्धि व्यवहित कारणमुच्यते । इति- शब्द उभयत्र सबन्धनीय । कार्यमिति कारणमित्यपि शुद्धचैतन्यरूपा अनिर्देश्या, कार्यत्वकारणत्व घटकोपाधिवि- रहितत्वेन कार्यकारणभावाभावे तद्वाचकशब्दैर्विषयीकर्तुमश- क्यत्वात् । अथवा, एतत् अपरोक्षतया अहमिति प्रती ललितात्रिशतीभाष्यम् । १७९ यमान जीवचैतन्य त्वपदवाच्यार्थ । तत् परोक्षतया प्रती यमानमीश्वरचैतन्य तत्पदवाच्यार्थं । इति शब्द एव कारार्थ । तथा च वादिभेदसिद्धान्त अनूदित । सा ख्यमते प्रकृतिर्जगत्कर्त्री, जीवो नानाचतन भोक्ता इत्यत ईश्वर एव नास्तीत्यङ्गीकृतम् । भागवतमते तु 'गुणी सववित्' इति श्रुत नित्यगुणविशिष्टात् परमेश्वराद्विष्णो जवानामुत्पत्तिविनाशवत्वेन अनित्यत्वात् स एव भगवान् पारमार्थिक एक इत्यङ्गीकृतम् । तदुभयवादिसिद्धान्त स्य औपनिषदमते निरस्तत्वात् तदुभयविधया अनिर्दे श्या । परमार्थसच्चिदानन्दरूपतया छान्दाग्यगतदेवता शब्दार्थस्य प्रतिपादनादिति भाव 1 अथवा, तटस्थे श्वरवादिकाणादादिसिद्धान्तवत् व्यवस्थित भदवज्जीवेश्वररु पतया अनिर्देश्या । भेदव्यवस्थाया एव साधितुमश- क्यत्वादिति एतत्तदित्य निर्देश्या ॥ ॐ एतत्तदित्यनिर्दे- श्यायै नमः ॥ एकानन्दचिदाकृति । एका मुख्या मोक्षरूपत्वेन प्रापि त्सिता । आनन्द सुखम् । चित् चैतन्य प्रकाशज्ञानम् । आनन्दश्चासौ चिश्च आनन्दचित् एका चासावानन्दचिच एकानन्दचित् आकृति स्वरूप यस्या सा । सच्चिदानन्द १८० ललितात्रिशतीभाष्यम् । ब्रह्मरूपलक्षणवतीत्यर्थं । 'विज्ञानमानन्द ब्रह्म' ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात' इति श्रुते ' आनन्दादय प्रधानस्य' इति न्यायाच्च दीप्तिस्वरूपप्रकाशात्मकपरमानन्दस्वरूपस्य जीव न्मुक्त्यवस्थाया परमात्मज्ञानवत् पुरुषानुभवरूपप्रत्यक्षप्रमा णगोचरत्वमस्या इति वा तथा । अथवा, एकेषा आनुभा विकाना योगिनामानन्दसाक्षात्काररूपा आकृति निरावर प्रकाशरूपा यस्या सा तथा । अथवा, आनन्द शिवा, चित् परमेश्वर, एके मूर्तिभेदरहिते आनन्दचितौ आकृति यस्या सा तथा ॥ ॐ एकानन्दचिदाकृतये नमः ॥ एवमित्यागमायोभ्या चैकभक्तिमदर्त्तिता । एकाग्रचित्तनिर्ध्याता चैषणारहितादृता ॥ एवमित्यागमाबोध्या । ननु आनन्दशब्दस्य लक्षणया ' " आनन्दमयो वाक्य । य एको जालवानीशत इशनीभि इति श्रुत्युक्तैकत्वमपि जीवे सिध्यति । तथा च एक श्वासा वानन्दश्च तस्य चित् अधिष्ठानप्रकाशक चैतन्यमाकृति यम्या सेति विग्रह सभवति । ' ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा' इति तत्प्रका शकचैतन्यस्य पुन्छशब्देन परामर्शात् । एव च सति प्रका शकनित्यत्वस्य प्रकाश्यनित्यत्वापेक्षत्वात् । 'सत्य ज्ञानम- 1 ललितात्रिशतीभाष्यम् । १८१ नन्त ब्रह्म' इत्यादिब्रह्मस्वरूपलक्षणवाक्येषु वाच्यार्थ प्राधा न्येन विधिमुखेनैव ब्रह्मप्रतिपादने अतव्यावृत्तिरूपनिषेधमु खेन लक्षणार्थप्राधान्येन ब्रह्मस्वरूपलक्षणप्रतिपादनायोगेन मसिवाक्ये वैशिष्ट्रय वाक्यार्थ सभवतीति चेत्, नेत्या- ह - एवमित्यागमाबोध्येति । एवविशिष्टतया - इति प्रत्यक्ष सिद्धत्वेन आगमैर्वेदे ज्ञापनीया न भवति । आनन्द शब्दस्यानन्दमात्रवाचकस्य तत्प्रचुरे सभावितेषद्दु ख जीवे लक्षणाया त्रयो दोषा । पारमार्थिकभिन्न सत्ताकवस्त्व न्तराभावेन तत्त्वपदवाच्यार्थनिष्ठविशेषणद्वयस्य अन्योन्य विरोधवत्तया तम प्रकाशवद्वैशिष्टयायोगे अखण्डार्थो वा क्याथ सपद्यते । तथा च स्वरूपलक्षणवाक्येषु वाच्यार्थस्य ' अतोऽन्यदार्तम्' इति श्रुत्या मिध्यात्वप्रतिपादनात् निषेध मुखेनैव अतद्व्यावृत्तिस्वरूपप्रतिपादनेन लक्षणवाक्यानि सम असानि भवतीति भाव ॥ ॐ एवमित्यागमाबोध्याये नम ॥ एकभक्तिमदर्चिता । एकस्मिन्नभेदे जीवब्रह्मणो भक्ति भजनीयत्वबुद्धि तत्परिजिज्ञासा येषा सन्ति, तैरर्चिता पूजिता इत्येतदुपलक्षण स्तुता भ्याता नमम्कृतेत्येवमादी नाम्, 'यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति तत्कर्मणा कराति ' १८२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । इति श्रुते मानसिकव्यापार पूर्वकानि हि इतरेन्द्रिय कर्माणि भवन्तीत्यभिप्राय । अथवा, अस्मिन् ससार मण्डले तत्स्वरूपपरिज्ञातार ये केचन, तेषा भजनीयत्वाध्यवसायो भक्ति तदेकप्रवणता सगुणब्रह्मविषया अष्टविधा, तैरेकभ तिमद्भिरर्चिता अन्तर्यागबहिर्यागमहायागप्रकारै पूजिता इत्यर्थ ॥ ॐ एकभक्तिमदर्चितायै नमः ॥ एकाग्रचित्तनिर्ध्याता । एकम् ऐक्यरूपम् अग्रम् आ लम्बन विषय विजातीयप्रत्ययतिरस्कारपूर्वक सजातीयवृत्ति काभि निरन्तरव्याप्तिविषयीकृतचैतन्य यस्य तत्तादृश चि तमन्त करण येषा तै / यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहा रधारणाध्यानसमाधीना परिपाकातिशयेन पश्चात्सपद्यमाना सप्रज्ञातसमाधे त्रिविधा भूमिका — ऋतभरा, प्रज्ञालोका, प्रशान्तवाहिता चेति । ऋत यथाभूत सचिदानन्दलक्षण ब्रह्म भरति वृत्तिव्याप्त्या विषयीकरोतीति प्रथमा तथा, 'आत्मन्येव वश नयेत्' इति भगवद्वचनात् । प्रज्ञालोका । प्रज्ञाया अखण्डाकारवृत्तौ नित्यनिरन्तराभ्यासेन परिपाक नीताया ब्रह्मविषयिण्या आवरणाभिभव कुर्वन्त्या सत्याम्, ' प्रज्ञा प्रतिष्ठा' इत्यादिश्रुते, प्रज्ञाया ब्रह्मस्वरूपाया आलोक अभिव्यक्ति साक्षात्कार यस्था सपद्यत सा का कलितात्रिशतीभाष्यम् । १८३ रणविज्ञानम् । यस्मिन्विज्ञाते सर्वमिद विज्ञात भवतीत्येक विज्ञानेन सर्वविज्ञानरूपम् । प्रारब्धवशात्तदा चित्त तदध्य स्त सर्वजगद्रष्टुमिच्छति यदि, तदानीं चैतन्य प्रकाशेनैव प्रकाशित जगत्स्वाप्नपदार्थवदशेष भासते । इद च भरद्वाजा दीनामस्तीति पुराणादिप्रमाणवेद्यमस्माकम् । तथा च तस्या भूमिकाया निरुद्धसामर्थ्य सदन्त करण साकारस्वरूप नि र्वासन यदा नश्यति, तदा प्रशान्तवाहिता भवति । वह प्रवाह सततवृत्ति धारा अस्य अस्तीति वाही, वाहिनो भाव वाहिता प्रशान्ता च सा वाहिता च प्रशान्तवाहिता । अथवा, प्रशान्त वाह अस्य अम्तीति प्रशान्तवाही । प्रशान्तवाहिनो भाव प्रशान्तवाहिता, 'मनसो वृत्तिशून्यम्य ब्रह्माकारतया स्थिति । असप्रज्ञातनामेति समाधियगिना प्रिय ' इति वचनात्, प्रशान्तमनस ह्येनम ' इति भगव द्वचनात्, ' प्रभ्व्यतेजाऽनिलखे समुत्थित पश्वात्मके याग गुणे प्रवसे । न तस्य रागो न जरा न मृत्यु प्राप्तस्य योगाग्निमय शरीरम्' इति श्रुत्या उक्तलक्षण साधन परिपाकव शाद्भवति । तैर्निर्ध्याता, ध्यानस्य निर्गतत्वात् । भेदास्फूर्ती ध्यानविषयो न भवति ध्यातु स्वरूपमेव प्रकाशते, 6 6 ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इति श्रुते । निध्याता इति पाठ नितरा १८४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । श्रवणमनननिदिध्यासनेन साक्षात्कृता इत्यर्थ ॥ ॐ एका ग्रचित्तनिर्ध्यातायै नमः ॥ एषणारहितादृता । एषणा इच्छा । मा त्रिविधा । एत लोकजयाय पुत्रैषणा । पितृलोकजयसाधनकर्मसपादनाय वित्तैषणा । उपासनादिना जयसाधन देवलोक, तस्मिन्ने षणा लोकैषणा । आभि रहितै अनाकृष्टचित्तै, 'ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति' इति श्रुते । एषणारहिता ये परमहस परिव्राजका सन्यासिन तै आदरेण अतिशय प्रेम्णा स्वस्व रूपेण आता अङ्गीकृता निरन्तरध्यानेन साक्षात्कृता सती मोक्षरूपतया प्राप्तत्यर्थ ॥ ॐ एषणारहितादृतायै नमः ॥ एलासुगन्धिचिकुरा चैन कूटविनाशिनी । एकभोगा चैकरसा चैकैश्वर्यप्रदायिनी ॥ ७ ॥ एला सुगन्धिचिकुरा । एलावदिति दृष्टान्तप्रदर्शन सौग मध्य मात्रसद्भावप्रदर्शनेना कल्पित दिव्य परिमलसद्भावे हेतु, न तु प्राकृतत्वद्गनपरम् ब्रह्मण स्वाधीनमायत्वात् । तद् त्सुगन्ध इति साजात्यमात्र व्यज्यते, गुणमात्रादानेन सर्वत्र पदार्थारस्य दृष्टान्तीकरणात् । सुगन्धा येषा ' ललितात्रिशतीभाष्यम् । १८५ यस्या सन्तीति सुगन्धिन तादृशा चिकुरा कुन्तला ॐ सा तथा । स्वभावसिद्ध दिव्य परिमलशालि सर्वाङ्गसौरभ्य वती, चिकुरपदस्य उपलक्षणत्वादिति भाव ॥ सुगन्धिचिकुरायै नम ॥ एला एन कूटविनाशिनी । एनसा पापाना कूट समुदाय । आगामिसचितप्रारब्धभेदेन समष्टिरूपेण दृढतर तत्त्वज्ञा नेन विना अन्यस्य भोगमात्रस्य तद्विनाशकत्वावगमात् तेषा च कल्पकोटिकाल क्रमिकभोगप्रदान विनोपायान्त रेण क्षयेप्सूनामात्मब्रह्माभेदज्ञानविषयतया चैतन्य नाशय तीति तथा । एवविदि पाप कर्म न सिध्यते, ' अशरीर वाव सन्त प्रियाप्रिये न स्पृशत इत्यादिश्रुते, 'अह त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि' इति स्मृतेश्व । अथवा नासि च तत्कारणीभूत कूट कपटवचनाभिधान च त त्कारण माया च नाशयतीति तथा ॥ ॐ एन कूटविना शिन्यै नमः ॥ , एकभोगा । एकेन कामेश्वरेण माक भोग भुक्ति । भोग स्वस्वरूपानन्दानुभव यभ्या मा तथा । अथवा, एकम्य अ- ज्ञानतत्कार्यस्य कार्यकारणरूपेण अभिन्नस्य तदधिष्ठानतया स्वसत्ताधायकत्वेन भोग परिपालन यया सा । प्रपच्चो १०६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । त्पत्तिस्थितिनाशहतुमायोपाधिक चैतन्यमित्यर्थ । ' एकाकी न रमते तत पतिश्च पत्नीश्चाभवताम्' इति पुरुषविधब्राह्मणवच नात्, दपत्योरैच्छिक भेदकत्वावगमेन परमार्थत एतत्स्वरूप स्यैकचैतन्यरूपतावगमात् तदुभयभोगस्यापि एकभोगत्वात् तद्वतीति वा ॥ ॐ एकभोगायै नमः ॥ " > एकरसा । एक अभिन्न रस सामरस्य यस्या सा, रसह्येवाय लब्ध्वानन्दी भवति' इति श्रुते । एक नव रसषु मुख्य शृङ्गाररस यस्या सा तथा । अथवा, एकन परमेश्वरेण अस्या क्रियमाण प्रीत्यतिशयरूप रस एतद्वि षयक यथा सा । अथना एकस्मिन्नेव स्वभर्तरि रम निरतिशयप्रीति अनुरागमज्ञा यस्या सा । अथवा, षड्रसेषु मुख्य मधुररस प्रियत्वेन यस्या सा, सत्त्वगुणप्रधान मायापाधिकचैतन्यस्वरूपत्वात् । रस्या स्निग्धा स्थिरा हृद्या आहारा सात्त्विकप्रिया इति भगवद्वचनात् ॥ ॐ एकरसायै नमः ॥ एकैश्वर्यप्रदायिनी । ईष्टे प्ररयति अन्तर्यामित्वेन सवा fife ईश्वर । 'य सर्वेषु भूतषु तिष्ठन्य सर्वाणि भूता न्यन्तरो यमयति' इति श्रुते । तत्प्रेर्यमाणाना जीवाना भूतशब्दवाच्याना अज्ञानतत्कार्यान्त करणोपहितप्रतिबिम्ब ललितात्रिशतीभाष्यम् । १८७ चैतन्यरूपाणा जाग्रदाद्यवस्थाभिमानिना अखण्ड ब्रह्मसाक्षा त्कारवेलायाम् अभेदानुभवात्, 'तत्त्वमसि' इति श्रुतेश्च 'ए कमेवाद्वितीयम्' इति विशेषितत्वाच्च, एकश्चासावीश्वरश्व ए केश्वर तस्य भाव तदैक्य तत् प्रददातीति तथा । बहुषु वि धनवत्सु को विद्याधनवानित्युक्ते, तत्रत्यजननिष्ठविद्या भावे तदतिशयप्रतीतिवन् एक च निरतिशयमणिमादिकमैश्व ये नि श्रेयस प्रददातीति वा । यद्वा एक मानुष सर्वोत्कृष्ट सार्वभौमत्वादिलक्षणमभ्युदयसामान्यमैश्वर्य प्रददातीति वा तथा ॥ ॐ एकैश्वर्यप्रदायिन्यै नम ॥ एकानपलसाम्राज्यप्रदा चैकान्नपूजिता । एघमानप्रभा चैजदनकजगदीश्वरी ॥ ८ ॥ एकातपत्रसाम्राज्यप्रदा । आतपात् आ समन्तात् अध्या त्माधिदेवताधिभूतानि आ शब्दार्थ । तभ्या जाता तापा आतपा । तपन्ति शाषयन्तीति तपा, आतपस्य त्रायति रक्षतीति आतपत्र सर्वससारदु खोपशमात्मकमात्मज्ञानम् । ५ यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेव यास्यसि इति भगवद्वचनान् । अखिलदु खनिदानाज्ञाननिवर्तक एक लक्षणया अभिन्नब्रह्म विषयकमित्यर्थ । एक च तत् आतपत्र च अखण्डाकार ज्ञानम्, तेन जायमान यत्साम्राज्य सम्राजो भाव सर्वोत्तम १८८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । व तत्प्रददातीति । अथवा, एकातपत्रसाम्राज्य चक्रवर्तित्व तत्प्रददातीति वा ॥ ॐ एकातपत्रसाम्राज्यप्रदायै नमः ॥ एकान्तपूजिता । एकस्य अद्वितीयस्य शोधितत्वपदार्थ- स्य अन्ते उपाधौ हृदि परिच्छेदकत्वात् पूजिता अहमित्य परोक्षीकृता, ' यत्साक्षादपरोक्षाद्रह्म' इति श्रुते । एकस्य ब्रह्मण अन्ते उप पूजिता षद् गत्यवसानार्थयोरिति धातुपा- ठात् उपनिषद्ब्रह्ममात्रतया पर्यवस्यतीत्यर्थ । एकान्तपूजि तति नाम्नोपनिषदित्यर्थ । अथवा, एकान्ते 'गुहानिवाता श्रयेण प्रयोजयेत्' इति श्रुत एकान्तस्थल ध्यानादिना योगिभिर्विषयीकृतेत्यर्थ । अथवा, कामेश्वरेण एकान्ते स्त्री लिङ्गे पूजिता । सप्रदाय प्रवृत्त्यर्थमादौ ईश्वरेण बहिर्यागक मण आदिमसाधनेन सर्गाद्यकाले पूजादिना सतोषितत्वात् भूतार्थव्यपदेश । एकान्ते सवप्रविलापनसमये पूजिता ध्यानादिना मपादिता साक्षत्कृतेत्यर्थ । ' कश्चिद्धीर प्रत्य- गात्मानमै दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्' इति श्रुतेरिति वा ॥ ॐ एकान्तपूजितायै नम' ॥ धमानप्रभा । एधमाना विवर्धमाना सर्वातिशायिनी प्रभा कान्तिर्यग्या सा, ' तमेव भान्तमनुभाति सर्वे तस्य भासा सर्वमिद विभाति' इति श्रुते । ॐ एधमानप्रभायै नमः ॥ ललित । त्रिशतीभाष्यम् । १८९ एजदनकजगदीश्वरी । एजन्ति कम्पमानानि चष्टमाना नि प्राणवन्ति जीवन्ति अनेकानि नानोपाधिकानि जगन्ति जङ्गमानि विश्वरत्प्राणिन इत्यथ । ईष्टे प्रेरयतीति ईश्वरी । स्थावराणा सुखदुखप्राप्तिपरिहारोपायानभिज्ञत्वेऽपि स्वजी तत्राप्यस्तीति , वनहेतुभूतोदकपानादिप्रवृत्तिदर्शनाचेष्टावत्स्व जगच्छन्दो निर्विशेषप्रपभ्वमात्रपरो वक्तव्य अन्यथा 'सर्वे षु भूतेषु' इति श्रुतौ चरप्राणिमात्रपरत्वे सकोचापन्ते । अस ति विराधे सामान्यवाचकस्य शब्दस्य विशेषलक्षणाङ्गीका रस्य न्यान्यत्वात् । अन्यथा ब्रह्मण प्रपश्यमानोत्पत्त्यादिहे तुत्व सकुचित भवेत् । अत एव आकरे एजत्पद उपात्तम् । यथाकथचित क्रियाश्रयत्वेन प्राणवत्त्वमात्रस्य समष्टिहिर ण्यगर्भाश्रयत्वेन सर्वेषा प्रेर्यत्व सभवतीति भाव ॥ ॐ एज दनेकजगदीश्वयै नमः ॥ एकवीरादिसमेत्र्या चैकप्राभवशालिनी । ईकाररूपा चेशित्री चेप्सितार्थप्रदायिनी ॥ ९ ॥ एकवीरादिससेव्या । एक अनितरसाधारण वीर पुरश्चर्यादिना कृतमन्त्रदेवतासाक्षात्कारलब्धपुरुषार्थ पुमान् विजय प्राप्ताभ्युदयशाली । राजराजनिष्ठधैर्यगाम्भीर्यादिगुण ववेन तत्तद्देवतोपासका पुरुषा वीरा इत्युच्यन्ते । यासा १९० ललितात्रिशतीभाष्यम् । शक्तीनामादयो यषा प्राणिकोटीना ता एकवीरादय तासा कदम्बै ससेव्या ससेवितु योग्या । यदा ईश्वरी भक्तान- नुगृह्णाति सगुणविग्रहवती स्यात् तदा अनेकपरिवारदेवताप रिसेविता मन्त्रदेवतात्वेनोपासनीयेत्यर्थ । अथवा, एकवीरा रेणुका, तदादय शक्तय श्यामलाप्रमुखा, ताभिस्तत्काल- प्रपचे स्वस्वपीठे स्थिता सत्य उपासकानामभीष्टवरप्रदा- ज्यो दृश्यन्ते । ता अस्या परिसेवकत्वेन स्वयमभीष्टवर कामा इत्यस्या प्रकृताया महिमातिशयोक्ति ॥ ॐ एक- वीरादिसंसेव्यायै नमः ॥ एकप्राभवशालिनी । प्रभोर्भाव प्राभव रक्षकत्व एक- afratसाधारण च तत्प्राभव च तच्छालक इति तथा । अथवा, प्राभवस्य सापेक्षकधमत्वादेकपदस्य चानन्यगामित्वा र्थस्य सामानाधिकरण्येन स्वारस्येन पर्यालोन्यमानेन अय मर्थ सून्यत । प्राभव च नियम्यलोकोद्भव विना अनुपपद्य मान तदन्तर्गततत्कार्यमर्थापत्त्या सिध्यति । तथा च वटबीजव स्त्वन्तर्गतपश्चाद्भाविकार्यवत्कूटस्थचैतन्यमिति भाव । अथवा, प्राभव नामेश्वरत्व तदाक्लृप्तनियम्यजगच्चोपलक्षणविधया य स्यैकस्याखण्डचैतन्यस्य तदेकप्राभवम् । ' पादोऽस्य सर्वा भू तानि ' ' एकाशन स्थितो जगत्' इति श्रुतिस्मृतिभ्या भूतपूर्व ललितात्रिशतीभाष्यम् । १९१ गत्या प्राभवोपलक्षितमेक सचिचैतन्यरूप शालते आविष्करो ति तथा । अथवा एक च तत् प्राभव च एकप्राभव मुख्य सार्वभौमत्वमिति यावत् । प्रभुत्वपरपराया सविशेषाया कुत्रचित् पर्यवमानावश्यभावे ' एष सर्वेश्वर एष भूताधिप- तिरेष भूतपाल इति श्रुत्या अन्तर्यामितया साक्षात्कृ त्युत्पादकत्वयुक्त्या च इतरवागाद्यवयवप्रेरणातिशयाना प र्याप्तिरवैवास्तीत्यभिप्राय । तथा च निरङ्कुशस्वतन्त्रज गत्कारणत्वरूपतटस्थलक्षणलक्षितवेदान्तसमन्वयविषयीभूता अखण्डसचिदानन्दस्वरूपा परदेवता अवश्य स्वस्वरूपेणैव ध्यातव्येति निष्कृष्टार्थ ॥ ॐ एकमाभवशालिन्यै नमः ॥ ईकाररूपा । इकार रूप तृतीयावयव यद्वाचकमन्त्रस्य यस्य सा तथा ॥ ॐ ईकाररूपायै नमः ॥ ईशित्री । इच्छति ईष्टे इति ईशित्री सर्वप्रेरिका इत्यर्थ ॥ ॐ ईशिश्यै नमः ॥ ईप्सितार्थप्रदायिनी । अर्थ्यन्ते प्रार्थ्यन्ते इत्यर्था अभ्यु दयनि श्रेयसरूपा, आप्नु गन्तु प्राप्त इच्छाविषयीभूता ईप्सिता तेच ते अर्थाचेति कर्मधारय ईप्सितार्थान् ' ' प्रददातीति तथा । केवलकर्मणामदृष्टद्वारा कालान्तरभावि १९२ कलितात्रिशतीभाष्यम् । फलदातृत्वमचेतनत्वान्नापपद्यते । तादृशाना कस्मिन्नप्यर्थे सामर्थ्यादर्शनात् । चेतनाधिष्ठिताना तु कर्मणा भृत्यकृ तपराक्रमादितुष्टराजवत्तदाराधितपरमेश्वर कर्माध्यक्ष इति श्रुत्या सर्वज्ञस्य तदधिकारिकृतपुण्यापुण्यानुरूपतया फल प्रदाने समर्थस्य सत्वकल्पने तदन्यस्य चेतनस्य जीवादेस्तत्र सामध्यविरहात् स एव ततदनुगुणविषयेच्छोत्पादनेन तत्साधनानुष्ठापयिता सन् तत्फलकामना पूरयतीत्यनीश्व रमीमासकमतनिरासो द्रष्टव्य । अथवा, ईप्सिता जिज्ञा सिता, तथा च स्वस्वरूपप्रतिपादकवेदान्तश्रवणमनननिदि ध्यासनविषयीकृता सती अर्थ प्रार्थ्यमान सर्वाभ्यर्हितमो क्षरूप पुरुषार्थ प्रददातीति तथा ॥ ॐ ईप्सितार्थप्रदा यिन्यै नमः ॥ ईदृगित्यविनिर्देश्या 'चेश्वरत्वविधायिनी । ईशानादिब्रह्ममयी चेशित्वाद्यष्टसिद्धिदा ॥ ईदृगित्यविनिर्देश्या । ईदृक् एतल्लक्षणलक्षित एतादृश परिमाण एवस्वरूप एतादृशधर्मवानिति प्रत्यक्ष सिद्धार्थो विनिर्देष्टु शक्यते । ' यचक्षुषा न पश्यति' इत्यादिश्रुत्या सर्वेन्द्रियगोचरत्वनिराकरणात् विनिर्देश्या न भवति । औ पनिषदाना मते तु उपनिषदा वेदैकदेशत्वेन इतर प्रमाणा ललितात्रिशतीभाष्यम् । १९३ नपेक्षतया अज्ञातार्थज्ञापकत्वेन प्रामाण्यमुररीकृतम् । इद मेव एतादृगेवेति प्रत्यक्षसिद्धार्थज्ञापने तासामनुवादकत्वेन सापेक्षत्वरूपमप्रामाण्य प्रसज्येतेत्यभिप्राय । ॐ ईगि त्यविनिर्देश्यायै नमः ॥ ईश्वरत्वविधायिनी । ईश्वरस्य भाव तत्रैक्य विदधाति आवरणविक्षेपशक्तिमदज्ञाननिवर्तकाखण्डाकारचैतन्यस्वरूपा सती भेदबुद्धिमानसपादितैश्वर्यैक्यायोगभ्रम निवर्तयती त्यर्थ, ' स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ' इति श्रुते । अथवा, ईश्वरल नाम नानादेश विद्याधनोत्कर्षादिमत्त्व तत्तत्प्राणिनि काय पुण्य प्रारब्धानुसारेण कर्मफल प्रयच्छतीति वा । ॐ ईश्वरत्वविधायिन्यै नमः ॥ ईशानादिब्रह्ममयी । ईशानतत्पुरुषाघोरवामदेवसद्योजाता- ख्यानि पञ्च ब्रह्माणि तानि मय स्वरूपमस्या अस्तीति सा तथा । अथवा, ईशान आदिर्येषा ते तथा अधिकारिपुरुपा विष्णुब्रह्मेन्द्रादय, तेषामपि तत्तन्नामरूपविशिष्टानाम् अहबु द्धिमताम् अन्तर्यामिखरूपेण बुद्धिप्रेरक सचिदानन्दस्वरूप- परब्रह्मानन्दप्रकाशात्मना स्फुरतीति तथा । ॐ ईशानादि ब्रह्ममय्यै नमः ॥ ईशित्वाद्यष्टसिद्धिदा । ईशित्वमादिर्यासा तास्तथा । ' अ SU VII 13 १९४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । णिमा महिमा लघ्वी गरिमा प्राप्तिरीशिता । प्राकाम्य च वशित्व च यत्र कामा परागता इति वचनात् । ता सिद्धीरष्टौ ददातीति तथा । अणिमा क्षणमात्रेण अतिसू क्ष्मभाव । महिमा महतो भाव । लघ्वी लाघव । गरिमा गुरोर्भाव, जडतरपवतादिवत् भारवशेनाप्रकम्पित्वमित्य थे । क्षणमात्रेण विराडाकृतिमत्त्व प्राप्ति । हस्तेन चन्द्र- मण्डलादिस्पर्श इशिता इन्द्रादीनामपि प्ररकता । प्रा- काम्य अप्रतिहतका मनावस्वम्, वाञ्छितार्थफलप्राप्तिरित्यर्थ । वशित्व सर्वलोकवशीकरण मामर्थ्यम् । यत्र कामा परा- गता काम्यन्त इति कामा विषया यत्र यस्मिन् एश्वर्य सति परागता बहिर्भूता भवन्ति, विषयाणामनुभवाभावे ऽपि तज्जन्यसुखवत्त्व आप्तकामत्वमित्यर्थ । एता अष्ट सिद्धय । ॐ ईशित्वाद्यष्टसिद्धिदायै नमः ॥ ' ईक्षित्रीक्षणसृष्टाण्डकोटिरीश्वरवल्लभा । • ईडिता चेश्वरार्धाङ्गशरीरेशाधिदेवता ॥ . ईक्षित्री । उदासीनद्रष्ट्री साक्षिणी असगोदासीनज्ञानस्व- रूपेत्यर्थं 'साक्षी 'चेता' इति श्रुते, 'आवि सनिहित गुहायाम्' इति श्रुते । ॐ ईक्षित्र्यै नमः ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । १९५ ' ' ईक्षणसृष्टाण्डकोट । अण्डाना ब्रह्माण्डाना कोटय असख्याता भूतभाविकालभेदेन बहुवचन कोटिशब्दस्य, अनादित्वात् ससार मण्डलस्य, ईक्षणेन भाविकार्यालोचनेन सृष्टा अण्डकोटयो यया सा तथा, तदैक्षत बहु या प्र जायेयेति' ' स ईक्षाचक्रे' 'आत्मा वा इदमेकमग्र आ सीत् नान्यत्किंचन मिषत् स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति स इमालोकानसृजत' इत्यादिश्रुते, बाह्यकारणमनपेक्ष्य ऊर्ण नाभ्यादिदृष्टान्तप्रदर्शनेन चेतनस्याभिन्ननिमित्तोपादानप्र- दर्शनयुक्ते, 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्' इत्यादे- वेति भाव । ॐ ईक्षणसृष्टाण्डकोटये नम ॥ ईश्वरवल्लभा । ईश्वर कामेश्वर वल्लभ पति यस्या सा तथा । ईश्वराणा ब्रह्मविष्णुरुद्रादीना तत्तनिष्ठमहिमो त्कर्षरूपेण प्रीत्यतिशयविषयत्वेन अभ्यर्हितेत्यर्थो वा । ॐ ईश्वरवल्लभायै नमः ॥ ईडिता । ईड स्तुताविति धातुपाठात् स्तुतिभि विषयी वेदान्तैरिति शेष ' एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य ' इत्यादिश्रुते । ॐ ईडितायै नम ॥ कृता, स्य , ईश्वरार्घाङ्गशरीरा । ईश्वरस्य सचिदानन्दात्मकस्य शिव अर्ध च तत् अङ्ग च अर्धाङ्गम् । आनन्दस्वरूपता शरीर १९६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । शरीरवत्स्वरूपलक्षण यस्या सा तथा । ' सञ्चिन्मय शिव साक्षात्तस्थान दमयी शिवा' इति स्मृते । अथवा, ईश्वर- स्यार्धाङ्ग वामभाग शरीर मूर्तिर्यस्या सा । अथवा, ईश्वरस्य इकारस्य अर्धाङ्ग शक्तिबीज शरीर मन्त्रात्मिका मूर्तिर्यस्या सा तथा । ॐ ईश्वरार्धाङ्गशरीरायै नमः ॥ ईशाधिदेवता । ईशस्येत्युपलक्षण जीवस्यापि, ईशस्य तत्पदवाच्यार्थस्य मायोपाधिकस्य विशिष्टस्य अधि उपरि विशेषणद्वयस्य परित्यागे देवता द्योतमाना कूटस्थचिन्मात्रशो- fadnaपदार्थरूपेत्यर्थं । अथवा, ईश कामेश्वर अधि देवता पूज्या यस्या सा तथा । परमपतिव्रतेत्यर्थ ॥ ॐ ईशाधिदेवतायै नमः ॥ ईश्वरप्रेरणकरी चेशताण्डवसाक्षिणी । ईश्वरोत्सङ्गनिलया चेतिबाधाविनाशिनी ॥ ईश्वरप्रेरणकरी । ईश्वरस्य बिम्बचैतन्यस्य स्वरूपा सती जगत्सर्जनादिकार्यप्रेरथिश्री प्रेरणकरी आज्ञापकेत्यर्थ । इच्छाज्ञानक्रियाशक्त्यावरणविक्षेपशक्तिप्रतिफलितचित्स्वरूपा भाविकार्यानुकूलप्रारब्धाध्यक्षपरमेश्वरेक्षणनामधेयप्रकाशात्मि का भवतीति भाव । ईश्वरप्रेरण तदाज्ञामनुल्लङ्घनेन क- ललितात्रिशतीभाष्यम् । १९७ रोतीति वा, तदीयभार्यात्वेन नितरा तद्वश्येति यावत् ॥ ॐ ईश्वरप्रेरणकर्यै नमः ॥ ईशताण्डवसाक्षिणी । इशस्य तत्पदवाच्यार्थस्य ताण्डव नर्तनवदप्रयत्नसपाद्य लीलामात्रमित्यर्थ, जगत्सर्जनादिरूपा क्रिया चलनरूपकर्मत्वसामान्यात, तस्य साक्षिणी अस सर्गप्रकाशरूपिणीत्यथ, ' असगो न हि सज्जते ' इति श्रुते । अथवा, ईशताण्डवस्य परमेश्वरनृत्यनाट्याभिव्यञ्जितचतुष टिकलोपदेशम्य साक्षिणी । तदुक्तम' नर्तनाद्धि परेशस्य । चतु षष्टिकलाजनि ' इति प्रदोषस्तोत्रे ईशताण्डव नर्तनवर्णन मतिस्फुटमिति नेह लिख्यते ॥ ॐ ईशताण्डवसाक्षिण्यै नम ॥ ईश्वरोत्सगनिलया । ईश्वरस्य स्वभर्तु उत्सग ऊरू तौ निलय यस्या सा तथा ॥ ॐ ईश्वरोत्सगनिलयायै नमः ॥ इतिबाधाविनाशिनी । ईतिबाधा देवायुपद्रव, क्षुद्र जन्तुपीडा वा, ता विनाशयतीति तथा ॥ ॐ ईतिबाधा विनाशिन्यै नम ॥ ईहाविरहिता शशक्तिरीषत्स्मितानना । लकाररूपा ललिता लक्ष्मीवाणीनिषेविता । १९८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । ईहाविरहिता । अप्राप्तप्राप्तिं प्रति इच्छा ईहा, तया विरहिता, आप्तकामत्वात् तद्विरहितेत्यर्थ ॥ ॐ ईहावि- रहितायै नमः ॥ ईशशक्ति । ईशम्य शक्ति सर्वज्ञत्वादिस्वरूपसामर्थ्य य- स्या सा तथा, 'देवात्मशक्तिम' इति श्रुते ॥ ॐ ईशशक्तये नम ॥ इषत्स्मितानना । इषत् स्मित मन्दहास यस्य तन् तथा, तादृगानन यस्था सा तथा, पर्याप्तकामत्वेन सर्वदा प्रसन्न मुखीत्यर्थ । दुखास्पर्शिपरमानन्दरूपतया वा तथा ॥ ॐ ईषत्स्मताननायै नम ॥ लकाररूपा । रूप्यत इति रूप मन्त्रस्य चतुर्थवर्णत्वेन ज्ञापक यस्या सा तथा ॥ ॐ लकाररूपायै नम ॥ ललिता ' ललित त्रिषु सुन्दरम इति वचनात् अ त्यन्तसौन्दर्यवतीत्यर्थ । अनुपमसौन्दर्या वा ॥ ॐ ललि तायै नमः ॥ 1 लक्ष्मीवाणीनिषेविता । लक्ष्मी रमा सर्वैश्वर्यशक्ति, वाणी सरस्वती सर्वज्ञानशक्ति, ताभ्या नितरा अकृत्रिमप्रेम्णा अनन्यभूता सती सेविता । सेवानाम उन्मीलिताज्ञाप्रतीक्षा, तद्वत्स्वादित्यर्थ ॥ ॐ लक्ष्मीवाणी निषेवितायै नम ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । १९९ लाकिनी ललनारूपा लसद्दाडिमपाटला । ललन्तिकालसत्फाला ललाटनयनार्चिता ॥ लाकिनी । क सुखम्, ' क ब्रह्म इति श्रुते तन ' भवतीत्यक ब्रह्मभिन्नतया प्रतीयमान दुखात्मक जगत् अकम्, लीयत इति लम्, उपलक्षणमुत्पस्यादे लभक , मस्यास्तीति लाकिनी, अनृतजडदु खरूपजगत्कारणतव्यावृ- तस्वरूपब्रह्मभूता इत्यर्थ ॥ ॐ लाकिन्यै नम ॥ ललनारूपा । रूप्यते ज्ञाप्यते अनेनेति रूप ज्ञापक तब्या प्यलिङ्ग चिह्नमिति वा, ललनाना स्त्रीणा रूप वेष आभर णायलकारो वा आकृतिर्वा यम्या सा तथा, ललना स्त्रिय रूपाणि भूतय यस्या सा तथा, 'लिङ्गाङ्कितमिद पश्य जगदेतद्भगाङ्कितम' इति पुराणवचनात् ॥ ॐ लल नारूपायै नम ॥ लसद्दाडिमपाटला । दाडिमशब्दन विकसित तत्पुष्प लक्ष्यते, लसत् सद्या विकसनप्रकाश च तद्दाडिम च इद उपलक्षण बन्धूकादीनाम्, तद्वत्पाटला श्वेतमिश्ररक्तवर्ण प्रधानमूर्तिमतीत्यथ 'श्वेतरक्त तु पाटलम्' इति वचनात् । ॐ लसद्दाडिमपाटलायै नमः ॥ ' ' २०० ललितात्रिशतीभाष्यम् । ' ललन्तिकालसत्फाला । ललन्तिकया परित मुक्ताफल खचितनवरत्नमध्यया ललाटमध्यदेशभूषया इदमुपलक्षण ललाटपट्टादीनाम्, लसत् फाल यस्या सा तथा ॥ ॐ ललन्तिकालसत्फालायै नमः ॥ ललाटनयनार्चिता । ललाटे नयन येषा ते, अन लला शब्देन भ्रूमध्य लक्ष्यते, नयनशब्देन ज्ञानमपि, तथा चोर्ध्वदृष्टिभि खेचरीमुद्रया विलीनचित्तै असिवरुणयोर्म ध्यदेशाभिधानाविमुक्तकृतपरमेश्वराराधनपर पुरुषप्राप्यत्वाभि घायकात्रिप्रश्नोत्तरजाबालश्रुतिगतयाज्ञवल्क्योत्तरवाक्य निर्दि ष्टभूमिकाजयसिद्धिमत् पुरुष अर्चिता साक्षात्कृतेत्यर्थ । अथ वा, तृतीयनेत्रवता शिवेन तत्स्वरूप रुद्रैर्वा पूजितेत्यर्थ । ॐ ललाटनयनार्चितायै नमः ॥ लक्षणोज्ज्वलदिव्याङ्गी लक्षकोट्यण्डनायिका । लक्ष्यार्था लक्षणागम्या लब्धकामा लतातनु ॥ लक्षणोज्ज्वलदिव्याङ्गी । दीप्यते प्रकाशत इति दिव्य लक्षणै स्वरूपतटस्थनामकै उज्ज्वल शोभित शुद्धम् अङ्ग स्वरूप विग्रहो वा । घृताकठिन्यन्यायेन ' तदात्मान स्वय मकुरुत' इति श्रुत सच्चिदानन्दघनीभूतजीवात्मको विग्रहो ललितात्रिशतीभाष्यम् । २०१ यस्या सा तथा । अथवा, सामुद्रिकशास्त्रोक्तदिव्यलक्षणे रुज्ज्वलानि मपूर्णानि दिव्यानि यानि अङ्गान्यवयवा शिर पाण्यादय अस्या सन्तीति वा तथा ॥ ॐ लक्षणोज्ज्वल दिव्याङ्गयै नमः ॥ लक्ष कोट्यण्डनायिका । लक्षानि च कोट्यश्च असख्या तापरिमितानीत्यर्थ, ससारस्यानादित्वेन भूतभविष्यदा दिभेदेन बहुसख्यावश्वमण्डानाम्, तानि च तान्यण्डानि च हिरण्यगर्भविराडूपाणि समष्टिव्यष्टधात्मना विश्वतैजसापा धिभूतानि तेषाम अधिष्ठानविम्बचैतन्यात्मना नयति स्वस तामापादयतीति नायिका ॥ ॐ लक्षकोट्यण्डनायिकायै नम ॥ ' लक्ष्यार्था । लक्षणया शोधनया जहदजहल्लक्षणया वा प्रतिपाद्यते वेदान्तमहावाक्याना योऽर्थ तत्स्वरूपा । अथ वा, योगशास्त्रप्रसिद्धबहिरन्तरूर्ध्वाध प्रदेशविशेषरूप भूमिका सु स्वस्वमनोवाञ्छाविषयविशेषणत्वन निर्गुणत्वन वा मना विलयरूपहठराजयोगादिसाधनपरिपाकवशेन साक्षात्कृत चै तन्य लक्ष्य इत्युच्यते, अर्ध्यते याच्यते गुरु प्रति इति अर्थ, लक्ष्यो योऽर्थ चित्स्वरूपपरमानन्दरूप सोऽपि सैवेति तथा, 'ब्रह्मैवेदममृत पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्त २०२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । रेण' इति श्रुते ॥ ॐ लक्ष्यार्थायै नमः ॥ लक्षणागम्या । लक्षणानाम शक्यार्थे वाचकस्य पदस्य अन्वयाद्यनुपपत्त्या तत्सबन्धिपदार्थान्तरज्ञानहेतु शक्य सबन्धादिपदजन्यपदार्थान्तरज्ञानहेतु शब्दवृत्तिरित्युच्यते, तस्या वाच्यवाचकतत्सबन्धादि भेदज्ञान पूर्विकाया परिच्छि नसावयवपदार्थसबन्धज्ञानहेतो केवलचिन्मात्रे निरुपाधि के वस्तुनि षष्ठीजात्यादीना लक्ष्यतावच्छेदकधर्माणामभावे प्रवृत्त्ययोगात् तथा अगम्या, गन्तु ज्ञातु योग्य गम्य तन्न भवतीत्यगम्या । वेदान्तमते जहदजहल्लक्षणया विशेषण- मात्र परित्यागस्य अन्यान्यतादात्म्यानुपपत्त्या बोधितत्वात् तदर्थं सा अवश्यमङ्गीकर्तव्या । विशेष्यस्य ज्ञानस्वरूप त्वेन नित्यतया लक्षणाजन्यत्वात् तदर्थ सा न अपेक्ष्यत इति भाव । तथा च प्रकृताया देवताया शुद्धचैत न्यमात्र स्वरूपतया स्वय प्रकाशत्वेन लक्षणागोचरत्वात लक्षणागम्येति नाम युक्तमिति भाव ॥ ॐ लक्षणा- गम्यायै नमः ॥ लब्धकामा । लब्धा काम्यन्त इति कामा ऐहिकामु- ष्मिक सुख साधनानि, लक्षणया तत्तज्जन्यसुखानि वा तथाभूता कामा यया सा तथा पर्याप्तकामेत्यर्थ, ललितात्रिशतीभाष्यम् । २०३ 'पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामा इति श्रुते ॥ ॐ लब्धकामायै नमः ॥ , लतातनु । लता इव लता कल्पादिवल्लय सकलपुरु- षाथप्रदत्वेन जगति प्रसिद्धा ' ता इव सुकुमारत्वाद्याश्रया तनु मूर्ति यथा सा तथा ॥ ॐ लतातनवे नम ॥ ललामराजदलिका लम्बिमुक्तालनाञ्चिता । लम्बोदरप्रसूर्लभ्या लज्जाढ्या लयवर्जिता ॥ ललामराजदलिका । ललान्ना कस्तूरीतिलकेन कस्तूरी पत्रण वा राजत् विभ्राजत् परमशाभि अलिक ललाट यस्या सा तथा ॥ ॐ ललामराजदलिकायै नम ॥ सा लम्बिमुक्ताला चिता । लम्बिन्य लम्बमाना अध प्रसृता मुक्तालता हारा मुक्ताफलानि वा यस्या तथा । नवरत्नखचित सुवर्णमुक्तागुच्छे सर्वाङ्गेषु प्रलम्ब मानै ललाटपर्यन्त लम्बमानकिरीटप्रथम भागललाटपट्टना- साताटङ्काध कर्णदेशकण्ठप्रदेशहस्त चतुष्टयाङ्गदसमानप्रदेश- कूर्पासपरित पदकाप्रदेशकटिनिबद्ध काव्यादिषु परिलम्बमा नैरित्यर्थ ॥ ॐ लम्बिमुक्तालताश्चितायै नमः ॥ २०४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । लम्बोदरप्रसू । लम्बोदरस्य महागणेशस्य प्रसू जन- freat मातेत्यर्थ । लम्बोदर प्रसूत इति वा ॥ ॐ लम्बो- दरप्रसवे नम ॥ लभ्या। ससारदशायाभावारकाज्ञानेन स्फुटमप्रकाशमा- ना सती श्रवणादिसस्कृतान्त करणवृत्तावखण्डाकारज्ञानभू- मिकाया प्रतिफलितस्वरूपेण विस्मृतकण्ठगतकनकभूषणवत् प्राप्तप्राप्तिरूपतया लब्धु योग्येति तथा ॥ ॐ लभ्यायै नम ॥ लज्जाढ्या । लज्जया, उपलक्षणमन्त करणधर्माणा सर्वे- षाम्, आढ्या तद्वत्वेन आकारवतीत्यर्थ । तिरोधानादिना अन्तर्हिता सती वरादि प्रयच्छतीति लज्जाढ्या भवतीति च उपचर्यते ॥ ॐ लज्जाढ्यायै नमः ॥ ' , लयवर्जिता । ' अविनाशी वा अरेऽयमात्मा अनुच्छि तिधर्मा' इत्यादिश्रुत लयो विनाश तेन रहिता वर्जितेत्यर्थ । इदमुपलक्षण षड्भावविकाराणाम्, सत्य ज्ञानमनन्त ब्रह्म' इत्यादिश्रुते ॥ ॐ लयवर्जितायै नमः ॥ ह्रींकाररूपा ह्रींकारनिलया ह्रींपदप्रिया । ह्रींकारबीजा ह्रींकारमन्त्रा ट्रीकारलक्षणा ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २०५ ह्रींकाररूपा । ह्रींकार रूप्यते निरूप्यते निर्देश्यत इति रूप मन्त्रपश्वमावयव यस्या सा तथा । ॐ ह्रींकार रूपायै नमः ॥ कारनिलया। श्रीमक्षर निलय गृहबदवच्छेदक यस्या सा तथा । स्वीयवाचकत्वारोपितवाच्यतावच्छेदकधर्माव- किशतादिसपादनेन गृहवर्तिपुरुषवत् व्यावृत्तस्वरूपेण ज्ञा पक भवति । अन्यथा, नाम्नो वाच्यार्थे प्रवृत्त्ययोगादिति भाव । ॐ ह्रींकारनिलयायै नमः ॥ ' पदप्रिया । पद्यते गम्यते ज्ञायते अनेनेति पदम् पद्यत गम्यते प्राप्यत इति वा पदम्, ह्रींकारस्य मन्त्रावयवत्तया तद्देवताप्रकाशकत्वेन तस्या शक्तत्वात्- 'शक्त पदम् ' इति तल्लक्षणत्वात् तथा प्रथम व्याख्यानम् । हकाररेफेकारानुस्वारा णा वर्णाना समष्टिस्वरूपेण समुदायात्मकत्वात् ' वर्णसमुदाय पदम' इत्यपि पदलक्षणवत्त्वमस्य घटते । पुरश्चर्यावता स्वदेव तासाक्षात्कारद्वारा सक्ळपुरुषार्थप्रापकत्वात् द्वितीयव्याख्यान तथा कृतम् । तस्मिन् प्रिया प्रीतिमतीत्यर्थ ॥ ॐ ह्रींपदप्रि- यायै नमः ॥ " ह्रींकारबीजा । ह्रींकार एव बीज स्ववाचकमन्त्रभाग 'ज्ञापक देवताना यत् बीजमक्षरमुच्यते ' इति वचनात् ह्रीं- २०६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । कारस्य मायाप्रकाशकत्वेन, वटधानादि स्वनिष्ठवृक्षाभिव्य ञ्जकत्वेन कारणतया यथा बीजमित्युच्यते - सत्कार्यवादिना- मव्यक्तनामरूपकारण बीजम्, अभिव्यक्तनामरूपात्मक पश्च । द्भावि कार्यमित्यङ्गीकार, सकलकारणसमवधाने विशेषनाम- रूपवत्तया कारणस्याभिव्यक्तिरुत्पत्ति तथा चोक्तबीजस्य ' ' मायावच्छिन्न चैतन्याभिव्यञ्जकत्वेनापि बीजत्वम्, तादृश ह्रींकारबीज यस्या सा तथा ॥ ॐ ह्रींकारबीजायै नमः ॥ ह्रीकारमन्त्रा । ह्रींकारस्य मननात् त्रायत रक्षति वाच्य- वाचकयोरभेदादिति तथा । ह्रीकारघटितो मन्त्रो वा यस्या स्वा इति वा तथा ॥ ॐ ह्रींकारमन्त्रायै नमः ॥ ह्रींकारलक्षणा । हकार शिव, आकाशबीजत्वादाकाश- निर्लेप रेफ वह्निबीज कार्योत्पादसनिहित शक्तिमदी श्वरवाचकम, तथा च हकारयुक्तरेफ शुद्धचैतन्यमेव कारणतावच्छिन्नम् - इति वदति । ईकार मन्मथबीज तत्कारणलक्षकतया स्थितिहेतु विष्णुरूपचैतन्यमभिदधाति । अनुस्वारस्तस्मिन्नेव पदार्थे अभिन्ननिमित्तोपादाने लय वक्ति । तथा च हीमित्युक्ते जगदुत्पत्तिस्थितिलयकारण चैतन्य शक्त्या वाच्यार्थ प्रतीयते । तस्यैवोपाधिपरित्यागरूपलक्षण यस्या सा तथा । ह्रींकार लक्षण तटस्थलक्षण यम्या ललितात्रिशतीभाष्यम् । २०७ सेति वा तथा ॥ ॐ ह्रींकारलक्षणायै नमः ॥ ह्रींकारजपसुप्रीता ह्रींमती ह्रींविभूषणा । ह्रींशीला पदाराध्या गर्भा ह्रींपदाभिधा ॥ ह्रींकारजपसुप्रीता । ह्रींकारस्य जप ह्रींकारजप, तेन सुप्रीता ॥ ॐ ह्रींकारजपसुप्रीतायै नम ॥ ह्रींमती । वाचकत्वेन लक्षकत्वेन वा लक्ष्यपदार्थरूपेण वा वाक्यवाचकयोरभेदेन वा अस्या अस्तीति ह्रींमती ॥ ॐ ह्रींमत्यै नमः ॥ ' ह्रींविभूषणा । केवलजडमायावाचक ह्रींकार, तथा हि - हकार श्वेतवाचक, रेफ रोहिताथक, ईकार नीला थक तथा च विशिष्टस्य शुक्लरतनीलवत्पदार्थवाचक तया सत्वरजस्तमोगुणवत्प्रकृतिवाचकत्वेन परिच्छिन्नानृत जडदु खस्वरूपवाच्यार्थकतया प्रकाशराहित्येन अनुपादेय ताया सत्या तदवच्छिन्न स्वप्रकाशचैतन्याकारतया विशिष्टा र्थस्य आपादमस्तकभूषित तरुणीवदानन्दस्वरूपतया तद्वाच कहींपदस्य अष्टैश्वर्यसिद्धिप्रदानशक्त्याधायकतया शोभायमा न भूषणवत् ' कुण्डली पुरुष ' इत्यत्र कुण्डलस्योपलक्षणतया इतरसजातीयादिव्यावर्तकत्वम्, तथास्यापि बीजस्येतरव्या वृत्तवाच्यार्थगोचरप्रमाजनकत्वेन भूषणवत् यस्या सा " २०८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । तथा ॥ ॐ ह्रीं विभूषणायै नम ॥ हशीला । हीमित्यनन तद्वाच्यार्था ब्रह्मविष्णुरुद्रा लक्ष्य ते, तेषा शील स्वभाव पारमार्थिक रूप सच्चिदान न्दात्मकता यस्या सा तथा तन्निष्ठधर्मा सत्त्वरजस्तमा गुणादयो वा यस्या सा तथा, 'शील स्वभावे धर्मे च इति वचनात् ॥ ॐ ह्रींशीलायै नमः ॥ पदाराध्या । ह्रीपदन एकाक्षरबीजमन्त्रेण आराधितु योग्या तथा । 'ह्रींकारेणैव ससिद्धो भुक्तिं मुक्तिं च विन्द ति' इति भुवनेश्वरी कल्पवचनादिति यावत् ॥ ॐ ह्रींप दाराध्यायै नमः ॥ ह्रींगर्भा । ह्रीं शब्दार्था सगुणमूर्तयस्तिस्र गर्भे स्वस्व रूपे सशक्तिका अविनाभावसबन्धेन यस्या सा तथा, 'मम योनिर्महद्रा तस्मिन् गर्भे दधाम्यहम्' इति वचनात् ॥ ॐ गर्भायै नमः ॥ हृींपदाभिधा । ह्रींकार अभिधा नाम यस्या सा तथा । समष्टिरूपाया समष्टिशब्दवाच्यत्वनियमादित्यभिसंधि ॥ ॐ ह्रींपदाभिधायै नम ॥ ह्रींकारवाच्या ह्रींकारपूज्या ह्रींकारपीठिका । ह्रींकारवेद्या ह्रींकारचिन्त्या ह्रीं ह्रींशरीरिणी ॥ ललितात्रिशती भाष्यम् । २०९ हूकारवाच्या मायोपाधिकब्रह्मणि कल्पितधर्मेण शब्दप्रवृत्त्युपपन्त ह्रींपदस्य वाच्या रूढयेत्यर्थ ॥ ॐ ह्रीं कारवाच्यायै नमः ॥ ह्रींकार पूज्या । 'मूलमन्त्रेण पूजयेत्' इति पूजाङ्गत्वन मू लमनोर्विनियोग श्रूयते । मूलमनुश्च देवताया स्वक नामेति वचनात् । अन्तमुखानामेव मन्त्रशास्त्रेषु तन्नान्ना व्युत्पन्नत्वा न्। कार नमोऽन्तमुच्चार्य यथागुरुमप्रदाय श्रीचक्रादौ मूलदेवता पूजनीयेत्यागमरहस्यात् हॉबीजेनैव पूजयितु यो ग्या । अतिप्रियबीजनामत्वादित्यभिप्राय ॥ ॐ ह्रींकार पूज्यायै नम ॥ ह्रींकारपीठिका । अत्र पीठशब्द आधारलक्षक । वा स्यार्थो हि वाचकशब्दस्य सत्ताप्रदत्वेन आधारो भवति । मन्त्रदेवतयारभेदेऽपि अर्थनिष्ठमहिम्न तद्वाचकपदे ऽदृश्यमा- नत्वात् कल्पितभेद सपाद्येदमुच्यते । ह्रींकारस्य पीठिका वृत्तिस्थान शक्त्या गोचरतया विषयीभूतत्यर्थ ॥ ॐ ह्रींका रपीठिकायै नमः ॥ siकारवेद्या । स्वरूपत निगुणब्रह्मतया अज्ञानविषयत्वा- श्रयत्वाभ्यामप्राप्तपुरुषार्थरूपतया समाग्दशाया प्रतीयमान- त्वात् गुरूपसदन श्रवणादिरूपविध्यप्रामाण्यनिरासाय लक्ष- SU II 14 २१० ललितात्रिशतीभाष्यम् । या शुद्धस्वरूपपरमानन्दतया प्रेप्सितत्वात् श्रवणादिजन्य- वृत्तिव्याप्यत्वरूपवेदनाविषयत्वम् । ' ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय वृत्ति व्याप्तिरितीर्यते ' ' मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेताम्' इत्यादि वचनात् भगवताप्यङ्गीकृतमिति । हूँ।कारेण गुरुमुखोद्भूतेन वेद्या वेदितु योग्या । तत्स्वरूपपरिज्ञानद्वारा तत्प्राप्तिरूपपु रुषार्थहेतुत्वादिति तात्पर्यम् ॥ ॐ ह्रींकारवेद्यायै नमः ॥ ह्रींकारचिन्त्या । अस्य बीजस्य पश्चप्रणवान्तर्गतत्वेन ॐकारभेदे ब्रह्मप्रतीकत्वाविशेषात् । प्रणवे यथा परापरत्र- ह्यापासनहेतुवदस्मिन वा प्रतीके तद्भवतीति विकल्प । यदा भक्तिपार्थक्येन मन्त्रविशेषेषु भवतीति योगवेदमार्गरहस्य न वादजल्पाद्यवकाश । ह्रींकारे उभयविधब्रह्मस्वरूपतया चि- न्तितु योग्या । ध्यानस्य साक्षात्कार प्रत्यारादुपकारकत्वेन ध्यातव्येत्यर्थ ॥ ॐ ह्रींकारचिन्त्यायै नमः ॥ ह्रीं हृन् हरण इति धातुपाठात् समस्तविधैश्वर्यप्रदा नादिशक्त्यारोपाधिष्ठानत्वे सत्यपवादावशेषितपरमानन्दरूप मुक्तिरित्यथ ॥ ॐ ह्रीं नम ॥ ड्रींगरीरिणी । मूलमन्त्रात्मिकेति यावत् हीमेव शरीर मूर्तिरस्या अस्तीति शरीरिणी । ॐ ह्रांशरीरिण्यै नम ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २११ हकाररूपा हलधृक्पूजिता हरिणेक्षणा । हरप्रिया हराराध्या हरिब्रह्मेन्द्रवन्दिता ॥ हकाररूपा । हकार रूप षष्ठावयव मूलविद्या वाच्यार्थवाचक यस्या सा, तथा ॥ रूपायै नमः ॥ यस्या सा, ॐ हकार- हलधृक्पूजिता । हल युग धरति इति हलधृक् बल राम तेन पूजिता ध्यान दिभिराराधितेत्यर्थ ॥ ॐ ह् ' लधृक्पूजितायै नमः ॥ , हरिणेक्षणा । हरिण्या एण्या ईक्षणमिव ईक्षण यस्या सा तथा अतिसतोषेण कातराक्षीति भाव । सर्वत्र स- र्वदा सर्वद्रष्ट्रीति वा । भकेष्वादरहेतुदर्शनवतीति भाव ॥ ॐ हरिणेक्षणायै नम ॥ हरप्रिया । हरय प्रिया शिववल्लभेत्यर्थ । हर प्रियो यस्या सा इति वा ॥ ॐ हरप्रियायै नमः ॥ हराराध्या । हरेण स्वभर्ना आराधितु योग्या, केवलस- चिदानन्दस्वरूपत्वात् ॥ ॐ हराराध्यायै नमः ॥ हरिब्रह्मेन्द्रवन्दिता । हरि रमेश । ब्रह्मा वाणीश । २१२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । इन्द्रो देवश उपलक्षण सर्वदेवभेदानाम । तैर्वन्दिता नम स्कृता ॥ ॐ हरिब्रह्मेन्द्रवन्दितायै नम ॥ हयारूढासेविताङ्घ्रिर्हयमेधसमर्चिता । हर्यक्षवाहना हसवाहना हतदानवा ॥ हयारूढा सेविताहि । हयारूढानाम अश्वमात्रसेनानी शक्ति वश्यकरी । तया सेवितो अडी यस्या सा तथा ॥ ॐ हयारूढासेवितायै नम ॥ हयमेधसमर्चिता । इयमेधेन अश्वमेधेन समचिता पू जिता । पुरुषत्वादिप्रात्यै इलादिभिरित्यथ ॥ ॐ हयमेध समर्चितायै नमः ॥ " हर्यक्षवाहना । वाहयतीति वाहनम् हयक्ष केसरी वाहन यस्था सा तथा । महालक्ष्मीरूपदुर्गेत्यर्थ ॥ ॐ हर्यक्षवा- नायै नमः ॥ , हसवाहना । हन्ति गच्छतीति इस सूर्य प्राणो वा, वाहनवत् आधारभूतप्रतीकमित्यर्थ, अभिव्यक्तिस्थानमिति यावत्, 'म यश्चाय पुरुषे । यश्चासावादित्ये । स एक इति श्रुते । अथवा, हसवाना ब्राह्मीरूपेणेत्यर्थ ॥ ॐ हंस वाहनायै नमः ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २१३ हतदानवा । हता दानवा अनेकप्रकारशक्तिरूपधरया भण्डासुरादय यया सा तथा ॥ ॐ हतदानवायै नमः ॥ हत्यादिपापशमनी हरिदश्वादिसेविता । हस्तिकुम्भोक्तुकुचा हस्तिकृत्तिप्रियाङ्गना ॥ हत्यादिपापशमनी । हत्या ब्रह्महत्या आदिर्येषा तानि तथा पापानि शमयतीति तथा, 'हरिहरति पापानि ' इति वचनात् ॥ ॐ हत्यादिपापशमन्यै नमः ॥ हरिदश्वादिसेविता । हरित् हरिद्वर्ण मरकत इव अश्वो यस्येन्द्रस्य स तथा आदिर्येषा दिक्पतीना तै सविता चर णारविन्दसनिधिं किंकरतयाश्रितेत्यथ ॥ ॐ हरिदश्वा दिसेवितायै नमः ॥ हस्तिकुम्भोक्तुङ्गकुचा । हस्त अस्यास्तीति हस्ती, तभ्य कुम्भौ तद्वदुन्नतौ कुचौ सान्द्रौ यस्या सा तथा ॥ ॐ स्तिकुम्भोगकुचायै नम ॥ हस्तिकृत्तिप्रियाङ्गना । हस्तिन कृत्तौ चर्मणि प्रिय प्रीतिमान् शिव तस्याङ्गना भामिनीत्यथ ॥ ॐ हस्तिक तिमियाङ्गनायै नमः ॥ ' २१४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । हरिद्राकुङ्कुमादिग्धा हर्यश्वाद्यमरार्चिता । हरिकेशसखी हादिविद्या हालामदोल्लसा ॥ हरिद्राकुङ्कुमादिग्धा । हरिद्राकुङ्कुमाभ्या उपलक्षण कस्तू- पत्रादीनाम् । दिग्धा लिप्तेत्यर्थ ॥ ॐ हरिद्राकुङ्कुमादि धायै नमः ॥ I हर्यश्वामराचिता । हर्यश्व सुरेश आदिर्येषाम् अम राणा तैरर्चिता किंकरतया नियामकत्वेन पूजितेत्यर्थ ॥ ॐ हर्यश्वाद्यमरार्चितायै नमः ॥ हरिकेशसखी । हरय हरिद्वर्णा केशा शिरोरुहा या, 'हिरण्यमश्रुर्हिरण्यकेश ' इति श्रुते । तस्य सखी प्रयोज नमनपेक्ष्योपकारिणीत्यर्थ । यद्वा वर्णेन नीलेन हरिणा विष्णु- ना समा केशा अस्य सन्तीति सर्वाङ्गसुन्दरनित्ययौवनचि द्रूपसहितकामेश्वर, तस्य सखी ॥ ॐ हरिकेशसख्यै नमः ॥ हादिविद्या । लोपामुद्रापासितमनुरूपत्यर्थ ॥ ॐ हादि विद्यायै नमः ॥ हालामदालसा । हालाया अमृतमथनाद्भूतवारुण्या मदेन उल्लासेन अलसा आरक्तनेत्रान्तरोमाश्वादिचिह्नवती त्यर्थ ॥ ॐ हालामदालसायै नमः ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २१५ सकाररूपा सर्वज्ञा सर्वेशी सर्वमङ्गला । सर्वत्र सर्वत्र सर्वहन्त्री सनातना । सकाररूपा । द्वितीयखण्डद्वितीयावयवत्वेन ज्ञापक य- स्या मा तथा ॥ ॐ सकाररूपायै नमः ॥ सर्वज्ञा । अलुप्तनित्यज्ञानम्वरूपेण सामान्यरूपेण सर्वे जानातीति सर्वज्ञा, 'य सर्वज्ञ सर्ववित्' इति श्रुते ॥ ॐ सर्वज्ञायै नमः ॥ सर्वेशी । सर्वस्य कार्यस्य अन्तर्यामिरूपेण ईष्टे प्रेरयती ति तथा ॥ ॐ सर्वेश्यै नमः ॥ सर्वमङ्गला । सर्वप्रकारेण शुद्धविशिष्ट चैतन्यरूपेण मन ला परमानन्दस्वरूपा । अत्र बहुव्रीहेरविवक्षितत्वात् विव- क्षिताया वा सुन्दरकायो राजत्यादिवत् समासार्थ । अथवा, सर्वेषा मङ्गल यस्या सा तथा । सर्वै प्रकार ध्यानकीर्त नपूजानमस्काराद्यर्चनभक्तिजन्य कैङ्कर्यै जडानामपि मङ्गल सुख यस्या जायत सा तथा । सर्वेषामात्मरूपतया प्रतीय मान मङ्गल सुखस्वरूप यस्या मेति वा । सर्वशब्दवाच्य सर्वकारण शिव, तस्य मङ्गल सुख यस्या जायते सा तथा, चिन्मय शिव साक्षात्तस्यानन्दमयी शिवा' इति न २१६ 1 ललितात्रिशतीभाष्यम् । चनान । अथवा, मङ्गलशब्दन मङ्गलहतुभूता स्त्रियो लक्ष्यन्ते । सर्वेषा प्राणिना मङ्गल मङ्गलसाधनभूता योषा स्वाभिन्नसच्चिदानन्दवस्वेन यस्या सा तथा 'एतस्यैवान- न्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' इति श्रुतेरित्यर्थ । ' अशुभानि निराचष्टे तनोति शुभसततिम् । स्मृतिमात्रेण यत्पुसा ब्रह्म तन्मङ्गल विदु । अतिकल्याणरूपत्वात् नित्य- कल्याणसश्रयात् । स्मतॄणा वरदत्वाश्च ब्रह्म तन्मङ्गल विदु इत्यादिवचना ॥ ॐ सर्वमङ्गलायै नमः ॥ सर्वकर्त्री । सर्व समस्त स्वशक्त्या मायारूपया करा तीति तथा, 'ईशत ईशनीभि ' इति श्रुत ॥ ॐ सर्वक नमः ॥ सर्वत्र सर्व विभर्तीति तथा, ' ' , एष विधृतिरेषा लाकानाम इति श्रुत ॥ ॐ सर्वभयै नमः ॥ " सवहन्त्री । म हरतीति तथा । एभिर्नामत्रयै 'यतो इत्यादि श्रुत्युक्ततटस्थलक्षणत्रयमभिहितमिति वेदित व्यम् । ॐ सर्वहन्त्र्यै नमः ॥ ' मनातना । 'अजो नित्य शाश्वताऽय पुराण इति श्रुत नित्यसिद्धस्वरूपेत्यर्थ ॥ ॐ सनातनायै नमः ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २१७ सर्वानवद्या सर्वासुन्दरी सर्वसाक्षिणी । सर्वात्मिका सर्वसौख्यदात्री सर्वविमोहिनी ॥ सर्वानवद्या । सर्वैर्ज्ञानैश्वर्यादिगुणैरनवद्या । अवधानाम विद्यया होना जडप्रकृति मिध्या बाध्यमानत्वात् । तद्विलक्षणा सत्यज्ञानानन्दरूपत्वादनवद्या । सर्वेषा सर्वाभीष्टप्रापकत्वेन स्तुत्या वा ॥ ॐ सर्वानवद्यायै नमः ॥ ' सर्वासुन्दरी । सर्वाणि च तानि अङ्गानि च अवयवा शिर पाण्यादय तेष्वन्यूनातिरिक्तभाववश्वात यथासामुद्रि कलक्षण तद्वत्वन सर्वाङ्गसुन्दरी । अथवा, सर्वेषामङ्गेषु शरीरेषु ब्रह्मस्वरूपतया अत्यन्तप्रेमविषयत्वेन सुन्दरपदार्थ वदविनाभाववाच्छाविषयत्वात् तथा ॥ ॐ सर्वाङ्गसुन्दर्यै नम ॥ सर्वमाक्षिणी । सर्वेषा जडाना कार्याणा स्फूत्याधायक- car प्रकाशकर्त्री तथा । सर्वे साक्षादीश्नत इति वा तथा ॥ ॐ सर्वसाक्षिण्यै नम ॥ सर्वात्मका । सर्वेषामात्मस्वरूपत्वान् । 'यश्चाप्नोति यदा दत्ते यच्चाति विषयानिह । यच्चास्य सतता भावस्तम्मादात्मेति गीयत' इति वचनात्तथा ॥ ॐ सर्वात्मिकायै नम ॥ २१८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । सबसौख्यदात्री । सुखिन भाव सौख्यम्, सर्वाणि च तानि प्रियमोदप्रमोदानन्दशब्दवाच्यानि । इष्टदर्शनजन्य सुख प्रिय । तल्लाभजन्य मोद । तदनुभवजन्य प्रमोद । आनन्द समष्टि । जीव भोक्ता । तानि ददातीति तथा । सर्वप्रकारै स्मरणादिभि सौख्य ददातीति वा । सर्वेषा मात्रास्तम्बपर्यन्ताना यथाकर्मोपासन प्रत्यक्षेण दृश्यमान ज्ञानैश्वर्यादिसहित सुख ददातीति वा तथा । 'एष ह्यवानन्द याति' इति श्रुते ॥ ॐ सर्वसौख्यदात्र्यै नमः ॥ सर्वविमाहिनी । सर्वान विमोहयतीति अन्यथा ग्राहय तीति वा तथा । ' अज्ञानेनावृत ज्ञान तन मुह्यन्ति जन्त व 'अनृतेन हि प्रत्यूढा' इति श्रुतिस्मृतिभ्या अज्ञाना वरणशक्तिकार्य मोहनादिसत्ताप्रकाशादिप्रधानाधिष्ठानत्वेन उपचारात् सर्व माहयतीत्युच्यत । अयो दहतीतिवत् ॥ ॐ सर्वविमोहिन्यै नम ॥ सर्वाधारा सर्वगता सर्वावगुणवर्जिता । सर्वारुणा सर्वमाता सर्वभूषणभूषिता ॥ सर्वाधारा सर्वस्याधारा ' ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा' इति श्रुते । सर्वेषा हृदयानि आधार अभिव्यक्तिस्थान उपासनाय ललितात्रिशतीभाष्यम् । २१९ यस्या सेति तथा ॥ ॐ सर्वाधारायै नमः ॥ सर्वगता । सर्वे गच्छतीति तथा । 'अनेन जीवेनात्म नानुप्रविश्य ' इति श्रुते ॥ ॐ सर्वगतायै नमः ॥ , सर्वावगुणवर्जिता । अवमानहतवश्च ते गुणाश्च तथा, आध्यात्मिक सबन्धन आरोपिता सत्त्वादय समष्टौ, अन्त करणधर्मा कामादय व्यष्टौ सर्वे च ते अवगुणाश्च तथा । सर्वान्तर्यामित्वेन मवानुस्यूतत्वेऽपि तत्तदुपाधिनिष्ठोत्तमाधम धर्मै न सबध्यत --- - घटादिनिष्ठाकाशवत् कोशान्तर्गतखङ्गव द्वा, 'सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षु न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्य दोषै । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यत लोकदु खेन बाह्य ' इति श्रुते ॥ ॐ सर्वावगुणवर्जितायै नमः ॥ सर्वारुणा । सर्वेष्वङ्गेष्वरुणा आरक्तवती, 'असौ यस्ता म्रो अरुण ' इति श्रुते ॥ ॐ सर्वारुणायै नमः ॥ सर्वमाता । सर्वेण कार्येण मीयते अनुमीयते ऽभदनेति तथा । तथा हि- इद जगत् ब्रह्माभिन्न तत्सत्ता स्फूर्तिनिय तसत्ताप्रकाशज्ञानविषयत्वात् यत् यनियतसत्ताप्रकाशवान् स तदभिन्न यथा तन्तुकार्य पट इति । सर्वान मिनाति स्वाभेदेन जानातीति तथा ॥ ॐ सर्वमात्रे नमः ॥ - ' २२० ललितात्रिशतीभाष्यम् । । सर्वभूषणभूषिता । सर्वात्मकत्वन ये ये प्राणिन या यानि भूषणालकारभोजनादीनि भाग्यवस्तून्यात्मार्थं सपा दयन्ति तेषा सर्वेषा प्रत्यक्तया ते सर्वैर्भूषिता उपकृतेत्यर्थ, 'आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रिय भवति' इति श्रुते । अथवा, सर्वदेवात्मकत्वेन सर्वभक्तजनस्य स्वस्वेष्टदेवताप्रीत्यर्थं भूष णभूषितत्वेन तथा अथवा सर्वैर्भक्तजनै तत्तदवयवेषु भूषणैरारापिता, स्वस्या महाराज्ञीत्वेन असगोदासीनस्व भावत्वादिति भाव । यद्वा, सवदेशकाललोकेषु भूषणै तत्र तत्र भवै उच्चावचैभूषणैरारोपिता, हस्त्यश्वादिदहोपा- धिका सती तत्तदीयालकारादिषु जुगुप्सारहितेत्यर्थ । भूष यन्ति सर्वोत्तमत्वेन प्रतिपादयन्ताति भूषणानि वेदान्तम हावाक्यानि सर्वै समस्तै गतिसामान्यात् एकतात्पर्येण भूषिता लक्षणया पर्यवसिता समन्विता वेत्यर्थ ॥ ' । सर्वभूषणभूषितायै नमः ॥ aari कालही कामेशी कामितार्थदा । कामसजीवनी कल्या कठिनस्तनमण्डला ॥ ककारार्था । 'क ब्रह्म' इति श्रुत्या ककारस्य ब्रह्मार्थक त्वेन तद्व्यतिरिक्तस्यातदर्थस्य बाधितत्वात् ॥ ॐ ककारा यै नमः ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । --- २२१ कालहन्त्री । अजपारूपेण प्राणापाननामकचन्द्रसूर्यनि- यमन पुरुषाणा नियमित परिमितायु स्वरूपैकविंशतिषट्श- ताधिकसहस्रमख्याक निर्गमनरूपण क्षपयन्ति अवशेषायुषो युगकल्पाद्यविशिष्टस्य वृद्धौ पुन सयमने तथा तथा वृद्धौ सयुञ्जानस्य सर्वप्राणेन्द्रियस्य वृत्तिलये मनोन्मन्यवस्था नि पद्यते । तथा च श्रुति ' पृथिव्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पश्वात्मक यागगुणे प्रवृत्ते । न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु प्राप्तस्य योगाग्निमय शरीरम' ' इति अध्यात्मयागा धिगमेन देव मत्वा धीरा हर्षशोकौ जहाति' इति च । तथा च तदानीमाविभूतब्रह्मस्वरूपेण 'तत सवत्सरो ऽजायत' इति श्रुत्या क्रियाशक्त्यात्मककालोत्पत्तिश्रवणात् तस्मिन ब्रह्मण्येव लये काल हन्ति नाशयतीति तथा नामनिर्वचन युक्त वक्तुमिति भाव ॥ ॐ कालहन्त्र्यै नमः ॥ कामेशी । कामाना भोग्यपदार्थाना यथादृष्ट प्रेरयतीति तथा ॥ ॐ कामेश्यै नमः ॥ कामितार्थदा । कामितानर्थान् ददातीति तथा, 'आप्त ' इति श्रुते । ससारदशायामावृतानन्दस्य अनाप्तवद वभासमानस्य आत्यन्तिकसुखात्मिका मुक्तिर्मे स्यादिति का काम २२२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । म्यमानत्वादात्मन कामितत्वम् । कामितश्चासावर्थश्चेति तम्यैव ज्ञानस्यावरणाभिभावकत्वेन प्राप्तप्राप्तिरूपतया त ददाति प्रय- छतीति प्रकाशस्वरूपण अनुभावयतीत्यर्थ ॥ ॐ कामि तार्थदायै नमः ॥ ७ कामसजीवनी । काम मन्मथ परमेश्वरनेत्राग्निविप्लष्ट भण्डासुरात्मना अनेककालदेवलोकविपक्ष कामशास्त्रप्रयोग समये रतिदेवीप्रार्थन समीचीनतदीयपूर्वकाय तपश्चर्यादिप- रिपाकफलभूत करुणारसपूरितापाङ्गावलोकनेन सजीवयति सप्राण कृत्वा तस्मै वरादि प्रयच्छति तेन त हर्षयतीति तथा ॥ ॐ कामसजीवन्यै नम ॥ कल्या । कलयितु ध्यातु योग्या । अथवा, सर्वोत्तमदेव- त्वेन ध्यातु याग्या कल्या । कले कामधेनुत्वेन यथा वा- च्छितार्थकारणम् ॥ ॐ कल्यायै नमः ॥ कठिनस्तनमण्डला । स्तनयो मण्डले आदिमभागौ सा- न्त प्रदेशौ कठिने अप्रकम्पे अतिस्थिरे वा यस्या तथा ॥ ॐ कठिनस्तनमण्डलायै नमः ॥ करभोरु' कलानाथमुखी कवजिताम्बुदा । कटाक्षस्यन्दिकरुणा कपालिप्राणनायिका ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २२३ 'मणि करभोरु । करभ इव ऊरू यस्या सा तथा । बन्धादाकनिष्ठ करस्य करभो बहि ' इति प्रमाणादिति भा व ॥ ॐ करभोरवे नमः ॥ कलानाथमुखी । कला चतु षष्टिकला नाथयति प्रेर यतीति कलानाथ, 'निश्वसितमेतदृग्वेदो यजुर्वेद साम- बेद ' इत्यादिश्रुते, 'शास्त्रयानित्वात्' इति न्यायाञ्च । ताहशमुख वदन यस्या सेति तथा । कलानाथश्चन्द्र इव मुख यम्या सेति वा ॥ ॐ कलानाथमुख्यै नम ॥ कच जिताम्बुदा । कचेन कशभारेण कबरेण वेत्यर्थं । जिता अधरीकृता अम्बुदा मेघा गया सा तथा, मेघम- ण्डलापेक्षया ऊर्ध्वगामिशिरोरुहभारा व्योमकेशीति भाव । अथवा, केशवृत्तिनीलरूपेण सादृश्यासहत्वेन धिक्कृता मेघा यया सा तथा ॥ ॐ कचजिताम्बुदायै नम ॥ कटाक्षस्यन्दिकरुणा । यद्यपि दीनेषु परिपाल्यता बुद्धि- देवाना महता करुणेत्युच्यते, तथापि तस्या अन्तरत्वेन अज्ञायमानतया तेषु भक्त्यतिशयेन प्रवृत्त्यर्थे सेवादौ तद्वत्ता ज्ञानस्यावश्यकफलप्रदानादिहेतुतया निश्चयेन तदनुरूपकसा स्विकवीक्षणस्मेरसभाषणादिसत्त्व तत्रावश्य भवतीति का- र्यसत्त्वप्रसञ्जितकारणमस्ववत्त्वात्, करुणाया नवरसेष्व- २२४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । न्तर्भावात्, रसशब्दस्य मधुरादौ रूढत्वात् तेषामनिवचनी यत्वऽपि अनुभवगोचरतायामिक्ष्वादिसारद्रव्य पदार्थनिष्ठत्वा- पलब्धे तत्मबन्धवशात् परपरया द्रवद्रव्यवृत्तिस्यन्दनरूप- क्रियाश्रयत्वमुपचर्यते । तथा च कटाक्षस्यन्दिनी करुणा परिपाल्यताबुद्धिरूपा यस्या सा तथा । ॐ कटाक्षस्य- न्दिकरुणायै नमः ॥ कपालिप्राणनायिका । कपालमस्य अस्तीति कपाली आन- न्दभैरव, तम्य प्राणनायिका प्राणस्येत्युपलक्षण पञ्चानाम । नायिका अधिष्ठानत्वेन प्रेरका । 'न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ' इति श्रुते । तस्यापि हृदयान्तर्वर्तिपरमश्वररूपेति यावत् । प्राणवल्लभेति वा, प्रियेति भाव । ॐ कपालिप्राणना यिकायै नमः ॥ कारुण्यविग्रहा कान्ता कान्तिधूतजपावलि । कलालापा कम्बुकण्ठी करनिर्जितपल्लवा ॥ कारुण्यविग्रहा । कारुण्य पूर्वोक्तकृपा, करुणस्य भाव, तत् विग्रह मूर्तिर्यस्या सति तथा । कारुण्यस्या- न्तकरणपरिणामबुद्धिरूपत्वेन नत्रान्तवीक्षासस्मितभाषादि नानुमीयमानत्वेऽपि साक्षात्तज्जन्यमनोवाञ्छितवरप्रदाना ' ललितात्रिशतीभाष्यम् । २२५ दीना शरीरावयवविशेषजन्यतया कारुण्य विग्रहो यस्या सेति समासोपपत्ति । मायोपाधिकस्य ब्रह्मण जगत्सृष्टय नुकरणहेतुभूतस्वेच्छा मात्र निमित्त ककर्मानधी नसच्चिदानन्दघ नीभूतात्मक भक्तानुप्राहकविप्रहवत्ता विना देवताया बुद्धा बनारोपेण सगुणोपासनमनुपपद्यमान स्यात्, तदर्थं देवताधिकरण मन्त्रप्रकाशिता देवा 'वज्रहस्त पुर न्दर इत्यादिस्वत प्रमाणवेदवाक्यवशात् बाधकाभावे विग्रहवन्त अङ्गीकर्तव्या इति प्रतिष्ठापितम् । तथा 'बहु शोभमानामुमा हैमवतीम्' इति केनोपनिषद्भाष्ये हैमानि हेमविकाराणि भूषणानि यथा सेति वा तथा, हिमवत अपत्य स्त्रीति च तथेति परदेवताया दिव्यविग्रहवत्त्व प्रति ष्ठापितम् । तथा च महानुभावाना स्वप्रकाश चैतन्यरूपाणा मेवभूताना सर्वात्मना सर्वोत्तमाना मूर्तित्रयदेवाना ध्याना ग्रुपकाराय तादृशमूर्तिमत्त्वम् अस्तीति न किंचिदनीश्व रवादप्रसङ्गावकाश इति आस्ता विस्तर ॥ ॐ कारु यविग्रहायै नमः ॥ 6 कान्ता । 'कन दीप्तौ ' इति धातो अत्यन्तमनोहरत मे त्यर्थ । मदनगोपालविग्रहा वा । ' कदाचिदाद्या ललिता पु रूपा कृष्णविग्रहा । वशनादविनोदेन करोति विवश जगत्' SU VII 15 , २२६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । इति त्रिपुरतापनीये ॥ ॐ कान्तायै नमः ॥ कान्तिधूतजपावलि । जपाना जपापुष्पाणाम्, उपलक्षणम् अन्येषामा रक्तवर्णानाम्, आवलि पनि दृष्टान्तत्वेन कविभि रुत्प्रेक्षिता । कान्त्या अप्राकृतस्वच्छ परमानन्दचिद्भासा धूता परित्यक्ता प्राकृतत्वेन अल्पकान्तिमन्तया उपमायोग्यतया यया सा, 'न हि महान्तो नीचैरुपमीयन्ते ' इति न्याया दिति भाव ॥ ॐ कान्तिधूतजपावल्यै नम ॥ कलालापा । कला चतु षष्टिकला आलापो व्यावहा- रिकशब्द यस्या सा तथा, ' वेदशास्त्रमयी वाणी यखा सा परदेवता' इति वचनात् । कल अव्यक्तमधुर सप्रयो जन आलाप सलापो यस्या सेति वा तथा, भारती तथा' इति महापुरुषसामुद्रिकवचनात् ॥ ॐ कलालापायै नमः ॥ 6 अव्यक्ता कम्बुकण्ठी । कम्बुशब्दन अत्र शङ्खनिष्ठरेखात्रय लक्ष्य ते । तद्वान्कण्ठो यस्या सेति तथा गुणनामेदम् ॥ कम्बुकण्ठ्यै नम ॥ करनिर्जितपल्लवा । करशब्देन करतल लक्ष्यते । पल्ल शब्देन निष्ठपाटल्य स्निग्धता लक्षणया इत्यर्थ । तथा ललितात्रिशतीभाष्यम् । २२७ च अन्योन्यगुणयोर्जयपराजये, अर्थात्तद्वतोरपि तौ सिद्धावि- ति तन्नामोपपत्ति ।' विवाहश्च विवाद समयोरेव शोभते' इति वचनात् करतल तत्साम्यध्वनिरनेन नाम्ना कृत । करेण निर्जिता पल्लवा यस्या सा तथा ॥ ॐ करनिर्जित पल्लवायै नमः ॥ कल्पवल्लीसमभुजा कस्तूरीतिलकाश्चिता । हकारार्था हसगतिहटकाभरणोज्ज्वला ॥ , कल्पवल्लीसमभुजा । यथा दिव्यवृक्षा नन्दनोद्याने प्र सिद्धा तथा तदलकाराय वल्ल्यादयोऽपि कल्पयन्ति सपा दयन्तीति कल्पा कल्पाश्च ता वल्ल्यश्च व्रतत्य, ताभि समा भुजा हस्ता यस्या सा तथा । कविसप्रदायप्रात्या स्त्रीभुजाना वल्लीसाम्योक्तिरिति मन्तव्यम् । अत्र समपद स्वारस्येन तेषामपि तदवच्छिन्न चैतन्यद्वारा यथाप्रारब्ध चे तनवल्लोकवान्छितफलकतृत्वमिति ध्वनितम् । 'एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूप रूप प्रतिरूपो बहिश्च' इति श्रुते, ' तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसभवम्' इति स्मृतौ च भगवता स्वकीय सच्चिदानन्दस्वरूपावस्थितिरेवोक्ता । अत एव परदेवीभुजाना नैव साम्योक्तिरिति शङ्का निरस्ता वेदि २२८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । तव्या, औपाधिकचैतन्येन तथाभूतचैतन्यस्य साम्योपपत्ते ॥ ॐ कल्पवल्लीसमभुजायै नमः ॥ कस्तूरीतिलकाविता । कस्तूरीतिलकेन ललाटदेश सस्था पितबिन्द्वाकारमृगनाभिना अश्विता चिह्निता अलकृतेत्यर्थं ॥ ॐ कस्तूरीतिलकाश्चितायै नमः ॥ हकारार्था । हकारस्य आकाशबीजस्य अर्था, अर्थ स्व रूपचैतन्यम् आकाशविग्रहेत्यर्थ, 'आकाशो ह वै नाम ना मरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म' इति श्रुते ॥ ॐ sara नम ॥ हसगति । हन्ति गच्छतीति इस प्राण आदित्यो वा । हसस्य प्राणस्य गति गमनागमन लक्षणया तज्जाप्याजपा मन्त्ररूपा यस्या सा तथा, ' हकारेण बहिर्याति सकारेण पुनर्विशेत्' इति वचनात् । यद्वा, तदभिमानिदेवतारूपा । भीषोमात्मक सूर्यचन्द्रगती अहोरात्रात्मककालस्वरूपाया य सा । अथवा, हन्ति देहाद्देहान्तर गच्छति स्वक शेनेति हसा जीव तस्य गति प्राप्यस्थान मुक्ति रित्यर्थ 'ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ' यद्गत्वा न निवर्तन्ते ' इति श्रुतिस्मृतिवचनात् । अथवा हन्ति स्वकार्यभूत जगत्प्रविशतीति हस । ' हसस्तु परमेश्वर ' इति नृसिंहता स्था ' " ललितात्रिशतीभाष्यम् । २२९ " पनीये । गम्यते प्राप्यते शरणत्वेन प्रपद्यते चतुर्विधभक्तैरि ति गति । इसश्वासौ गतिश्चेति सामानाधिकरण्यसमास 'हप्स शुचिषत्' इति श्रुते । आहोस्वित्, हसस्य ब्रह्मवाह नस्य गतिरिव गमन यस्या सा तथा । उताहो, हसशब्देन नामैकदेशेन हसक पादकटकमुच्यते गम्यते अनेनेति गति चरणम्, हसयुक्ते गती पादारविन्दे यस्या ' ' " ' सा तथा । यद्वा, इसशब्देन नित्यानित्यसारासारजडाजडादिव स्तुविवेकसमर्था इन्ति गच्छन्ति प्रतिग्राम प्रतिदेशम् तेषा इति हसा परिव्राजका चतुर्थाश्रमिण निष्कामा गति गम्यते ज्ञायते साक्षात्क्रियत इति गति, सन्यासयो गाद्यतय शुद्धसत्वा ' इति श्रुते । 'ये पूर्व देवा ऋषयश्च तद्विदु ते तन्मया अमृता वै बभूवु ' इति श्रुते । जीवन्मु क्तपुरुषानुभूयमानपरमानन्दमुक्तिस्वरूपेत्यथ ॥ गत्यै नमः ॥ ॐ हस हाटकाभरणोज्ज्वला । हाटकस्य सुवर्णस्य कार्याणि च तानि आभरणानि च हाटकाभरणानि तैरुज्ज्वला तथा, प्रकाशिता अलकृतेत्यर्थ । हाटकस्य सुवर्णरूपब्रह्माण्डस्य आभरणवदुज्ज्वला प्रकाशकरी सत्तास्फूर्तिकरीत्यर्थ । यद्वा, तस्मिन्नाभरणै मङ्गलसूत्रादिभि सनाथस्त्रीमण्डलखरूपैरु २३० ललितात्रिशतीभाष्यम् । ज्ज्वलतीति । आहोस्वित्, कार्यकारणद्वयरूपवसुदानेन वसु स्वरूपेण वा उज्ज्वलति प्रकाशत इति तथा, 'वसुरन्तरिक्ष सत्' इति श्रुते ॥ ॐ हाटकाभरणोज्ज्वलायै नम ॥ हारहारिकुचाभोगा हाकिनी हल्यवर्जिता । हरित्पतिसमाराध्या हठात्कारहतासुरा ॥ हारहारिकुचाभोगा । हरस्य परमेश्वरस्य इमे सबन्धिन द्वारा ईश्वरत्वाप्तकामत्वनित्यतृप्तत्वादयो गुणा, तान् हरति तद्विपरीताविद्याद्याधानेन उत्सादयतीति हारहारी, कु चयोराभोग पर्यन्तभूमि यस्या सा तथा । परमेश्वरस्य तद्विषयकवाञ्छया तदेकसक्तमनस्त्वेन तत्कारणीभूताविद्या वशवृत्तित्वेन वशीकृतमायत्वस्वरूपेश्वरत्व समानाधिकरणा प्तकामत्वादय अपहृता, जीवेश्वरयोरेकत्र तेषा तद्गुणा- नाच सामानाधिकरण्यायोगादित्यर्थ । तथा च ईश्वरस्य मदिष्टसाधनमित्यन्यत्र पदार्थे बुद्धिमत्त्वस्यैव बहुभवनरूपत या तस्य जगदाकारत्वाघायका - इत्यधिकगुणोत्प्रेक्षाविषयत्वेन भोगस्यातिशयोक्तिरिति द्रष्टव्यम् । अथवा, हारान् मुक्तास्र ज हरति आदत्ते इति हारहारी कुचाभोगो यस्था सेति तथा षट्कारेण मुक्ताहारेण यथोचितकाल भूषितवतीति भाव ॥ ॐ हारहारिकुचाभोगायै नमः ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २३१ हाकिनी । हाकयति जन्ममरणयो छेदयतीति हा किनी, 'हाक् छेदे' इति धातुपाठात् ॥ ॐ हाकिन्यै नम ॥ हल्यवर्जिता । हलसबन्धि हल्य कृष्यादिद्वारा जनक त्वम् तद्वर्जिता, कामादिविहीन शुद्धचैतन्यस्वरूपत्वात् । हल्य कपट मित्रेष्वप्यन्यथा स्वान्त करणाविष्कृति तेन व र्जिता । अविद्याविरहिततत्वपदलक्ष्यार्थभूतत्वादिति यावत् ॥ ॐ इल्यवर्जितायै नम ॥ हरित्पतिसमाराध्या । हरिता दिशा पतय महेन्द्रादय, तै सम्यक् श्रद्धाभक्तिपूर्वकम् आराधितु योग्या । तद्विपक्ष निबईणनेष्टप्रापकदैवतत्वादित्यभिसधि ॥ ॐ हरित्पतिस माराध्यायै नम ॥ हठात्कार हतासुरा । हठात्कारेण अतिशीघ्रतया हता पराभूता असुरा असुरपक्षा महिषादयो यया सा तथा, समबलयो किल लोके सामाद्युपाय बलाबलविचारणा च भवति । प्रबलस्य तु दुर्बलेषु वैरिषु सिंहस्य मेषेष्विव तदयोगेन अतित्वरयाविचारेणैव देवलोक सुखप्रदा - इति ना मार्थविचारणायामितरेषु कैमुतिकन्यायेन तत्कारणत्व ध्व नितमिति योजनीयम् ॥ ॐ हठात्कारहतासुरायै नम ॥ २३२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । हर्षदा हविभक्त्री हार्दस तमसापहा । हल्लीसलास्य सतुष्टा इस मन्त्रार्थरूपिणी ॥ हर्षदा । हर्ष आनन्दकारक मुखविकासादिकार्योंनेय स्वात्मसभावनेतरपरिभवनिमित्त चित्तवृत्तिविशेष, कार्यस्य कारणाविनाभावितया तत्प्रदान तद्धेतोरप्याक्षिपतीति सुख- प्रत्यर्थ । प्रददातीति प्रदा । अथवा, हर्षे धनयौवनादि सुख पुत्रबन्धुवर्गादिरूपेण परिहृत्य प्रकर्षेण यति खण्ड यतीति वा तथा ॥ ॐ हर्षप्रदायै नमः ॥ हविर्भोक्त्री । ' स ब्रह्मा स शिव स हरि सेन्द्र सो Sक्षर परम स्वराट्' इति श्रुते वसुरुद्रादित्याकारेण हवींषि यजमानेन अग्नौ प्रक्षिप्तानि स्वाहामुखेन भुङ्क्त इति तथा । यद्वा हवींषि कालान्तरभाविफलानि अदृष्टात्मना सूक्ष्मरू- पाणि तत्तद्यजमानजीवगतानि भूतसूक्ष्माभिधानानि समष्टि व्यष्टधात्मनेश्वरजीवोपाधिभूतानि मायाविद्याशब्दितानि मु क्तिपर्यन्त भुनक्ति पालयतीति वा तथा । अन्यथा ससा रस्यानादित्वाभावेन आदिमशरीरागुत्पत्तौ अङ्गीक्रियमाणा याम् प्रपञ्चस्याकस्मिकत्वम कृताभ्यागमप्रसङ्गश्च स्यादिति भाव ॥ ॐ हविर्भोक्त्र्यै नमः ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २३३ हार्दतमसापहा । हृदयावच्छिन्न हार्द, 'यो वेद नि हित गुहायाम्' इति श्रुते । अस्मिन् यत्सतमस आवारक त्वात् 'तम आसीत्' इति श्रुत्या च आत्मविषयक तदाश्रय मज्ञानम् अनर्थकरम् अव्याकृताकाशमित्युच्यते, महावाक्य श्रवणजन्यधीवृत्तिप्रतिफलिताकारेणापहन्तीति सा तथा । नाह ब्रह्मास्मि ससारी ब्रह्म नास्ति न भाति च -- इत्यज्ञानस्य सोऽह ब्रह्मास्मि सच्चिदानन्दलक्षण इति एकाकारवृत्तिबा ध्यत्वनियमेन बाधाधिष्ठानम् ' नेह नाना' इति श्रुतिसिद्ध ब्रह्मरूपेति यावत् ॥ ॐ हार्दतमसापहायै नमः ॥ । - हल्लीसलास्यसतुष्टा । हल्लीसै चित्रदण्डै कुमारिकाभि एकतालादियुक्तगीतपूर्वक यल्लास्य नर्तन तस्मिन् सतुष्टा प्रीतिमतीत्यर्थ । ' नारीणा मण्डलीनृत्य बुधा हल्लीसक विदु ' इति हारावलीकोशात् मण्डलाकार नृत्यसतुष्टेत्यर्थ ॥ ॐ हल्लीसलास्यसतुष्टायै नमः ॥ इस मन्त्रार्थरूपिणी । हसै परमहसै उपाभ्यो यो मन्त्र प्रणव तस्य शास्त्रबोधिततत्त्वायरूपिणी । वाच्यलक्ष्यार्थस्व रूपेण ज्ञायमानेत्यथ । अथवा, हसमन्त्र अजपा । हकार सकारी शोधिततत्त्वपदार्थों, हकारस्य परोक्षवाचिन सकार - स्य तादृशस्य च भागत्यागलक्षणया निष्प्रपञ्चनित्यशुद्धमु २३४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । तबुद्धसश्चिदानन्दस्वरूपेत्यर्थ ॥ ॐ इसमन्त्रार्थरूपिण्यै नमः ॥ हानोपादाननिर्मुक्ता हर्षिणी हरिसोदरी । हाहाहूहूमुखस्तुत्या हानिवृद्धिविवर्जिता ॥ ," , हानोपादाननिर्मुक्ता । अनिष्टसाधने हान परित्याग क्रि- या । इष्टसाधने उपादान स्वीकार क्रिया । परिजिहीर्षा आदित्सा वा । ' अप्राणो ह्यमना शुभ्र अकायम्' 'अ शरीर वाव सन्त न प्रियाप्रिये स्पृशत ' इति बहुश्रुते अशरीरस्य ब्रह्मणोऽन्त करणादिधर्माणामसभवात् ताभ्या निर्मुक्ता नि सङ्गेत्यर्थ, ' विमुक्तश्च विमुच्यते ' इति श्रुते ॥ ॐ हानोपादाननिर्मुक्तायै नमः ॥ हर्षिणी । ' एष ह्येवानन्दयाति' इति श्रुते हर्षयति सतोषयतीति तथा ॥ ॐ हर्षिण्यै नमः ॥ हरिसोदरी । हरिणा कृष्णेन समान एक उदरम् उत् ईषत् अर भेदक अवच्छेदकमित्यर्थ । उचैरर कूटो वा अत्यल्पमि ध्याभूतमायोपाधिकचैतन्यावस्थाविशेषरूपा । ' अपरेयमि तस्त्वन्या प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूता महाबाहो ययेद धार्यते जगत्' 'देवात्मशक्ति स्वगुणैर्निगूढाम्' इत्या ललितात्रिशतीभाष्यम् । २३५ दिस्मृतिश्रुतिभ्याम् ईश्वरस्य रूपभेदवत्त्वावगमादिति मन्त व्यम् ॥ ॐ हरिसोदर्यै नम ॥ हाहाहूहू मुखस्तुत्या । हाहाहूहूनामकगन्धर्वै मुख्यौ येषा जनाना तैस्तथा । स्तुत्या गुणिनिष्ठगुणाभिधान स्तुति । तदाश्रयत्वेन प्रतिपादनीयेत्यर्थ ॥ ॐ हाहाहूहूमुखस्तु त्यायै नमः ॥ ' हानिवृद्धिविवर्जिता । अवयवोपचयरूपा वृद्धि, तदप चयरूपा हानि ताभ्या वर्जिता, 'न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्' इति श्रुते । उपलक्षणम्, षड्भावविकाराणा शरीरधर्मत्वेन कर्मनिमित्तत्वादीश्वरे तदभावेन निर्विकारे- त्यर्थ ॥ ॐ हानिवृद्धिविवर्जितायै नमः ॥ हय्यङ्गवीनहृदया हरिगोपारुणाशुका । लकाराख्या लतापूज्या लयस्थित्युद्भवेश्वरी ॥ हय्यङ्गवीनहृदया । हय्यङ्गवीनवत् नवनीतसदृशविरल मृद्ववयवपरिणामद्रवत्वसादृश्ययोगिहृदयकृपारसरूपपरिणा मवतीति सा तथा । हृदयाभावेऽपि सर्वात्मकतया तद्वत्वम् । ईक्षणादिवन्मायापरिणामरूपा दया वा हृदयशब्देन उन्यते । ' अवागमना ' इति श्रुत्या सर्वनिषेधात् ॥ ॐ हयङ्गवी नहृदयायै नमः ॥ " २३६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । { हरिगोपारुणाशुका । हरिगोप इन्द्रगोप आर्द्रामघा- नक्षत्रे वर्षासुद्भवा अष्टपादा रक्तवर्णा मृदङ्गा कीटवि- शेषा तथा शोणमशुक अम्बरम्, स्वार्थे कप्रत्यय ' " किरणानि वा यस्या सा तथा । ॐ हरिगोपारुणांशु- कायै नमः ॥ लकाराख्या । लकारयुक्त मूलमन्त्र आख्या वाचक शब्द यस्या सा तथा । लकारस्य शक्रबीजस्य वार्थ, सेन्द्र ' इति श्रुते । लकारयुक्तस्य मायाबीजस्य वा स्त- च्धमायेत्यर्थ ॥ ॐ लकाराख्यायै नमः ॥ ८ , लतापूज्या । लवन्ति विनमन्ति अत्यन्तनम्रा भवन्तीति लता परमपतिव्रता अरुन्धत्यादय स्त्रिय ताभि स्थिरमा ङ्गल्याय स्वेष्टदेवतात्वेन पूज्या पूजनीया । तदुक्तम्- " समा राध्य महेशानीं भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति' इति । अथवा, केदारादिगौरी विशेषमूर्ती लताभि उपलक्षण वन्यपूजोपकरणै पूज्या अलकृता । शबरी वा वनदुर्गा वेति भाव ॥ ॐ लतापूज्यायै नमः ॥ लयस्थित्युद्भवेश्वरी । वैपरीत्येन विशेषण योज्यम् । उद्भ- वतीत्युद्भव कार्यात्मना अभिव्यक्ति । स्थिति ज्ञानविषय तायोग्यकालावच्छेद अनुभवसत्तावत्त्वमिति यावत् । लय ललितात्रिशतीभाष्यम् । २३७ उत्पन्न कार्यस्य कारणात्मना अवस्थिति वाचारम्भणयोग्यते त्यर्थ । तासा क्रियाणाम् अचेतन कार्यत्वायोगेन घटादिकार्ये चेतनस्य निमित्ततादर्शनात् एकतटस्थेश्वरत्व वा, गोपुरादौ नानाचेतनदर्शनात्तादृशनानेश्वरत्व वेति विशये, 'यतो वा इ मानि भूतानि जायन्ते ' इति श्रुतौ ' यत ' इत्येकवचनपश्च म्या नानात्वतटस्थत्वे, 'जनिकर्तु प्रकृति ' इति सूत्रम् । जनि- कर्तु कार्यस्य प्रकृतिरुपादानमपादानसज्ञा स्यात् । 'अपादाने पञ्चमी' इति शासनात् अभिन्ननिमित्तोपादनत्वमीश्वरत्वमिति सिद्धान्त । तटस्थलक्षणमेतत् ज्ञायमानस्य ब्रह्मण लक्षण प्रमाणयो अवश्यवाच्यत्वादित्यभिप्राय । आदौ लयशब्दो पादानेन अनादित्व प्रपञ्चस्य सूचितम् । जगत इति शब्द पूरणन नाम योजनीयम् । तथा च जगत लयश्च स्थितिश्व उद्भवश्च तेषामीश्वरी । कूटस्थचैतन्यमात्र सच्चिदानन्दाधायक तया विवर्तकारणमित्यर्थ नमः ॥ ॥ ॐ लयस्थित्युद्भवेश्वर्यै लास्यदर्शनस्तुष्टा लाभालाभविवर्जिता । लब्ध्येतराज्ञा लावण्यशालिनी लघुसिद्धिदा ॥ लास्यदर्शनस्तुष्टा । यथा राजा सपूर्णकाम प्रयोजनम २३८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । नुद्दिश्यापि मृगयादिलीलाविशेषान् पश्यति बालकादिनृत्य वा, तथा अज्ञानाम् इष्टानिष्टमिश्रोदासीनपदार्थचतुष्टयानु- भवजन्यहर्षशोकादिसभवन्मदोद्रे कशोकातिरेकहेतुकविहिता दिकरणाकरणरूपचरणाद्यङ्गपरिस्पन्दरूपनानाविधप्राणिकाय निकायजन्यलास्यदर्शनेन अनुद्दिश्यापि प्रयोजन सतुष्टा त तत्कर्मानुसारेण फलप्रापकेश्वरतया सर्वसमानत्वात्, 'नाद- ते कस्यचित्पाप न चैव सुकृत विभु ' इति भगवद्वचनात् । लास्य देवतादिवारवनितादिभि क्रियमाण तालगीतयुक्त नृत्य तद्दर्शनेन सतुष्टा । तदीयफलप्रदानोन्मुखकृपारसवती त्यर्थ ॥ ॐ लास्यदर्शनस्तुष्टायै नमः ॥ ' लाभालाभविवर्जिता । अप्राप्तप्राप्तिर्लाभ कृतेऽपि यत्ने तदप्राप्तिरलाभ, ताभ्या विवर्जिता, पर्याप्तकामत्वेन नित्यतृ प्रत्वात्, 'न मे पार्थास्ति कर्तव्य त्रिषु लोकेषु किंचन' इति भगवद्वचनात् ॥ ॐ लाभालाभविवर्जितायै नमः ॥ लक्ष्येतराज्ञा । इतरेषा जीवभ्रान्तिकल्पिताना गुणमूर्त्या दीनाम् उपासनाविधिरूपा वा, कर्मविधिरूपा वा आज्ञा प्रेरणा लध्या अविषयीकृता यया सा तथा । शुद्धचैतन्यस्य विशि ष्टक्रियाद्यात्मकत्वाभावेन विश्यविषयत्वादिति यावत् । अथ वा, किंकरीत्वाभावेन इतरेषा देवतानाम् आज्ञा प्रेरणा लध्या ललितात्रिशतीभाष्यम् । २३९ उपेक्षणीया यया सा तथा, 'सर्वस्याधिपति सर्वस्येशान इति श्रुते । ईश्वरस्य सर्वनियन्तृत्वेन स्वेतरानियम्यत्वादिति ज्ञातव्यम् ॥ ॐ लड्ध्येतराज्ञायै नमः ॥ लावण्यशालिनी । लावण्य मौन्दर्य परमानन्दस्वरूपतया अतिशय प्रीतिविषयत्व शालत इति तथा । सर्वावयवसाधा - रणसु दरभाववतीति वा ॥ ॐ लावण्यशालिन्यै नमः ॥ लघुसिद्धिदा । लघुना उपायेन सिद्धि वाञ्छितार्थप्राप्तिं ददातीति तथा, लघुशब्द लक्षणया लघिमासिद्धिपर । तथा च लघिमाद्यष्टैश्वर्यप्रदेति वा । अथवा, लघूना अत्य न्ताल्पज्ञानभाग्यशरीररूपचरणवतामप्य तिनिकृष्टाना तिर्य- गादीनामपि सिद्धिं मुक्तियोग्यताहेतुज्ञानादिसाधनसपत्ति तत्कार्यमहिमातिशयोन्नेया ददातीति सा तथा ॥ ॐ लघु- सिद्धिदायै नमः ॥ लाक्षारससवर्णाभा लक्ष्मणाग्रजपूजिता । लभ्येतरा लब्धभक्तिसुलभा लागलायुधा ॥ लाक्षारससवर्णाभा । लाक्षारसेन लाक्षाद्रवेण समानो वर्णो यस्या मा तथाभूता शोभा कान्तिर्यस्या तथा । अतिपाटलविग्रहप्रभेत्यर्थ ॥ ॐ लाक्षारससवर्णा सा भायै नमः ॥ २४० ललितात्रिशतीभाष्यम् । लक्ष्मणाग्रजपूजिता । अप्रे जायेते इत्यग्रजौ रामभरतौ लक्ष्मणस्यापि ज्येष्ठभूतरामाचारानुकारित्वेन चतुर्भिरपि दा- शरथिभि पूजितेत्यर्थ । रामस्य शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता - इति नामवत्त्वान्यथानुपपत्त्या शिवदपतिपूजकत्वेन तदितरेषा तद्व- शस्त्रीपुरुषाणा तत्सिद्धिरिति ध्वनितोऽर्थ ॥ ॐ लक्ष्मणाग्र- जपूजितायै नमः ॥ लभ्येतरा । लभ्यानि लब्धव्यानि कर्मोपासनाविशेषाणा फलत्वेन साध्यानि भव्यानीत्यर्थ । तेभ्य इतरा विलक्षणा । ' तत्सत्य स आत्मा' ' नित्यो नित्याना चेतनचेतनानामेको बहूना यो विदधाति कामान् । तमात्मस्थम्' इति 'यत्साक्षाद परोक्षाद्ब्रह्म' इत्यादिभि श्रुतिभि आत्मन नित्यप्राप्तस्वरूप त्वेन प्राप्तप्राप्तव्यरूपतया मोक्षरूपत्वेन चतुर्विधक्रिया फलत्वा- भावादिति मन्तव्यम् । अथवा, इतराणि धर्मार्थकामरूपात्र- वर्गरूपाणि फलानि लब्धव्यानि प्राप्तव्यानि यस्या सका शादिति सा तथा उक्तश्रुते ॥ ॐ लभ्येतरायै नमः ॥ लब्धभक्तिसुलभा । भक्ति सामान्यविशेषाकारेण द्वि विधा । तत्राद्या आर्तजिज्ञास्वर्थार्थिभि यैर्लब्धा तत्तत्फलो देशेन समयविशेषे विच्छिद्य विच्छिद्य प्राप्ता तेषा सुलभा तत्तत्प्रारब्धानुसारेण फलदानोन्मुखस्वात्मरूपतया सनिहित ललितात्रिशतीभाष्यम् । २४१ त्वात् । द्वितीया भक्तिस्तु ब्रह्मसाक्षात्कारवता पुरुषेण येनैकभ क्तितया लब्धा, ' एकभक्तिर्विशिष्यते ' इति स्मृते, तस्य सु लभा, स्वात्मरूपतया सदा ज्ञायमानत्वात् । 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्' इति गीतासु । अथवा, लब्धा प्राप्ता सत्यपि कण्ठ गतचामीकरवत् लब्धभक्तीना सुलभा सुखनानायासेन कष्टेन विना साध्यतया लाभ प्राप्तिर्यस्या सा तथा, मामभिजानाति' इति स्मृते ॥ ॐ लब्धभक्ति सुलभायै नमः ॥ 'भक्त्या लाङ्गलायुधा । शेषरूपतया हलायुधेत्यर्थ, 'अनन्त श्वास्मि नागानाम्' इति श्रीभगवद्वचनात् ॥ ॐ धायै नमः ॥ लाङ्गलायु लग्नचामरहस्तश्रीशारदापरिवीजिता । लज्जापदसमाराध्या लपटा लकुलेश्वरी । लग्नचामरहस्तश्रीशारदापरिवीजिता । लग्नौ करसबद्धौ धृतावित्यर्थ, लग्नौ चामरौ ययोस्तौ तादृशौ हस्तौ ययोस्ते श्रीश्च महालक्ष्मी शारदा च ते ताभ्या वीजिता परिवी जिता । अनादिकालादारभ्य परिचर्यया वीज्यमानेत्यर्थ ॥ ॐ लग्नचामरहस्तश्रीशारदापरिवीजितायै नमः ॥ SUVII 16 २४२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । लज्जापदसमाराध्या । लज्जानाम अन्त करणधर्म जुगु साहेतु गूहनसाधनम् उपलक्षण मनोधर्माणाम्, तस्य पदम् आश्रय 'काम सकल्पा विचिकित्सा श्रद्धा श्रद्धा वृतिरधृ ' ' तिर्धीर्भीरित्येतत्सर्वे मन एव' इति श्रुत । तस्मिन समा राध्या चिन्तनीयेत्यर्थ ' य आत्मनि तिष्ठन्नन्तरो यमयति ' 'गुहाहित गह्वरेष्ठ पुराणम' 'तमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीरा इत्यादिश्रुतिभ्य । अथवा, लज्जापद जीवचक्रम्, तस्मिन् तदधिष्ठानानन्दाभिव्यक्तिहेतुतया बहिर्यागक्रमेण पू जनीयेत्यर्थ ॥ ॐ लज्जापदसमाराध्यायै नमः ॥ 1 " लपटा । लमिति पृथ्वीवाचकबीजेन तदुपलक्षित जगल्ल क्ष्यते, पटशब्दन आवारकत्वधर्मवत्तया अविद्या लक्ष्यते, लम जगत पट कारणीभूता अविद्या यस्या सा तथा, ' मायिन तु महेश्वरम् ' ' य एको जालवान्' इति श्रुते । अज्ञानेनावृत ज्ञानम्' इति स्मृतेश्च । अथवा, लम्पटो नाम तन्द्री आलस्यम्, कर्मोपासना बाहुल्येऽपि प्रतिबन्धकभूयस्त्वे शीघ्रतया परमेश्वरस्य फलदानोन्मुखताया राजादिवश्चिर- विलम्बित सेवा फलदानवैमुख्ये तद्वत्तोपचारात्, लम्पटो यस्या सा तथा । अथवा, लम्पटादीनामन्त करणधर्माणामध्यास- शेन तदवच्छिन्ने चैतन्ये सत्त्वरजस्तम कार्याणामुपलब्धे ललितात्रिशतीभाष्यम् । स्तद्वत्व वा ॥ ॐ ँ लपटायै नमः ॥ २४३ लकुलेश्वरी । कु पृथिव्युपलक्षितजगत् लीयते अस्मि निति कुलम्, मायोपाधिकचैतन्यम्, प्रलयाधिष्ठानम् । ' यत्प्रयन्त्यभिमविशन्ति' इति श्रुते । लीयमान कुल लकुल freपाधिकमित्यर्थ । तच सा ईश्वरी च सा तथा । अथवा, लकुल स्थानविशेष स्वाधिष्ठान मणिपूरक वा, तस्येश्वरी, विष्णुरुद्रात्मिकेत्यथ भूतसृष्टिश्रुतौ प्रथिव्या उदके तस्य तेजसि तस्य परमात्मनि लयश्रवणात् । ' सदायतना सत्प्र तिष्ठा ' इति । तस्येश्वरी विभूतिविशेषो वा ॥ ॐ लकुले श्वर्यै नमः ॥ , लब्धमाना लब्धरसा लब्धसपत्समुन्नति । ह्रींकारिणीच ह्रींकारी ह्रीं मध्या ह्रींशिखामणि ॥ लब्धमाना । सर्वै प्राणिभि लब्ध मान अभ्यस्ताहका र, आभमानात्मकस्तद्वदहकार प्रकीर्त्यते ' इति स्मरणात् । अध्यासेनाहकाराधिष्ठानेत्यथ । अथवा, ' मान पूजायाम्' इति स्मरणात् यैर्ये प्राणिभि विद्यैश्वर्यकुलसौन्दयातिशयादि वशात् पूजा लभ्यते सुखहेतु सा तदन्तर्यामिणा पूर्वमेव लब्धा, पूजादिजन्योपकारस्य सुखादे स्वस्वरूपतया लब्ध- २४४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । त्वात् । यद्वा मान परिमाण अणुमहद्दीघह्रस्वभेदेन प्रसि द्ध । 'म वा एष महानज आत्मा महान प्रभुर्वै पुरुष 'अदीयान् महता महीयान्' इत्यादिवेदवाक्यैर्जलसूर्या दिवदुपाधिधर्माणामुपहिते गजस्तम्भमत्कुणसर्पादौ प्रतीयमा नत्वात्, लब्ध मान परिमाण उपहिततया जगत यथा सा तथा ॥ ॐ लब्धमानायै नमः ॥ ' लब्धरसा । ' रसो वै स इति श्रुते रसवत् रस्यते सबध्यत इति अत्यन्तप्रीतिविषय आनन्द, स स्वस्वरूप वन लब्धो यया सा तथा । शृङ्गारग्सो वा, तव्य कम ङ्गलाभरणपुष्पालकारवत्त्वादिति भाव । शुद्धसत्त्वप्रधान- मायोपाधिकतया, रखा स्निग्धा स्थिरा हृद्या आहारा सात्त्विकप्रिया ' इति गीतावचनात् नैवेद्यादौ कट्वाम्ललव णादीना देवादिविषये निषेधाश्च प्रीतिविषयत्वेन मधुररसो लब्धो ययेति वा तथा ॥ ॐ लब्धरसायै नमः ॥ लब्धसपत्समुन्नति । लब्धा स्वस्वरूपतया स्वत सि द्धा या सपद सत्यकामत्वादय सच्चिदानन्दादयो वा साभि समुन्नति सर्वोत्कृष्टता यस्या सेति तथा । ब्रह्मण माथामात्रापाधिना अभिव्यज्यमाना गुणा कर्मानुद्भूतत्वा , ललितात्रिशतीभाष्यम् । २४५ दनाकस्मिका सन्त सर्वोत्कृष्टभाव ब्रह्मण ज्ञापयन्ति । ' तमीश्वराणा परम महेश्वर त देवताना परम च दैवत । पतिं पतीना परम पुरस्ताद्विदाम देव भुवनेशमीड्यम्' ' , सत्यकाम सत्य सकल्प ' एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषो ऽन्तर्याम्येष योनि सर्वस्य' इति ' गतिर्भर्ता प्रभु साक्षी' इत्यादिश्रुतिस्मृतिशतेभ्य एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य इति प्रसिद्ध नित्योत्कर्षवत्त्व ब्रह्मस्वरूपमेवेति नात्र विचारणीय किंचिदस्तीत्यभिप्राय ॥ ॐ लब्धसपत्समुन्नत्यै नमः ॥ हकारिणी । ह्रींकार द्वितीयखण्डसमाप्त्यवयवत्तया वा च्यवाचकसबन्धन अस्था अस्तीति तथा ॥ ॐ ह्रींका रिण्यै नमः ॥ ' ह्रींकाराया । अब ह्रींकारशब्देन तत्कार्यभूता वेदा, तेषामप्यर्थतया कारणतया वा आया आदौ भवा पूर्वभा वीत्यर्थ । शब्दस्य अर्थविषयत्वेन प्रवृत्ते शक्तिमहादौ काव्यादिकृतौ च अर्थज्ञानपूर्वकशब्दप्रयोगदर्शनादर्थस्य पूर्व भावित्वमुक्तमिति भाव ॥ ॐ ह्रींकाराद्यायै नमः ॥ ह्रींमध्या । अस्य बीजस्य जगदभिन्ननिमित्तोपादानभूत मायाविशिष्टचैतन्यवाचकतया तत्प्रतीकत्वेन तन्निष्ठयावद्गुण वव तदुपासनातिशयमहिम्नाभिव्यज्यते । अन्यथा मन्त्रपुर २४६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । श्वर्यास्विष्टसिद्धयभावप्रसङ्ग स्यात् । अव्यवहितपूर्वनाम्नान- भिव्यक्तस्वरूपस्यापि शब्दजालस्य एतद्वीजमात्रात्मनैवाङ्कु- रितबीजार्थवत्तया पूर्व भावित्वमुक्तम् । इदानीमभिव्यक्ता मकस्वार्थकतया विवर्तवादमाश्रित्य वाचारम्भणाकारेण ना मरूपद्वयवत्त्वमुच्यते । ह्रींकारबीजार्थ तेन शब्देन लक्ष्यते । मध्ये व्यवहारकाले ह्रीं यस्या सा तथा । घटादिषु वस्तुषु सच्चिदानन्दप्रतीत्या व्यवहारकालेऽपि प्रपथ्यकारण ब्रह्मानु- स्यूततया भासमान जगत्कारणमिति सिद्धान्त । अनेनाचे - तनपरिणामारम्भादिवादा निष्प्रमाणतया युक्त्याद्याभासक त्वेन निरस्ता वेदितव्या ॥ ॐ ह्रींमध्यायै नमः ॥ ह्रींशिखामणि । लाके यथा चूडामणि सर्वाङ्गरचिता भरणापक्षया तद्विजातीयप्रकाशसत्ताद्याश्रयवान् उत्तमाङ्ग- स्थानविशेषे स्थापित महदैश्वर्यादि तद्वत पुरुषस्य ज्ञाप यति, तथा सर्वशब्दजालतद्वाच्यार्थ भूतचिज्जडसबन्धरूप- प्रपञ्चवाचकातिसूक्ष्महींवर्णात्मक श्रीविद्याराजबीजस्य सत्य ज्ञानानन्दात्मक लक्ष्यार्थभूता सती ह्रींबीजजापकाना सर्वार्थ प्रदानेन पारमैश्वर्य व्यजयतीति गुणयोगकृतनामेदम् । तथा च हीम शिखामणि परमतात्पर्येण ज्ञापयतीत्यर्थ ॥ ॐ हींशिखामणये नम• ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २४७ ह्रींकार कुण्डाग्निशिखा ह्रींकारशशिचन्द्रिका । ह्रींकार भास्कररुचिहींकाराम्भोदचश्चला ॥ ह्रींकारकुण्डाग्निशिखा । ह्रींकार एव कुण्ड वाच्यवाच कसबन्धेन परब्रह्मावच्छेदकतया आहवनीयादिसदृशम्, त स्याग्निशिखा, ' उद्दीप्तेनौ जुहोति ' - इति प्रमाणेन आ हवनीये जुहोति ' - इति विधिवाक्यावगत होमाधारताया केवलाहवनीयस्यायोग्यतया साग्निज्वाला होमाधारताया ज्ञायमानायामदृष्टद्वारा स्वर्गसबन्धेन स्वार्थकतया तज्ज्ञा पकवेदवाक्यस्यापि पुरुषार्थ सबन्धित्वमाहवनीयनिष्ठहोमा धिकरणदीप्ताग्निज्वालास्वाधार भूतकुण्डसार्थक्य सपादकेवाभा ति । तथा स्ववाचकबीजस्यापि ' मन्त्रैरुपासीत ' इति वि धिगतदेवतोपासनकरणाना मन्त्राणामपि स्ववाचकतया सा र्थक्य सपादनात्तथोच्यते ॥ ॐ ह्रींकारकुण्डाग्निशिखायै नम ॥ ह्रीकारशमिचन्द्रिका । ह्रींकार एव शशी चन्द्र तस्य स्वरूपाभेदभूतप्रकाशचैतन्य चन्द्रिकापदेनोपमीयते । यथा चन्द्रस्वरूपभूतामृतप्रसारभूता ज्योत्स्ना देवादि सर्वलोकाना सजीवकतयोपकरोति, तथा दृढतरभक्तिपरवशपुरुषधौरेया २४८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । दीना ह्रींकारवान्यार्थतया तदभिन्नत्वेऽपि जगद्विवर्तकारण तथा सचिदानन्दाधायकत्वेन सजीवयतीति भाव ॥ ॐ ह्रींकारशशिचन्द्रिकायै नमः ॥ ' ह्रींकार भास्कररुचि । भास कान्ती करोति प्रसारयति लाकोपकारायेति तथा सूर्य तस्य रुचि प्रचण्डभानु । यथा लाके सूर्य वर्षाम्वतिगाढतरस्रवदुदकधारासव्याप्तदि गन्तरासु दिवा विद्यमानोऽपि सूर्य साक्षादयमिति चाक्षुष ज्ञानगाचरो न भवति, तदभावे शिष्टाना भोजनादिसजीव कव्यवहाराभावन तदुपायासिद्धयाप्रसन्नमनासि भवन्ति, तथा ज्ञानमार्गानधिकारिणा मोक्षमार्गोपायभूताविदितदेवता रूपकाराणा जनाना बहुतरपुण्यमहिम्ना महावातनेव मेघा बलौ दूरीकृताया [चण्डभानुरिव सुखसाधन गुरुकृपापाङ्गाव लोकनरूपदीक्षावशेन प्रतिबन्धक दुरितापगमे परदेवतारूप हूकार पुरश्चर्यया साक्षाद्वाच्यार्थापरोक्षज्ञानहेतुर्भवति । चिरकालनैरन्तर्यभावनाप्रकर्षेण तस्मिन्नभिमुखे मति तल्ल क्ष्यार्थरूपपरमानन्दचित्कला स्वयमेवाभिव्यक्ता सत्यानन्दा नुभवामृतेन सुखयतीति तथोच्यते ॥ ॐ ह्रींकारभास्कर रुचये नमः ॥ ह्रींकाराम्भोदचञ्चला । अम्भासि अमृतानि ददतीत्य ललितात्रिशतीभाष्यम् । २४४९ भादा, ह्रींकारोऽपि कामवर्षत्वन तैरुपमीयत । तेषु चश्च ला विद्युल्लता विद्यमाना तदभिन्नप्रकाशमाना सती वर्षोद कद्वारा सस्याद्युत्पादकत्व यथा व्यन्दन्ति तथा ह्रींकारवाच्य तया तदभिन्नापि तत्स्वरूपविचारणाया शुद्धलक्ष्यार्थस्वरूपा सत्यपि अनिर्वचनीयस्ववाचकमन्त्रप्रकाशितदेवतात्वेन स्वा भीष्टपुरुषार्थ प्रामहेतुभूतेत्यभिसंधि ॥ ॐ ह्रींकाराम्भोद चञ्चलायै नमः ॥ ह्रींकारकन्दाङ्कुरिका ह्रींकारैकपरायणा । ह्रींकारदीर्घिकाहसी ह्रींकारोद्यानकेकिनी ॥ ह्रींकारकन्दारिका । ह्रींकार एव कन्दम् दृढतरबीज भाव तस्य अङ्कुरिका आदिप्रसव नूतनाभिव्यक्तिरित्यर्थ । यथा लोके अङ्कुरादिक कन्दादिनिष्ठोत्पादकशक्तिमनभिभू यैव स्वयं स्कन्धशाखापत्रपुष्पफलाद्यात्मना यथा विवर्तमा- न तत्सामर्थ्यप्रकटनकारण भवति, तथा ह्रींकारम्य वेदैकदे- शत्वेन इतर प्रमाणानपेक्षतया स्ववाच्यार्थज्ञापनन स्वत प्रा माण्ये स्थितऽपि तज्जन्यज्ञानविषयतावच्छेदकधमरूपनाना प्रकारजगत्परिणामहेतुत्वसाधका घटित घटनापटीयसीमायोपा- धिकत्वेन तदर्थद्वयरूपा सती तन्मात्रप्रमाणवेद्येत्यर्थ ॥ ॐ २५० ललितात्रिशतीभाष्यम् । कारकन्दारिकायै नमः ॥ ह्रींकारैकपरायणा । ड्रींकार एव एक अनितरसाधारण चतुर्विधपुरुषार्थसाधकतया परम् अयन ज्ञापक प्रमाण यस्या सा तथा । अस्य बीजस्य वाच्यार्थो माया, सा निर- धिष्ठाना न सिध्यतीति तदाश्रयत्वविषयत्वाभ्या तद्रहित तेन ज्ञाप्यत इति भाव ॥ ॐ ह्रींकारैकपरायणायै नमः ॥ ह्रींकारदीर्घिकासी । ह्रींकार एव दीर्घिका राजोद्यान वनक्रीडावापी । ससारकाननसचारिलोकविश्रान्तिकारण त्वेन ह्रींकार तयोपमीयते, 'आराममस्य पश्यन्ति न त पश्यति कश्चन' इति श्रुते । आ समन्ताद्रमत्यस्मिन इत्या राम अथवा जगत् । तत्रोपासनादिना परमानन्दप्रापक- तया वा ह्रींकार उपमीयते । तस्मिन् हसी स्त्रीहस । यथा लोके सारासारविवेकहस्या आधारसुवर्णकमलादिमती वापि का महाराजसबन्धिनी विज्ञाप्यते, तद्वद्वान्यार्थरूपतया प्रका शमाना सती स्वसबन्धिबीजस्य सुखोत्पादकत्व मोक्षहेतुत्व द्योतयतीत्यभिप्राय ॥ ॐ ह्रींकारदीर्घिकाहस्यै नम ॥ ह्रींकाराद्यानकेकिनी । ह्रींकार एव उद्यानवत् फलानुभा वकत्वात् तथोन्यते तस्य केकिनी मयूरी । यथा लोके ललितात्रिशतीभाष्यम् । २५१ बहुषु पक्षिषु आरण्यकेषु सत्स्वपि तस्या रूपध्वनिभ्या सुखतया दर्शनश्रवणादिजन्यप्रमोदसाधकतया उद्यानालक रिष्णुत्वम, तथा ह्रींकाररूपदेवताध्वने सचिदानन्दरूपत द्वाच्यार्थस्य च परमपुरुषार्थसाधकत्वेन अविशिष्टत्वेऽपि ब्र विष्णुरुद्रादिमूर्तिषु उद्यानतरुवल्लिकक्षगुल्मादिवदुत्तमनीच देवतिर्यङ मनुष्यादिषु च मयूरीव स्वेच्छया सर्वव्यापकत्वेन तदात्मरूपतया शरीरन्द्रियप्राणायाधारपरमप्रेमास्पदपरमा नन्दरूप प्रत्यग्गोचराहवृत्तिव्याप्य तयैतद्वीजप्रकाश्या भवती त्यर्थ ॥ ॐ ह्रींकारोद्यानकेकिन्यै नमः ॥ ह्रींकारारण्यहरिणी ह्रींकारावालवल्लरी । ह्रींकारपञ्जरशुकी ह्रींकाराङ्गणदीपिका ॥ ह्रींकारारण्यहरिणी । ह्रीकारवाच्यार्थैकदेशभूतमायावि द्यात कार्याणा बन्धरूपतया गहने व्याघ्रादीनामिव भयहे तूना सद्भावेन दुष्प्रवेशत्वरूपधर्मसाम्येन ह्रींकारस्य अरण्यो पमितत्वम् । तथा च अरण्यमिव ह्रींकार इति सर्वत्रोपमा नोत्तरपदसमास । तत्रैव सति यथारण्यगतपुरुषस्य शीघ्र दृष्टिपथ गता हरिणी एणी व्याघ्राद्यभावनिश्चयेन तदधिगम फलप्राप्तिसाधनतामवगमयति धीरपुरुषस्य, तथा निरन्तरभ २५२ ललितात्रिशतीभाष्यम । क्तिभजनपरप्राणिलोकस्य उपासनापरिपाकमहिना अपरोक्षी- कृताज्ञाननिवृत्तिपूर्वक भयापकरणेनानन्द प्रापयतीति तयो पमितेति भाव । ' तमेव विदित्वातिमृत्युमेति' इति श्रुत ॥ ॐ ह्रींकारारण्यहरिण्यै नम ॥ ह्रींकारावालवल्लरी । ह्रींकारमन्त्रवाचकतानिरूपितवा च्यतानामकसबन्धावच्छिन्न परदेवतास्वरूपत्वन तदुपासना विषय फलदानसमर्था सती आवालमात्र प्ररोहद्विवृद्धवल्लय पमीयते । तथा च तत्सबन्धितया ह्रींकार जपादिना आ वाल इव सर्वदा सरक्षणीय इति तात्पर्यार्थ परिनिष्पन्न इति यावत् ॥ ॐ ह्रींकारावालवल्लयै नम ॥ ह्रींकारपञ्जरशुकी । मन्दाधिकारिणामप्युपासनाकारण साधारणपार्वती प्रतीकतया हूकारस्य बालकादिलालनविषय त्वधर्मपुरस्कारण पञ्जरोपमा । तथा च तनत्यशुकीव सला पादिना मनुष्यादिचित्तरखिनी । एव तत्तद्दृष्टानुसारेण फ- लदानी सत्ती तयोपमितेति द्रष्टव्यम् । ह्रीकार पञ्जरमिव शुकी तत्सार्थक्यकारिणीत्यभिप्राय ॥ ॐ ह्रींकारप खरशुक्यै नमः ॥ ह्रींकाराङ्गणदीपिका । अङ्गणवत् सर्वसाधारण विश्रान्ति स्थानतया ह्रींकारस्य तदुपमा तस्य दीपिका । यथाङ्गणारो ललितात्रिशतीभाष्यम् । २५३ पितदीप बाह्याभ्यन्तरवस्तुजात प्रकाशयन तत्रत्यलोकाना मन्धकारादिनिवर्तनपूर्वकमभीष्टव्यवहारहेतुतया सर्वान् ला घयति स्वयमपि तै सरक्ष्यते, तथा ड्रींकारबीजार्थ श्रवणम नननिदिध्यासननिरन्तराभ्यासादपरोक्षीकृतस्वयप्रकाशानन्द रूपा सती स्वसेवकान् सर्वोत्कर्षयतीति तदुपमिता सती तथोच्यते ॥ ॐ हीकाराङ्गणदीपिकायै नम ॥ ह्रींकारकन्दरासिही ह्रींकाराम्भोजभृङ्गिका । ह्रींकारसुमनोमाध्वी ह्रींकारतरुमञ्जरी । 1 ह्रींकारकन्दरासिंही । पर्वतशिखाप्रवर्तिगुहा कन्दरा द- रीत्यर्थ । वेदमौलिपठितहींकारस्य प्राम्यविषयलिप्सुप्राणि प्रवेशयोग्यताविकलतया कन्दरापमा । तत्र यथा सिंही स्वेतरक्षुद्रमृगप्रवेश भयहेतुसटादिस्वव्याप्य चिह्नानुमिता तस्या स्वाश्रयमात्रता धीरस्य तत्परिसरनखनिर्घातमुक्ताफलादि प्राप्तिं च नयति, तथा मन्दभक्तितन्द्रीबुभुक्षादिकलुषित- परिच्छिन्नाभिमानदेवतान्तरप्रतिपादकबीजतया स्वदेवतैक भाव कामितार्थं च प्रापयतीति सिंधुपमिता सती तथो न्यते ॥ ॐ ह्रींकारकन्दरासिंह नम ॥ ह्रींकाराम्भोजभृङ्गिका । ड्रींकारख अष्टैश्वर्यात्मकपुरुषा २५४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । र्थसाधकनानाशक्तिमत्तया नानाप्रकारवर्णान्तरघटितत्वेन प- रागपरिमलादिमत्कमलोपमितत्वमिति याजनीयम् । कमले यथा मधुमात्रसारप्राहिणी भृङ्गी रमते सर्वपुष्परसमधुपा- स्वाभाव्येन सर्वसमापि मध्वाधिक्यविविदिषया प्रभूतम धुवत्वेन च तस्मिन्नेव विशिष्यासक्तिमती, तथा सर्वमन्त्र बीजवाच्यदेवतात्मना सर्वानुगतापि ह्रींकारस्य विशिष्टगुण वत्त्वेन सर्वोपादानसगुणब्रह्मप्रतिपादकतया तदीयस्वरूपत टस्थलक्षणस्वेन तदभिन्नस्वरूपतया सर्वशब्दजालप्रकृति- त्वेन च रूढ्या लक्षणया वा तत्सबन्धिनी सती तदुपास काना तदधिष्ठानतया च तैलक्ष्यत इति भृड्युपमया व णितेति तात्पर्यम् ॥ ॐ ह्रींकाराम्भोजभृङ्गिकायै नमः ॥ ह्रींकारसुमनोमाध्वी । ह्रींकारस्य वाञ्छितफलप्रदानसा- धकतया सुमन सादृश्यम । अथवा, पुष्पाणि व्यवहारसमये बहुसावधानतया व्यवहर्तव्यानि परममार्दवाधिकरणत्वेन बहु मान्यत्वात् तथा ह्रींकारोऽप्युपासनवेलाया परब्रह्मवाचकत्वेन प्रयत्नपूर्वकमेकाग्रमनसा देवताभिन्नत्वेन ध्यातव्य इति निय मसपादनार्थं पुष्पोपममिति विभावनीयम् । तथा च वा- वादिना शुष्काणि पुष्पाणि निर्मधुत्वेन फलान्यजनयित्वा परिपतन्ति फलजनकशक्तेरभावेन तदितराणि तु तद्वत्वेन ललितात्रिशतीभाष्यम् । ' २५५ तज्जनकानि लोके दृष्टानि पुष्परसश्च पृथिवीकारणभूतादक तन्मात्रस्वरूपमधुररसात्मकत्वात् पुष्पाणा फलजनकशक्तिज्ञा पको भवति, तथा ह्रींकारस्यापि सर्वजनकता शक्याधायकत दधिष्ठान सच्चिदानन्दपरब्रह्मस्वरूपा सती तन्मन्त्रप्राप्त्या यथोक्तफलहेतुतया तदर्थरूपेण तद्वृत्तिर्भवतीति माध्वीसमा - नधर्मवत्त्वमस्या उपपद्यत इति विवेचनीयमिति यावत् ॥ ॐ ह्रींकारसुमनोमाव्यै नमः ॥ ह्रींकारतरुमञ्जरी । फलार्थिन स्वारूढजनान् पतनादि भ्य प्रतिबन्धकेभ्यस्तारयति पार प्रापयति फललाभेन स तोषयतीति तरु । ह्रींकारस्य कल्पादितरुईष्टान्तीकृत । प्रेक्षावता सवादिप्रवृत्तिजनकत्वेन शाखोपशाखाग्रगता पुष्प मञ्जरी फलकारणयोग्यता ज्ञापयतीव पुरुषार्थार्थिना अस शयप्रवर्तकत्वेन प्रत्यक्स्वरूपा सती गुरूपदिष्टमन्त्रदेवतात्म कतया मन्त्रोपासनायामभिमुखीकरणेन पुरुषार्थान् प्राप यतीति मश्वरीसादृश्य प्राप्त परदेवताया इति विवेचनी यम् ॥ ॐ ह्रींकारतरुमञ्जर्यै नमः ॥ सकाराख्या ममरसा सकलागमसस्तुता । सर्ववेदान्ततात्पर्यभूमि. सदसदाश्रया ॥ सकाराख्या । सकारयुक्ता श्रीविद्यानामिका आख्या २५६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । वाचकशब्द यस्या सा तथा ॥ ॐ सकाराख्यायै नम ॥ समरसा । सम एक रस मधुरादिरसवद्गुडपिण्डादा वेकरूपेण कार्ये व्यवस्थितेत्यर्थ । अथवा, ससारदशाया सर्वज्ञत्व किंचिज्ज्ञत्वादिविशेषणभेदेन भिन्नरसवत् भिन्नस्वभा ववत् प्रतीयमानयोरीश्वरजीवयोर्वेदान्तश्रवणादिना जन्या- खण्डाकारवृत्ति व्याप्त्या अह ब्रह्मास्मि इत्य भेदानुभवदशा- यामेकरूपतया साक्षात्कियते इति सा तथोन्यते, 'रसो वै स' इति श्रुते, रसशब्दार्थ परब्रह्म सम अभिन्न यस्या सा तथा । तैत्तिरीयोपनिषत्प्रतिपाद्येत्यर्थ ॥ ॐ समरसायै नम ॥ सकलागमसस्तुता । आ समन्तात् गमयन्तीति आगमा, सकलपदार्थगोचरसविकल्पक प्रमाजनकवेदा इत्यर्थ । सकलै रन्यूनानतिरेकेणेतिहासपुराणसहितयावदङ्गोपाङ्गरहस्यादियो गित्व सकलशब्दार्थ । तै सस्तुता सम्यक् नात पर किवि दस्तीति निश्चयपूर्वक स्तुता गुणिनिष्ठगुणाभिधानविषयतया तदुपजीवकेत्यर्थ । सर्वार्थप्रकाशकवेदाना सर्वशत्वेनैदपर्येण तदीयस्तुतिविषयतया शुद्धचैतन्यात्मकतया मोक्षकारणीभू तज्ञानस्वरूपत्वेन जिज्ञास्येति ध्वनितोऽर्थ ॥ ॐ सकला गमसस्तुतायै नम ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २५७ सर्ववेदान्ततात्पर्यभूमि । वेदानामन्त अवसान तत्त्वम स्यादिमहावाक्यानि तेषा तात्पर्य समन्वय सामानाधिक रण्यमित्यर्थ । तस्य भूमि विषय ज्ञाप्यमिति यावत् । 'उपक्रमाप सहारावभ्यासाऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्ग तात्पर्यनिर्णये' इति वचनोक्ततात्पर्यनिर्णायकप्रमा णबलेनातीन्द्रियधर्मादिगोचरवाक्यवत् सर्वेषा वेदान्ता नामुपासनाज्ञानविधिं विनाकर्मशेषतया अज्ञातज्ञापकत्वेन शासनादेव शास्त्रशब्दवाच्यानामद्वैते ब्रह्मणि गतिसामान्येन कर्मोपासनाकाण्डद्वयार्थोपकार्यत्वेन मोक्षहेतुज्ञानजनकत्वेन पर्यवसानमिति तात्पर्यविषयता अखण्डचैतन्यस्येति सि द्धान्तार्थ इत्यभिसधि । ' सामानाधिकरण्य च विशेषण विशेष्यता । लक्ष्यलक्षणभावश्च पदार्थ प्रत्यगात्मनाम्' इति न्यायेन सबन्धत्रयेण अखण्डार्थे वेदान्ता बोधयन्तीति ' तत्तु समन्वयात्' इत्यधिकरणे प्रतिष्ठापितमित्यलमति वि स्तरेण ॥ ॐ सर्ववेदान्ततात्पर्यभूमये नमः ॥ सदसदाश्रया । अपरोक्षतया सन्निति प्रतीतिविषयतया व्यवह्रियमाण सत्कार्य रूपादिवत्तया व्यावहारिकसताश्रय पृथिव्यप्तेजोभूतत्रय सदित्युच्यते । असत् सद्भिन्नतया परो क्षज्ञानगोचर वाय्वाकाशादि तत्कार्य च रूपादिभिन्नगुणाश्र RU VII 17 २५८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । यमुच्यत इत्यर्थं । तयोराश्रया उपादानत्वेन तदधिष्ठानभूते त्यर्थ । आरोपितस्याधिष्ठानमत्तातिरिक्तसत्ताशून्यतया सत्ता स्फूर्तिप्रदत्वेन सर्वदा तदनुस्यूतेति ध्येयम ॥ ॐ सदसदा श्रयायै नमः ॥ सकला सच्चिदानन्दा साध्या सद्गतिदायिनी । सनकादिमुनिध्येया सदाशिव कुटुम्बिनी ॥ सकला । आरोपितकलाभि उपासनार्थं कल्पिताभि जाबालिना सत्यकाम प्रत्युक्तषोडशकलायुक्तपुरुषोपासनप्रति पादकच्छान्दोग्यवचनरीत्या कलाशब्दितावयवै सह वर्तते इति सा तथा । चतु षष्टिचन्द्रकलाभ्या वा सहिता । अथवा, कलाशब्द सुखादिकान्तिवचन तया सहितेति वा ॥ ॐ सकलायै नमः ॥ सचिदानन्दा । सच्चासौ चिश्च सश्चित् सविश्वासौ आन- न्दा, कालत्रयाबाध्यत्व सत्त्वम्, स्वेतरप्रकाशाप्रकाश्यत्व चिश्वम्, परमप्रेमास्पदत्वमानन्दत्वम्, 'सत्य ज्ञानमनन्तम् ' विज्ञानमानन्दम् ' ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' , ' प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञान ब्रह्म 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' 'आ नन्द ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन' इत्यादिश्रुतिभ्य । ललितात्रिशतीभाष्यम् । २५९ ते स्वरूप यस्या सा तथोक्ता । वेदान्तशास्त्रोक्तब्रह्मस्वरूप लक्षणलक्षितेत्यर्थ ॥ ॐ सच्चिदानन्दायै नमः ॥ साध्या । कर्मोपासनादिभि महावाक्यश्रवणजन्यब्रह्म विद्यात्वेन सकल- साधनचतुष्टयसपन्नाधिकारिणा अपरोक्षतया साधितु प्राप्तुमहा, फलस्वरूपत्वादित्यर्थ । साध्वीति वा पाठ साधो स्त्री, सत्त्वगुणसंपन्नत्वात् साधु, विद्यापारगत्वे सति सदाचारसपन्न देवी सपत्तिमानित्य थ । तदेकनिष्ठा परमपतिव्रता सती स्त्रीणा पातिव्रत्यसप्रदा यप्रवर्तकेति यावत् ॥ ॐ साध्यायै नमः ॥ । सद्गतिदायिनी । समीचीना पुनरावृत्तिरहिता सुखमात्र रूपा गति, गम्यते ज्ञायते प्राप्यते इति वा गति । यत् ज्ञायते तदेव गति, तदन्यस्याज्ञातत्वात् गतित्वानुपपत्ते । ज्ञाते फले इच्छया तत्साधनेषु पुरुष प्रवर्तते, न त्व ज्ञातफलसाधने - इत्यन्वयव्यतिरेकाभ्याम्, 'ब्रह्मविदाप्नाति परम ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' ' ये पूर्व देवा ऋषयश्च तद्विदु ते तन्मया अमृता वै बभूवु' इत्यादिश्रुत्या च परदेवतास्वरूपमेव मुक्तिस्वरूपतया सद्गति । तदावार- काज्ञानाभिभवेन स्वरूपानन्दमभिव्यजयतीति दायिनी । अभेदेऽपि गतिदानयो कर्मकर्तृप्रयाग उपपद्यते । 'तदा ." 6 २६० ललितात्रिशतीभाष्यम् । ॐ मान स्वयमकुरुत' इत्यादिवदित्यथ । सतीं वा सत्वगु युक्ता देवयानादिगतिं वा ददातीति सा तथा ॥ तिदायिन्यै नम ॥ ' सद्ग सनकादिमुनिध्येया । मननशीला मुनय, मननशब्दन लक्षणया तत्साक्षात्कारवन्त इत्यथ ब्रह्मण मानसिकपुत्रा ज्ञानवैराग्यादिबहुला मोक्षमागप्रवर्तका सनक आदि येषा त मुनय सनन्दनसनातनसनत्कुमारप्रमुखा निरै षणा निश्चिन्ता, तैयैया अत्यादरेण स्वात्माभदज्ञानन स र्वदा विषयीकृतेत्यर्थ 'त्व वा अहमस्मि भगवो देवत अह वैवमसि' ' ' , " क्षत्रज्ञ चापि मा विद्धि' आत्मान चेद्वि जानीयादहमस्मीति पूरुष 'अथ योऽन्या देवतामुपास्त ऽन्याऽसावन्याऽहमस्मीति न स वद यथा पशु 'मृत्यो स मृत्युमाप्नाति य इह नानेव पश्यति' इत्यादिश्रुतिस्मृति शतेभ्य ॥ ॐ सनकादिमुनिध्येयायै नमः ॥ सदाशिव कुटुम्बिनी । सदाशिव कुटुम्बम अस्या अस्तीति तथा ॥ ॐ सदाशिवकुटुम्बिन्यै नम ॥ सकलाधिष्ठानरूपा सत्यरूपा समाकृति. । सर्वप्रपञ्चनिर्मात्री समानाधिकवर्जिता ॥ ललिता त्रिशतीभाष्यम् । सकलाधिष्ठानरूपा । " २६१ अथात आदेशो नेति नेति' 'नेह नानास्ति किंचन' इत्यादिनिषेधश्रुतिभ्य प्रतिपन्ना । ' सर्वे खल्विद ब्रह्म' इत्यादिबाधाया सामानाधिकरण्य मवगम्यते । कार्यम्य कारणाभेदज्ञान बाधा । तद्भिन्नता ज्ञानस्य भ्रमरूपत्वात् । तथा च श्रुतिनिषेधस्यावध्यपेक्षा या प्रकृत्यादीनामपि तत्त्वज्ञानेन निवृत्तौ भूतपूर्वगत्या सर्वाधि ष्ठानत्वेन अनुभूयते इति भाव ॥ ॐ सकलाधिष्ठान- रूपायै नमः ॥ सत्यरूपा । सत्य जडानृतपरिच्छिन्न व्यावृत्तत्व सच्चिदान- न्दरूप यस्वा सा तथा । परिणामवादमाश्रित्य सत् अपरोक्ष- ज्ञानयोग्यानि पृथिव्यप्तेजासि, त्यत्तु परोक्षज्ञानविषया नि त्यानुमेया इत्यर्थ, 'सच त्यच्चाभवत्' इति श्रुते । सत्य रूप यस्या सा तथा ॥ ॐ सत्यरूपायै नमः ॥ समाकृति । समा अभिन्ना सच्चिदानन्दरूपैकरसा आ कृति मूर्ति स्वरूप यस्या सा तथोक्ता । समा अन्यूना नतिरिक्ता यथाशास्त्रप्रमाण मूर्तिर्विग्रहो यस्या सेति वा । समा सदाशिवेन गुणसौन्दर्य बलवीर्ययशोगाम्भीर्य धैर्येङ्गि- तादिपरिज्ञान सर्वज्ञत्वादिबहुलधर्मविशेषै मूर्तिर्यस्या सेति वा । चतुर्विधभूतप्रामेषु तत्तत्प्रारब्धानुसारेण सभा २६२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । तत्र तत्र निवासयाग्या मूर्तिर्यस्या मति वा । कर्माध्यक्ष तया तत्तत्फलविशेषदानेषु समा पक्षपातरहिता मूर्तिर्यस्या सा । समा बाल्यस्थविरत्वादिभावविकारवर्जिता एक प्रकारा नित्ययौवनशालिनी मूर्तिर्यस्या सा । 'मम सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम' अङ्गुष्ठमात्र पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनाना हृदये मनिविष्ट ' इति स्मृतिश्रुतिभ्यामे- करूपत्वावगमादित्याशय ॥ ॐ समाकृतये नमः ॥ सर्वप्रपवनिर्मात्री । ससारस्थानादितया माक्षस्थायित्वन च भूतभविष्यद्वर्तमानगत्या सर्वशब्दवान्यत्व प्रपञ्चम्य प्रप च्यते विस्तार्यते विवर्तत इति प्रपञ्च, 'एक बीज बहुधा य करोति' इति श्रुते । तस्य निर्मात्री निर्माणमभिव्यक्ति तन्निमित्ततया तत्तत्कर्तृत्वमुपचर्यते, दवदत्त पचतीतिवत ॥ ॐ सर्वप्रपञ्च निर्मात्र्यै नमः ॥ समान, ' समानाधिकवर्जिता । कुलशीलजातिगुणादिभि तुल्य तै श्रेयानधिक तैर्वजिता । । ' न तस्य प्रति- मास्ति ' ' विश्वाधिको रुद्रो महर्षि ' इति श्रुते, ' सर्वाधि पत्य कुरुते महात्मा' इति 'एकमेवाद्वितीयम् ' ' न त्वत्स मोऽस्त्यभ्यधिक कुतोऽन्यो लोकत्रये' इत्यादिश्रुतिस्मृति- भ्या चेति भाव । एतद्दृष्टथा समाननीय समान पूजनी ललितात्रिशतीभाष्यम् । २६३ योऽधिक तहूयेन वर्जिता । ' एकमेवाद्वितीय ब्रह्म' इत्यादि - श्रुतेरिति वार्थ ॥ ॐ समानाधिकवर्जितायै नमः ॥ सर्वोत्तुङ्गा सगहीना सगुणा सकलेश्वरी । ककारिणी काव्यलोला कामेश्वरमनोहरा । सर्वोत्तुङ्गा । कार्यापेक्षया कारणस्याधिकत्वात् सर्वा पेक्षया उत्तुङ्गा उन्नता, ' पादोऽस्य विश्वा भूतानि । त्रिपा दस्यामृत दिवि' इति श्रुते ॥ ॐ सर्वोचुङ्गायै नमः ॥ सगहीना । निरवयवत्वेन निष्कारणत्वन वा निर्गुणत्वेन वा निराश्रयत्वेन वा नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वरूपत्वेन सबन्धर हिता वा, 'असगो न हि सज्जते ' ' न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिप ' इत्यादिश्रतेरित्याशय ॥ ॐ सगहीनायै नम ॥ , सगुणा । समा एकप्रकारा गुणा सत्यकामत्वादय य या सा तथा । 'गुणी सर्वविद्य ' ' सत्यकाम सत्यसक- ल्प' इत्यादिश्रुते । त्रिमूर्तिस्वरूपतया सत्त्वरजस्तमोगुणै सह वर्तते इति वा तथा ॥ ॐ सगुणायै नमः ॥ सकलेष्टदा । इच्छाविषयभूतानि इष्टानि काम्यानीत्य- थे, सकलानि च तानीत्यभेदसमास, अन्यथा जीवादि- २६४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । ' वत् कस्मिंश्चिद्विषये असामर्थ्यशङ्का स्यात् । एकस्य पदार्थस्य बहूनामिच्छाविषयत्वदर्शनात्, एकत्र कामनायामपि तत्स - इभावित्वेन सर्वप्रापकत्वोक्ती परदेवताया बहुफलप्रदातृत्वेन अत्यन्तविश्वसनीयतया अतिशयप्रतिभानाश्वेत्यर्थ । अथवा, परिच्छिन्नपरिमितभाग्यवत्प्राणिन सर्वस्य सर्वत्र इच्छाया मपि, यानि सर्वाणि स्वबुद्धया शास्त्राविरोधेनेष्टानि एषित- व्यानि वाञ्छितव्यानि तान्येव प्रयच्छति ददाति, न तद धिकानि, लोकेच्छाया बहुप्रकारत्वेन दुष्पूरणीयत्वादिति भाव । सर्वेषा प्राणिनामिष्टया इज्यया पूजया विषयीकृता, यज्ञेन वा समाराधिता तस्य फलप्रदेत्यर्थ । 'अह च स वयज्ञाना भोक्ता च प्रभुरेव च 'एष व साधु कर्म का रयति यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषति' इति स्मृतिश्रुतिभ्या परमेश्वरार्पणबुद्धया क्रियमाणस्यैव कर्मण शुभफलत्वात् मुक्तिहेतुत्वेन, काम्यफलार्थिना जन्ममरणादिबन्धकत्वेन स्व- स्पफलतया अनादरणीयत्वादित्यर्थ । अथवा, कलाभि अ- वयवै तरतमभावैरित्यर्थ । ते सहितानि इष्टानि फ- लानि मनुष्यानन्दादिब्रह्मानन्दपर्यन्तानि फलानि आनन्द स्वरूपाणि ददातीति तथा ॥ ॐ सकलेष्टदायै नमः ॥ ककारिणी । तृतीयखण्डद्वितीयवर्णरूप ककारावयव ललितात्रिशतीभाष्यम् । २६५ वाचक अस्या अस्तीति तथा । ॐ ककारिण्यै नमः ॥ काव्यलोला । वाल्मीकिवेदव्यासादिकृतेषु काव्येषु लो ला, वाच्यलक्ष्यार्थभेदेन तत्र सबद्धेत्यर्थ । अथवा, कवि भि कृतेषु स्तुतिविशेषेषु प्रीतिमतीत्यर्थ ॥ ॐ काव्यलो लायै नमः ! कामश्वरमनोहरा । कामेश्वरस्य मन हरतीति तथा । ॐ कामेश्वरमनोहरायै नम ॥ कामेश्वरप्राणनाडी कामेशोत्सङ्गवासिनी । कामेश्वरालिङ्गिताङ्गी कामेश्वरसुखप्रदा ॥ कामेश्वरप्राणनाडी । कामेश्वरस्य प्राणनाडी यथा नाड्या प्राण सचरति सा तथा, जीवनाडीत्यर्थ । ' इडया तु बहि र्याति' इति लयखण्डवचनात । लोके विशम्यमाने पशौ हृदय पुण्डरीकाकार मासखण्डात्मकान्त सुषिराष्टदलोपेतमङ्गुष्ठप रिमाणसुषिरयुताधाभागकर्णिकामध्य दृश्यते, तथा कर्णिका या कसरायमाना एकशत नाडीनामङ्करा तद्वेष्टनपुरीत ग्राम कनाडी सुषिरविन्यस्तमूला भवन्ति । तत्र सुषुम्नानामकनाडी मूलाधारादारभ्य ब्रह्मर ध्रपर्यन्त गता । तस्या षट् चक्राणि मूलाधारादीनि तत्तन्मातृकावर्णसहितयोगशास्त्रोक्तदलसयु २६६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । I तानि सनद्धानि वर्तन्त । तस्या मूल पृथ्वीदेवता बिसतन्तुत यस कुण्डलिन्यधोमुखावरणशक्तिर्निद्राति । तस्या दक्षि- णभागे इलानामनाडी भ्रूमध्यपर्यन्त प्रसृता । वामे पिङ्गला तथा । तथा च जाग्रदवस्थाया नेत्रयो दपत्यात्मना श्रुतिप्रतिपादित, स्वप्ने मनउपाधिक, सुषुप्तावज्ञानोपाधि क, जाग्रति स्थूलशरीराभिमानी विश्व इत्युच्यत, स्वप्ने सू- क्ष्माभिमानी तैजस, सुषुप्तौ कारणाभिमानी प्राज्ञ । सुषु- प्तौ कारणात्मना स्थितानि स्थूलसूक्ष्मशरीरजन्य भोगमा धन प्रारब्धकर्मवशेन पुरीद्वारा नाडीमार्गेण तत्तोलकानि प्रवि शन्ति इन्द्रियाणि । तदुपरमप्रारब्धोद्बोधे आन्दोलिकाया वि द्यमानो राजा गृहान्तरे सोपानमागद्वारा प्रासादे विहृत्य त- दवच्छिन्नान्त पुरपर्यङ्के शयान इव नाडीद्वारा पुरीतत्प्रविश्य तदवच्छिन्नहृदयोपाधिक परमात्मान यदा प्रविशति तदा सुप्त इत्युच्यते । लिङ्गशरीर कारणात्मना लीयत । तदा प्राणा दिवायव प्रलीनवृत्तय सन्त आयु स्वरूपेण शरीर रक्षन्ति । तथा च भाविजाग्रत्स्वप्रभोगानुकूलकर्मानुबन्धप्राणधारण सु- षुप्तौ सोपाधिकचैतन्यस्यैव दृश्यते । तत्सत्तया च नाडीना प्राणसचारयोग्यतापि । एव च सति न प्राणेन नापानेन मत्यों जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपा- ' ललितात्रिचतीभाष्यम् । २५७ श्रितौ ' इति श्रुत्या 'जीव प्राणधारणे' इति धातुपाठाश्च प्राण नाडीशब्दस्य लक्षणया परमात्मैवोक्यते । कामेश्वरस्यैव प्रारब्धकर्मजन्यशरीरमात्राभावेऽपि घृतकाठिन्यन्यायेन मूर्ति मत्तया तदन्तर्यामिसभावनया एतन्नाम । कामेश्वरस्य प्राण नाडी तदधिष्ठानचैतन्यमिति फलितोऽर्थ ॥ ॐ कामेश्वर प्राणनाड्यै नम ॥ कामशोत्सगवासिनी । कामेशस्य उत्सगे वामाङ्के वसती ति तथा । ' अनेकमन्मथाकारकामेशोत्सगवासिनी' इति ललितातापनीये ॥ ॐ कामेशोत्सगवासिन्यै नमः ॥ कामेश्वरालिङ्गिताङ्गी । तेन आलिङ्गितम अङ्गीकृतम् अङ्ग यथा सा तथा ॥ ॐ कामेश्वरालिङ्गितायै नम ॥ कामेश्वरसुखप्रदा । कामेश्वराय सुख प्रददातीति वा । कामेश्वरस्य यत्सुख ब्रह्मस्वरूपसच्चिदानन्द साक्षात्कारात्म कम, ' दवो भूत्वा देवानप्येति' इति श्रुत्युक्तन्यायात् स्व कीयभक्ताना कामेश्वराभेदरूप सच्चिदानन्दघनात्मक मोक्ष ददातीत्यर्थ ॥ ॐ कामेश्वरसुखप्रदायै नमः ॥ कामेश्वरप्रणयिनी कामेश्वरविलासिनी । कामेश्वरतप सिद्धि. कामेश्वरमन प्रिया ॥ २६८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । कामेश्वरप्रणयिनी । कामेश्वरस्य स्वस्वरूपे परमानन्दघने या प्रीति तद्विषयभूतेत्यर्थ ॥ ॐ कामेश्वरप्रणयिन्यै नम ॥ कामेश्वरविलासिनी । कामेश्वरस्य विलास कार्यात्मना विवर्तोऽस्या अस्तीति तथा ॥ ॐ कामेश्वरविलासिन्यै नमः ॥ कामेश्वरतप सिद्धि । कामेश्वरस्य तप जगदालोचना त्मकम, सिध्यत्यनयेति सिद्धि, तपस साधनभूतेत्यर्थ । स्त्रीपुरुषात्मना कल्पितभेदवशात जगत्सर्जनसाधनभूतत्यर्थ ॥ ॐ कामेश्वरतप सिद्धयै नमः ॥ कामेश्वरमन प्रिया । मनस प्रिया तथा, निरवधिक - प्रेमास्पदत्यर्थ ॥ ॐ कामेश्वरमन' प्रियायै नम ॥ कामेश्वरप्राणनाथा कामेश्वरविमोहिनी । कामेश्वरब्रह्मविद्या कामेश्वरगृहेश्वरी ॥ athaप्राणनाथा । कामेश्वरस्य प्राण हिरण्यगभ त नाथयति पालयतीति तथा । कामेश्वर प्राणनाथो वल्लभो यस्या सेति वा तथा ॥ ॐ कामेश्वरप्राणनाथायै नमः ॥ कामेश्वरविमोहिनी । विमोहयति स्वय भिन्नविग्रहवती ललितात्रिशतीभाष्यम् । --- २६९ सती आवा दपती - इति द्विप्रकारकज्ञानवन्त करोतीति सा तथा । अभेदज्ञानवत तद्विपरीतज्ञानवत्त्व मोह तत्करोती ति सा तथा । अथवा, मोहो नाम बुद्धेरेकालम्बनतया तद- न्याविषयकत्वम् परमेश्वरस्य स्वस्वरूपपरदेवतापरमानन्द साक्षात्कारेण स्थाणुवन्निश्चलतया उपचारेण मोहवत्तया तदि तरप्रपञ्चाकारकृत्याद्याश्रयतादर्शनेन मोहयतीत्युपचारनाम । मोतीत्यर्थ । अन्त पुरगत राजान स्त्रियासक्तमितिव दित्यर्थ ॥ ॐ कामेश्वरविमोहिन्यै नम ॥ कामश्वरब्रह्मविद्या । कामेश्वरस्य तत्त्वपदार्थसाक्षात्कार भूतेत्यर्थ, 'य साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' इति श्रुते ॥ कामेश्वरब्रह्मविद्यायै नम ॥ कामेश्वरगृहेश्वरी । गृह्यत इति ग्रह सर्वज्ञानम् तस्य ईश्व री विषयाधिष्ठानभूतत्वेन नियामिकेत्यर्थ । अथवा, 'गृहिणी गृहमुच्यते ' इति न्यायात् कामेश्वर गृहेश्वर स्वस्था अ धिपति अस्या अस्तीति सा तथा ॥ कामेश्वरगृहेश्वर्यै नम ॥ कामेश्वराह्लादकरी कामेश्वर महेश्वरी । कामेश्वरी कामकोटिनिलया काङ्क्षितार्थदा ॥ कामेश्वराह्रादकरी । आह्लाद तृप्तिजन्यसुख परमेश्वरस्य २७० ललितात्रिशतीभाष्यम् । नित्यतृप्तत्वरूपा शक्ति, परदेवतात्मकतया त करोतीति तथा ॥ ॐ कामेश्वराह्लादकयै नम ॥ कामश्वर महेश्वरी । महती च मा इश्वरी निरुपाधिकैश्व र्यवती, ' महाप्रभुर्वै पुरुष ' इति श्रुते । कामेश्वरम्य मह दैश्वर्यम् अस्या अस्तीति तथा, भगवतीत्यर्थ I 'ऐश्वर्यस्य समस्य वीर्यस्य यशस श्रिय । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णा भग इतीरणा ' तमीश्वराणा परम महेश्वरम' इति श्रुते ॥ ॐ कामेश्वरमहेश्वर्यै नमः ॥ कामेश्वरी । मन्मथापासितकादिविद्यारूपेत्यर्थ ॥ ॐ कामेश्वर्यै नमः ॥ कामकोटिनिलया । षण्णवतिपीठेषु मध्य कामकाटि श्रीचक्रमित्यर्थ । निलय गृह यस्या सा तथा ॥ ॐ का- मकोटिनिलयायै नम' ॥ ' काङ्क्षितार्थदा काङ्क्षितान् काङ्क्षाविषयीभूतान प्राप्तम जातीयेच्छा काङ्क्षा, तगोचरान् पदार्थान ददातीति तथा काङ्क्षिता सती उपास्यदेवता मे प्रसन्ना भूयादितीच्छया चिरकालोपासिता सती पुरुषार्थान अप्रार्थयमानस्यापि स्वयमेव ददातीत्यर्थ ॥ ॐ काङ्क्षितार्थदायै नमः ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २७१ लकारिणी लब्धरूपा लब्धधीर्लब्धवान्छिता । लब्धपापमनोदूरा लब्धाहकार दुर्गमा ॥ लकारिणी तृतीयखण्डतृतीयवर्णत्वेन वाचकतया अस्था अस्तीति सा तथा ॥ ॐ लकारिण्यै नम ॥ ' लब्धरूपा । रूप्यते ज्ञाप्यत एभिरिति रूपाणि लक्षणा न स्वरूपतटस्थभेदेन सगुणनिर्गुणपराणि, लब्धानि यया सा तथा । रूप्यते ज्ञाप्यत इति रूपम् अर्थ उपलक्षण नाम्नो sपि, लब्धे नामरूपे यया सा तथा । आदौ स्वय मायोपा धिना शब्दार्थभावमापद्य पश्चात् व्याकरणमकरोदिति भा व ॥ ॐ लब्धरूपायै नमः ॥ लब्धधी । निश्चयात्मिका सविकल्पनामका अन्त कर णवृत्तयो धिय, ता उपाधित्वेन प्रतिबिम्बाधिष्ठानत्वेन लब्धा यया सा तथा । वृत्त्यारूढ चैतन्य ज्ञानमिति वा, चैतन्य - व्याप्ता वृत्तिर्वेति वेदान्तसिद्धान्त । जडाना विषयाणा ग्रहणे तादृशीना वृत्तीना असामर्थ्ये जगदान्ध्यप्रसङ्गेन स्वरूपचै नन्यमन्त करणाद्युपहित फलचैतन्यतया प्रकाशयति । तथा च 'ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिरिहेष्यते ' इति न्यायेन लब्धा धी तस्वमस्यादिमहावाक्यश्रवणजन्यवृत्तिव्याप्तिर्यया २७५ ललितात्रिशतीभाष्यम् । सत्यर्थ । अथवा, धी शब्दन सर्वज्ञत्यादिकमुन्यते, तत् लब्धययेति वा, ' य सर्वज्ञ सर्वविन' इति श्रुत ॥ ॐ Mosधिये नम ॥ लब्धवाञ्छिता । वाञ्छाया विषयीभूत वाञ्छितम् इष्टफ लमित्यर्थ । लब्ध पूर्वमव प्राप्त तद्ययेति तथा । आप्तकामेति यावन् ॥ ॐ लब्धवाञ्छितायै नमः ॥ , लब्धपापमनोदूरा । पापप्रधानानि च तानि मनासि च पापमनासि लब्धानि पापमनासि यैस्ते सदा पापचिन्तका इत्यर्थ । तषा दूरा अवेद्येत्यर्थ 'अन्यत्र धर्मादन्यत्राध मदन्यत्रास्मात्कृताकृतात् इति श्रुते । ' तमेत वेदानुवच नेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति ' इति श्रुत्या विहिताना तत्तद्वर्णा- श्रमधर्माणामीश्वरार्पणबुद्ध्या क्रियमाणानामात्मज्ञानमाधन तया श्रूयमाणत्वात् तदन्येषा दु खप्राप्तिसाधनत्वेन पापवा सनाप्रधानत्वेन दुरधिगमेत्यर्थ ॥ ॐ लब्धपापमनोदू रायै नमः ॥ लब्धाहकार दुर्गमा । अहकारोऽभिमान उपलक्षण त त्कार्याणामासुरसपत्तिविशेषाणाम् । लब्ध अहकार राजस तामसात्मक यैस्त दु खेनाप्यधिकप्रयत्नेन क्रियमाणसाध नकलापेन अधिगन्तु ज्ञातुमशक्या । सत्त्वगुणाभावे देहे ललितात्रिशतीभाष्यम् । २७३ न्द्रियादौ सुखप्रकाशाव्याप्तौ मन स्थैर्याभावेन रजस प्रवर्त कस्य विक्षेपकस्य तमसश्चावरणप्रधानस्य विवेकज्ञानप्रतिब न्धकस्य निद्रालस्यादिसमुद्भवस्य कार्येण जामित्वादिरूपेण श्रेयो मागसाधनानुष्ठाने गुरुवेदयो श्रद्धाक्षये बाह्यविषयस पादनव्यग्र मनसि लाभालाभहेतुकहर्षशोकजन्य रागद्वेषपर तन्त्रे अनात्मज्ञासुरसपत्तिमता चित्ते न भातीत्याशय प्रत्युत जननमरणप्रवाहरूपससारमेवानुभवन्ति, 'तानह द्विषत क्रूरान्' इति भगवद्वचनात् । अतो निरभिमानपुरु पेण स्वाभीष्टलाभाय चित्त सदा चिन्तनीयेत्यर्थ शुद्धसत्त्वा ' इत्यादिप्रमाणेभ्य इति द्रष्टव्यम् ॥ ॐ लब्धा इकारदुर्गमायै नम ॥ ' यतय लब्धशक्तिर्लब्धदेहा लब्धैश्वर्यसमुन्नति । लब्धवृद्धिर्लब्धलीला लब्धयौवनशालिनी ॥ लब्धशक्ति । लब्धा शक्ति सकलसामर्थ्यहेतुभूता मा यात्मिका यया सा तथा, ' ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्ति स्वगुणैर्निगूढाम्' इति श्रुते ॥ ॐ लब्धश क्त्यै नमः ॥ लब्धदेहा । लब्ध देह विग्रह यया सा तथा । स्वे 8 U VII 18 २७४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । च्छावलम्बितमूर्ति घृतकाठिन्यन्यायेन जीवत्वाभावेन कर्मा धीनत्वाभावात् । तथा च मति अध्यस्तमायाशक्ते भेदक त्वस्वाभाव्य 'पतिश्च पत्नी चाभवताम्' इति श्रुत्या च दपतिमूर्तिमती बभूवेत्यभिप्राय ॥ ॐ लब्धदेहायै नमः ॥ लब्धैश्वयसमुन्नति । ऐश्वर्याणा समुन्नति आधिक्य प raarafac लब्धा ऐश्वर्यसमुन्नति यया सा तथा, ' तमीश्वराणा परम महश्वरम्' इति श्रते 'नान्तोऽस्ति मम दिव्याना विभूतीना परतप' इति स्मृतेश्च । ' सर्वे श्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनि सर्वस्य' इति श्रुतौ निरुपाधिक महदैश्वर्यसपत्ते तदुपासकानामगस्त्यादि महर्षीणा दर्शनात् तदीयमहदैश्वर्यस्य निरवधिकत्वमिति किमु वक्तव्यमिति ज्ञायते इत्यभिप्राय ॥ ॐ लब्धैश्वर्य- समुन्नत्यै नमः ॥ , लब्धवृद्धि । बृद्धिर्नाम व्याप्ति परिपूर्णतेत्यथ अव यवोपचयात्मका न, तस्या कर्मजन्यत्वेन विनाशहेतुत्वात्, ' स वा एष महानज आत्मा न वर्धते कमणा' इति श्रुतिवचनात् 'निष्क्रिय निष्कलम्' इति अवयवमावनि बेघाश्च तथा च लब्धा वृद्धि सर्वव्यापकता स्वस्वरूपैव सती उपाधिभिर्जन्यैस्तदाश्रयभूतै अभिव्यज्यत । न , ललितात्रिशतीभाष्यम् । २७५ त्वविद्यमानारोपिता इति निष्कर्षार्थ ॥ ॐ लब्धवृद्धयै नम ॥ लब्धलीला । लीला अन्य प्रयोजनार्थव्यापारा स्वहर्ष मात्रका वा तत्तत्कालोचितशृङ्गारादिनवरसाङ्गीकारसमये तदुचितभङ्गीविशेषा वा लब्धा यया सा तथा ॥ ॐ लब्ध लीलायै नम' ॥ लब्धयौवनशालिनी । अस्तित्वजननवर्धनभावविकारा वस्था बाल्यम, परिणाम अपक्षयो नाश उत्तरावस्था जरा, दहाभावेन तदुभयनिषेधे अर्थाद्यौवनम् यौति गच्छतीति युवा दृढबलवीर्य, तस्य भाव यौवन तदुभ यवयोऽवस्थाराहित्येनैकस्वरूपता, तल्लब्ध प्राप्त यौवन यथा सा तथा, ' अजरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म' इति श्रुते सर्वदा एकप्रकारस्वरूपवतीति भाव ॥ ॐ लब्धयौवनशालिन्यै नमः ॥ लब्धातिशय सर्वाङ्गसौन्दर्या लब्धविभ्रमा । लब्धरागा लब्धपतिर्लब्धनानागमस्थितिः ॥ लब्धातिशय सर्वाङ्ग सौन्दर्या । सुन्दरो रुचिर तस्य भाव सौन्दर्यम अवयवाना सर्वेषा सौन्दर्यमतिशायि सर्वाङ्गेषु सर्वावयवेषु लब्ध यया सा तथा, Preranaar " २७६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । वयवविन्यासविशेषत्वन सर्वमनाहरमूर्तिवतीत्यर्थ ' न ' तम्य प्रतिमास्ति' इति श्रुत ॥ ॐ लब्धातिशयसर्वाङ्गसौ न्दर्यायै नम ॥ morant । विभ्रमो बालक्रीडा लब्धा यया सा तथा, सर्वात्मकतया सर्वकर्तृत्वादिति भाव ॥ ॐ लब्ध विभ्रमायै नमः ॥ लब्धरागा । लब्ध सजातीयो राग काम, 'मोडका - मयत' इति श्रुत्या जगत्सर्जनस्य कामनापूर्वकत्वप्रतिपाद नात्, लब्धो रागो यया मा तथा इत्यर्थ ॥ ॐ लब्धरा गायै नमः ॥ लब्धपति । लब्ध स्वेच्छयैव स्वयंवरे पति कामेश्वरो यया सा तथा ॥ ॐ लब्धपतये नमः ॥ लब्धनानागमथिति । आ समतात नानाप्रकारे कर्मों पासनाज्ञानकाण्डतदङ्गत्वादिभि गमयन्ति स्वार्थान् प्रका शयन्तीत्यागमा वेदा नाना अनेकशाखाप्रभिन्न सामादय तेषा स्थिति परिपालन लब्धा यया सा तथा । नाना गमस्थिति वेदचतुष्टयोक्तमर्यादा काण्डप्रयविषया लब्धा यया सेति वा । ससारस्थानादित्वेन निरपेक्षप्रमाणभूतान् वेदान् 'सर्वे वदा यतैक भवन्ति' इति श्रुते स्वस्वरूपभूतान् ललितात्रिशतीभाष्यम् । २७७ महाप्रलये सरक्ष्य सर्गादौ जायमानहिरण्यगर्भस्यान्यूनानति रेकेण तानेव प्रतिभासयति स्वय दपती भूत्वा तदुक्तधर्मा ननुष्ठाय परेषामप्यनुष्ठापयतीति च । 'वेदशास्त्रे ममेवाज्ञे वर्त एव च कर्मणि । यदि ह्यह न वर्तेय जातु कर्मण्यतन्द्रि त । उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्या कर्म चेदहम ' इत्यादि भगवद्वचनादिति द्रष्टव्यम् ॥ ॐ लब्धनानागमस्थित्यै नमः ॥ लब्धभोगा लब्धसुखा लब्धहर्षाभिपूजिता । ह्रींकारमूर्तिकार सौधशृङ्गकपोतिका ॥ ५४ ॥ लब्धभोगा । भोग सुखमात्रानुभव दु खानुभने उन्य माने जीवाविशेषप्रसङ्गात् । लब्ध भोग यया सा तथा । जीववत क्रमिकरवेष्टपदार्थानुभवानन्तरकालीन सुख न भव ति, स्वस्था आनन्दरूपत्वेन सिद्धस्वरूपत्वात् साधनभूत- भोगोऽप्येतद्विषये सिद्ध इत्युपचर्यते इति लब्धभोगेत्सु sad ॥ ॐ लब्धभोगायै नमः ॥ ', , ॐ लब्धसु लब्धसुखा । लब्ध सुख अनुकूलवेदनीय स्वस्वरूप भूत सुख तत्माधन च धर्म यया सा तथा ॥ स्वायै नमः ॥ २७८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । , लब्धषाभिपूरिता । लब्ध या हर्ष तृप्तिनिमित्तकचि सोल्लासविशेष मुखप्रसादशरीरपुष्टयादिकार्योत्रेय जगत्या स्वाभीष्टपदार्थानुभवादिजन्य सतोष इति प्रसिद्ध तेनाभि पूरिता अभित समन्तादन्यूनानतिरेकेणाविच्छिन्नरूपतया पूरिता भरिता । तद्विपरीतदु खाद्यनुत्पादेन तन्मात्रसमाश्रया नित्यप्रसन्नमुखीत्यर्थ ॥ ॐ लब्धहर्षाभिपूरितायै नमः ॥ ह्रींकारमूर्ति । वाच्यवाचकता भेदसबन्धेन ह्रींकार मूर्ति विप्रहो यस्या सा तथा ॥ ॐ ह्रीकारमूर्त्यै नमः ॥ ' 1 । ह्रींकार सौ शृङ्गकपतिका । सुधामय मौधम सुधा- विकार अट्टालिकेत्यर्थ तस्य शृङ्ग शिखर चन्द्रशालादि- भिक्युपरिभाग, निरुपाधिकविश्रान्तिजन्य सुखानुभवहेतु तया ह्रींकारस्य सौधोपमा, तत्र हकारस्य वेतवर्णतया अट्टालिकसादृश्यम रेफस्य लोहितरूपतया इष्टकादिकृता घोभिस्युपमा, इकारोपरि ईकारस्य शृङ्गोपमा, ऊर्ध्वगत्व- साम्यात्, तदुपरितन बिन्दु सर्वप्रकात भूतशब्दार्थात्मक- तया तदवयवत्वेन विचित्रस्वरूपोऽपि सूक्ष्मतया अपवरक- ravinardव जागरूक दृश्यत इति तदर्थत्वेन परद तोपमानशब्देनाभिधीयत इति भाव ॥ ॐ ह्रींकारसौष- शृङ्गकपोतिकायै नमः ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २७९ ह्रींकारदुग्धाब्धिसुधा ह्रींकार कमलेन्दिरा । ह्रींकारमणिदीपार्चिकारतरुशारिका ॥ ह्रींकारदुग्धाब्धिसुधा । दोहान्निष्पन्न दुग्धम् । स्तनग तस्य पयस स्वीयतापादनहस्तक्रियाविशेषो दोह । उपल क्षण चोषणादीनाम्, तथा च प्रदीपालकार सिद्ध, अनन्तो दकप्रसारित निम्नभूप्रदेश अब्धिरुच्यते । आप धीयते अस्मिन्निति तथा । तस्मिन् मजीवकत्व धर्म । डिम्भक सजीवने स्तन्यादौ दर्शनात् । ड्रींकारस्यापि हकारयुक्ततया श्वेतवर्णत्वादमृतहेतोच तत्सादृश्यम् । तस्य सुधेव सुधा तदभिव्यक्तत्वाविशेषात्तत्सेवकाना नित्यत्वे सति बहुविधम हिमशालितया दर्शनादिति भाव ॥ ॐ ह्रींकारदुग्धाब्धि सुधायै नमः ॥ ह्रींकारकमलेन्दिरा । ह्रींकारबीजस्य विचित्रवर्णतया पर मप्रीतिविषयतया च कमलोपमा । तम्य वाच्यार्थतया तदु परितनत्वेन सर्वपुरुषार्थ प्रदातृत्वाश्च कमलशब्देनाभिधीयते । तस्था पद्मालयत्वात् ह्रींकारकमलस्य इन्दिरा तदधीनब्रह्म- विद्येत्यर्थ ॥ ॐ ह्रींकारकमलेन्दिरायै नमः ॥ कारमणिदीपार्चि । आधिदैविकाद्युपद्रवानभिभूतवे ૨૮૦ ललितात्रिशतीभाष्यम् । सति चिरकालावस्थायित्व मणिदीप सादृश्यम ह्रींकारस्य । तस्य प्रकाश अनितरसाधारणमहातिशयवत्त्वेन अनर्घत्व मावेदयति । तदुपासकस्य निरवधिक महत्त्वापादकहींकार वाक्यतया तत्प्रकाशकेत्यर्थ । तथा च निरन्तरनमोsपाकर णेन स्वष्टपदार्थापादनेन च सुखयतीति फलितोऽर्थ ॥ ॐ ह्रींकारमणिदीपार्चिषे नम ॥ ह्रींकारतरुशारिका । तारयति फलार्थिन स्वारूढान् पतनादे रक्षतीति तरु, तस्य शारिका पिङ्गतुण्डनेत्रचरणा शारिका अभ्यासातिशयेन मनुष्य भाषायामपि भाषते । भूतभविष्यद्वर्तमानलोकयात्रापरिज्ञात्री सती शुभाशुभफल प्राप्तिं च स्वभाषया वदति । अस्य बीजस्य वाक्यार्थतया तसबन्धिनी सती वेदवाचा सर्वे प्रकाशयतीत्यर्थ ॥ ॐ ह्रींकारतरुशारिकायै नमः ॥ ह्रींकारपेटकमणिर्हीकारादर्शबिम्बिता । ह्रींकारकोशासिलता कारास्थाननर्तकी ॥ A A ह्रींकारपेटकमणि । गूहनसाधनतया ह्रींकार पेटकेन दृष्टान्तीक्रियते । तस्य मणि वैडूर्यमित्यर्थ । यथा हीरा दिमणि पेटकादौ गापितोऽपि स्वकान्त्या बाह्याभ्यन्तर तस्य ललितात्रिशतीभाष्यम् । २८१ प्रकाशयन्नितर पेटकेभ्य त व्यावर्तयति, तथेदमपि बीज स्ववाचकतयेतरवर्णेभ्य निरतिशय महिम्ना भेदयतीति भाव ॥ ॐ ह्रींकारपेटकमणये नमः ॥ ह्रींकारादर्श बिम्बिता । अस्य बीजस्य इतरप्रमाणानपेक्ष वेदान्तर्गततया निर्दोषत्वादादशसाम्यम् । तस्मिन् बिम्बिता प्रतिबिम्बिता, मायाप्रतिबिम्बचैतन्यस्यैव जगत्कारणतया सर्वत्र दर्पणे मुखमिव प्रतिफलतीति तात्पर्यार्थ ॥ कादर्श बिम्बितायै नमः ॥ ह्रींकारकोशासिलता । ह्रींकार एव कोश तस्यासिलता अतिदीर्घखङ्गमित्यथ । सर्ववैर्यादिजन्यदु खरिवर्तकत्वमसि लताया इव परदेवताया अपि । तथात्नेन बहि प्रकटनायो ग्यतामादृश्येन आच्छादकापेक्षया होकारस्य वाचकशब्द तया अर्थावारकत्वौपम्यादसिकोशतुल्यता । तथा च ह्रींकार काशे विद्यमाना असिलतेव दु खनिवारकत्वे सति भक्ताभय करीति भाव । सर्वेषामायुधविशेषाणाम् असिपदमुपलक्ष णम् । 'महद्भय वज्रमुद्यतम्' ' भीषास्माद्वात पवते' इत्या दिश्रुते ॥ ॐ ह्रींकारकोशासिलतायै नमः ॥ ," का स्थान तकी । ह्रींकार एव आस्थान सभामण्डप सर्वाश्रयत्वान् । तस्य नतकी नटनसबन्धभूसयोगचरणवि २८२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । न्यासोपलक्षिततालानुसारिहस्ताद्यङ्गचेष्टा नर्तनम्, तत्कर्त्री नर्तकी । ह्रींकारवाच्यार्थतया मायादिसबन्धासबन्धनिमित्त कविचित्रतरकार्योत्पादनव्यापारानुकारविकार्य विकारिस्वरूप वत्तया द्रष्टृलोकमनोवृत्तिभेदेन तीव्रमन्दमन्दनरप्रीतिरूपभ क्तिविषयतयाभिव्यक्तानभिव्यक्तेष्टफलसाधनतया स्वकीयपु- व्यादितारतम्येन बुद्धिशुद्धिभेदात्प्रतिभातीत्यर्थ ॥ ॐ ह्रीं कारास्थाननर्तक्यै नम ॥ ह्रींकारशुक्तिकामुक्तामणिह्रींकार बाधिता । हाँकारमय सौवर्णस्तम्भविद्रुमपुत्रिका ॥ माना- - कारशुक्तिकामुक्तामणि । ह्रींकार एव शुक्तिका नील पृष्ठत्रिकोणाकारा, तस्या मुक्तिकेव मुक्ताफलाभवाभिव्यज्य- यथा स्वाती महानक्षत्र सर्वदेशेषु मघसघात्पतज्जल बिन्दु शुक्तिकान्त पतित समुद्रदेशविशेषे मुक्ताकारेण परिणमते, तथा सत्त्वरजस्तमो गुणात्मकही बीजावच्छेदेन म नोहरवाचामगोचरसुन्दरतर परदेवतामूर्त्या सर्वगतमपि चै- तन्य विशिष्याभिव्यज्यते । तथा च मौक्तिकार्थिना शुक्त्यु पादानवत् परदेवता साक्षात्कारेप्सूना ह्रींकारोपादानमाव श्यकमिति भाव ॥ ॐ ह्रीँकारशुक्तिकामुक्तामणये नमः ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २८३ ' ह्रींकारबोधिता । सिद्धे पदार्थे इन्द्रियादिसबन्धे सति स्वत एव ज्ञानोत्पत्तिदर्शनान ज्ञाने विधिरपेक्षित, क्रियाफ- लत्वाभावात् । तर्हि नित्यापरोक्षधर्मादिज्ञानवत् शुद्धब्रह्मा- भेद वेदैकदेशह्रींकारेणैव बोध्यते, अज्ञातज्ञापकत्वेन वदस्य स्वत प्रामाण्याम्युपगमात् परचैतन्यस्य च ज्ञायमानस्य परमानन्दरूपतया पुरुषार्थरूपत्वात् । अत ह्रींकारेणैव मू लमन्त्रात्मना बोधिता ज्ञापिता । हकाररेफेकाराणा व्यस्तत्व दशाया भिन्नभिन्नार्थकाना मेलने ह्रींकारात्मना परिणामे सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीत्रिपुरसुन्दर्या तदर्थत्वेन अद्वैतस्वरूप तथा प्रतिभानात् । ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' ' इद सर्व यदयमात्मा' ' एक एव तु भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थित । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्' इत्यादिश्रुते । 'आत्मा वा अरे दृष्टव्य ' तद्विजिज्ञासस्व' ' आत्मान पश्येत्' इत्यादिलिङ्लोट्तव्यप्रत्ययानामईतार्थकतया न वि धित्वमिति सिद्धान्त । ॐ ह्रींकारबोधितायै नमः ॥ ' ' ह्रींकारमयसौवर्णस्तम्भविद्रुमपुत्रिका । पिङ्गलपृथ्वीरेणु सुवर्णमित्युच्यते । अनुच्छिद्यमान द्रवत्वस्य नैमित्तिकत्वेऽपि तैजसान्तर प्रदीपप्रभादावदर्शनात् । पदार्थान्तरसयोगे रज तादिवदतितेज संयोगात् भस्मभावापत्तेश्च हीरमणौ लोहले २८४ ललितात्रिशतीभाष्यम । ख्यत्वाभाववत्त्वेऽपि पार्थिवत्ववदत्र पार्थिवत्वे बाधाभावात । द्रवत्वस्यादकस्वभावत्वन तत्कायपृथिव्यामपि उपलम्भोपप त्तेश्व । तद्विकार, सौवणश्चासौ स्तम्भश्च । सौवर्णस्तम्भम्य नवरत्नमण्डपभारवाहित्वे सति तदभिन्नत्वेन तदलकार भूतत्व स्येव साधर्म्यस्य ह्रींकारेऽपि जगदाश्रयत्वे मति तत्कारणत्वे सति तदन्तर्भूतत्वे सति परमानन्द जनकत्वम्य सत्वेन ह्रींका रमय इत्यभेदोपचार प्रदीपालकारद्योतनार्थ इति ज्ञातव्यम् । कारे उपमेये मयाब्देनोपमानाभेदकल्पनात । तस्मिन्वि चित्रपप्रधानरूपे तत्सबन्धितया विद्रुमपुत्रिकेव प्रतीय माना विद्रुमन प्रवालन कृता पुत्रिका सालभञ्जिका । मौव र्णस्तम्भशब्द उपलक्षण भित्यादीनाम, प्रायस्त्वदर्शनात् तदु पादान स्वत मनोज्ञस्य स्तम्भस्यातिशयदर्शनीयतायै । दुर्ल भतरप्रवालपुत्रिका स्तम्भमण्टप तत्स्वामिन तद्दश च प्रकृ ष्टीकरोति तथा श्रीपरदेवतापि रूढ्यैतद्बीजाथतया तदव च्छिन्नासती तदादीन सर्वान भूषयति सफलीकरातीत्यथ ॥ ॐ ह्रींकारमयसौवर्णस्तम्भविद्रुमपुत्रिकायै नमः ॥ ह्रींकारवेदोपनिषद्धींकाराध्वरदक्षिणा । ह्रींकारनन्दनारामनवकल्पकवल्लरी ॥ ८७ ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । ' २८५ ह्रींकारवेदोपनिषत् । द्यन्ते ज्ञायन्ते सर्वे पदार्था अनेनेति वेद । जात्येकवचनम् । ह्रींकार एव वद । ज्ञापकत्वाविशेषात । तस्य उपनिषद्वेदान्तभाग लक्ष्यार्थो वा, तत् ब्रह्मोपनिषत्परमिति श्रुत । कर्मोपासनाज्ञानका- ण्डभेदेन चत्वाराsपि वेदा विप्रकारा । ' तमेत वदानुव चनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति' इति वाक्येन ज्ञानसाधनतया कर्मोपासनयो विनियुक्तत्वात्, अन्धतम प्रविशन्ति ये विद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विधाया रता ' इति श्रुत्या तदुभयो ससारफलकत्वेन निन्दितत्वाच्च, 'आत्मान चेद्विजानीयादयमस्मीति पुरुष । किमिच्छन् क स्य कामाय शरीरमनुसज्वरेत ' आत्मकाम आप्तकाम इत्यादिश्रुतिभ्य अद्वैतज्ञानोत्पादक वेद भागस्योपनिषच्छब्द वान्यस्य मोक्षफलकत्वेन फलप्रतिपादनात्तदुभयप्रतिपादक , भागापेक्षा श्रेष्ठत्वम्, लाके साधनापेक्षया फलस्य श्रेष्ठत्व नात्तमत्वप्रसिद्धे । तथा च पूर्वकाण्डद्वयार्थस्य जन्यतया तत्प्रतिपादकवेदभागस्योपनिषन्छेषत्ववत् ह्रींकारस्यापि पर- देवता प्रकाशकत्वेन तच्छेषत्वात्तस्या प्राधान्यमुक्तमिति द्रष्ट व्यम् । वेदान्तेषूपनिषच्छ तज्जन्यतारूपशक्यसबन्धेन प्र वर्तते । मुख्यया वृत्त्या तु ब्रह्मविद्यायामेव । तथा हि-उप २८६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । शब्द समीपदेशार्थक । ब्रह्मण्यभ्यस्तमायासमीपदेशक तत्पदार्थ प्रतिबिम्बितम विद्योपाधिकचैतन्य जीवशब्दवान्यमुप शब्दार्थ लक्षणया प्रतिपायते । नि शब्द षद् इति पदस्य विशेषणम् । सत इति पद मदनगत्यवसादनेषु भवति । तथा च उपशब्दवाच्यो जीव अविद्या निहत्य त्यक्त्वा ब्रह्मस्वरूपेण निषीदति वर्तत इति उपनिषदित्ये कोऽर्थ । जीव ब्रह्म स्वरूपत्वेन निगच्छति जानातीत्यन्योऽर्थ । जी- व ब्रह्मस्वरूपेण अवसीदति परिसमाप्नोतीति तृतीयोऽथ । एवमुपनिषच्छन्दस्य ब्रह्मविद्यावाचकत्वेन प्रसिद्धस्य तद्वाच कवेदभागे लक्षणवत्त्वेऽप्युपनिषत्छब्दवाच्यो भवति । तथा च ह्रींकार एव वेद तस्य उपनिषत्प्रधानभूता ब्रह्मविद्ये त्यर्थ । ॐ ह्रींकारवेदोपनिषदे नम ॥ ह्रींकाराध्वरदक्षिणा । ह्रींकार एव अध्वर यज्ञ तस्य दक्षिणा समाप्तिसाधनम्, दक्षिणाया दत्ताया यज्ञसमाप्ति दर्शनात् । ह्रींकारस्यापि जप यजनात्मकतया अध्वान राति गच्छतीत्यध्वर मार्गसाधक इत्यर्थ । दक्षिणापद फलवाचि ऋत्विग्व्यापाराणा दक्षिणाफलत्वदर्शनात् । ह्रीं काराध्वरस्य ह्रींकारजपयज्ञस्य दक्षिणा फलसाधनी भूतपुरु पार्थरूपा । अथवा ह्रींकाराध्वरस्य दक्षिणा पत्नी, 'मखस्य ललितात्रिशतीभाष्यम् । २८७ I दक्षिणा पत्नी ' इति वचनात् । ' ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट स्या मिति मे मति ' इति भगवद्वचनात् । ह्रींकारलक्ष्यार्थज्ञान- मेव ह्रींकाराध्वर ह्रींकारज्ञानयज्ञ, 'प्रधान दक्षिणा मखे ' इति वचनात् दक्षिणावत् फलभूतत्वेन प्रधानभूतेति वा । दे वतोद्देशेन द्रव्यत्यागो याग इत्युच्यते । त्यक्तद्रव्यस्य अग्नौ प्रक्षेपा होम । ऋत्विगुद्देशन वद्यामथविभागो दक्षिणा । अ- र्थिभ्य वेदिबहिर्देशेऽर्थविभागो दानमिति तेषा भेद ॥ ॐ siकाराध्वरदक्षिणायै नमः ॥ I ह्रींकारनन्दनारामनवकल्पकवल्लरी । नन्दयत्यानन्दयती ति नन्दन स चासौ आरामश्च तथा । देवेन्द्रोद्यान विचि त्रस्वरूपतया विजातीयार्थकत्वात् । ह्रींकार एव नन्दना राम सुखकर्तृबिश्रामभूमि तस्य नवा नूतना अतिकोमले त्यर्थ । कल्पयतीति कल्पका कल्पका च सा वल्लरी चेति तथा । देवोद्याने विद्यमानाना वृक्षगुल्मलतातृणादीनाम् तल्लोकातिशायिपुष्पफलादिमत्त्वेऽपि न सर्वोत्तमताप्रसि- द्धि । कल्पवल्ल्यास्तु यथाकर्म यथासेवमुपासकना सर्वा- र्थप्रदानशक्तिमत्त्वेन सर्वोत्कृष्टता । तथा ब्रह्मविष्णुरुद्राणा तद्वाचकवर्णभेदानाम् अन्योन्यसबन्धतया एकत्र प्रतीयमा नत्वेन चिरजीवित्वफलादिप्रदानेन आनन्दकतया ससारता २८८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । पशामकत्वेन च ह्रींकारस्य नन्नापमा । तत्र सर्वाथप्रदा तृत्वेन कामेश्वरालिङ्गितकोमलतर सुन्दरमूत्या विशिष्टपुरुषा चतुष्टय कल्पनन सगुण निर्गुणोपासकाना तद्दवतात्मना प्रा धान्येन समष्टिरूपतया सादृश्येन नवकल्पकवल्लरीत्युच्यत इति भाव ॥ ॐ ह्रीकारनन्दना रामनवकल्पकवल्लयै नम ॥ ह्रींकार हिमवद्गङ्गा ह्रींकारार्णवकौस्तुभा । ह्रींकारमन्त्रसर्वस्वा ह्रींकारपर सौख्यदा ॥ ह्रींकार हिमवद्गङ्गा । हिमान्यस्मिन् सन्तीति हिमवान् शीतलपर्वतराज । ह्रींकारस्य अमृतादिसाधकतया शीत उता बोध्या । तस्माद्गङ्गेव पावनी सर्वपुरुषार्थप्रदा मन्त्रदवतात्मनाभिव्यक्तेत्यर्थ ॥ॐ ह्रींकार हिमवद्गङ्गायै नमः ॥ ह्रींकारार्णवकौस्तुभा । कौस्तुभ क्षीराब्धिजन्मसु चतु देशरत्नेषु यथा श्रेष्ठ सर्वाधिक प्रकाशादिगुणतया, तथा पर देवतापि अपार महिमापरिच्छिन्नह्रींकारमन्त्रवेद्यत्वेन तन्नि पन्ना सती ' अत्राय पुरुष स्वय ज्योति ' इति श्रुते स्वय प्रकाशतया विद्योतत इत्यर्थ । अत्र कौस्तुभहृदयस्य लक्ष्मी ललितात्रिशतीभाष्यम् । २८९ पतित्वसर्वदेवोत्तमत्व सकलसुन्दरतमत्वगुणा इव विष्णो ह्रीं कारार्णवविद्योतमानहींकारदेवतोपासकस्यापि नारायणाभेदेन श्रीकान्तत्वादिधर्मा स्वत एव सिध्यन्तीति कौस्तुभपदन व नितमिति द्रष्टव्यम् ॥ ॐ ह्रींकारार्णवकौस्तुभायै नम ॥ ह्रींकारमन्त्रसर्वस्वा । सर्वाणि च तानि स्वानि च धना नि अणिमाद्यष्टैश्वर्यजनकत्वादीनि तानि तथा । ह्रींकारघटि ता ह्रींकारो वा तेषा सर्वस्वा सकलसपत् सर्वार्थसाधकश क्तिरित्यर्थ ॥ ॐ ह्रीकारमन्त्रसर्वस्वायै नमः ॥ ह्रींकारपरसौख्यदा । ह्रींकारपरा ड्रींकारमन्त्रजपपरा ह्रींकारघटित श्रीविद्याजपपरा वा । तेषा सौख्य चतुर्विधपुरु पार्थप्राप्तिजन्यानन्द तद्ददातीति तथा । ह्रींकाराणा व्यष्टि रूपण वाच्यार्थना त्रिमूर्तीना पर सौख्य सामरस्यसुख एकी भावानन्द ददातीति वार्थ । 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्य छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा । यत्रान्यत्पश्यत्यन्य छृणोत्यम्यद्विजानाति तदल्पम्' ' नाल्पे सुखमस्ति ' इति, ' आनन्द ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन' इति 'यदा ह्यवैष एतस्मिन्नदृश्ये ऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभय प्रतिष्ठा विन्दते । अथ सोऽभय गतो भवति', ' विज्ञानमानन्द ब्रह्म रातिर्दातु परायणम्' इत्यादिबहुश्रुतिभ्य भखण्डसचिदा SU VII 19 २९० ललितात्रिशतीभाष्यम् । नन्दब्रह्मस्वरूपतया सैव फल भवति, अन्यज्ञानादन्यफल प्राप्प्रेरयोगात । 'ब्रह्म वद ब्रह्मैव भवति ' ' तरति शोकमा त्मवित्', 'येन मामुपयान्ति ते । तषामह समुद्धर्ता मृत्यु ससारसागरात' 'ब्रह्मैव सन ब्रह्माप्यति' इत्यादिश्रुतिस्मृ विशतेभ्य स्वस्वरूपप्राप्तरेव पुरुषार्थस्य प्रदातृत्व सिद्धम ॥ ॐ ह्रींकारपरसौख्यदायै नमः ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगव पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छकरभगवत कृतौ श्रीललितात्रिशतीभाष्यम् सपूर्णम् ॥ इत्येव ते मयाख्यात देव्या नामशतत्रयम् । रहस्यातिरहस्यत्वाद्गोपनीय त्वया सुने ॥ शिववर्णानि नामानि श्रीदेव्या कथितानि हि । शक्त्यक्षराणि नामानि कामेशकथितानि च ॥ उभयाक्षरनामानि शुभाभ्या कथितानि वै । तदन्यैग्रथित स्तोत्रमेतस्य सदृश किमु ॥ ३ ॥ नानेन सदृश स्तोत्र श्रीदेवीप्रीतिदायकम् । लोकत्रयेsपि कल्याण सभवेन्नात्र सशय ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । इति हयमुखगीत स्तोत्रराज निशम्य प्रगलितकलुषोऽभूञ्चित्तपर्याप्तिमेत्य । २९१ निजगुरुमथ नत्वा कुम्भजन्मा तदुक्त पुनरधिकरहस्य ज्ञातुमेव जगाद ॥ ५ ॥ अगस्त्य उवाच- अश्वानन महाभाग रहस्यमपि मे वद । शिववर्णानि कान्यत्र शक्तिवर्णानि कानि हि ॥ उभयोरपि वर्णानि कानि वा वद देशिक । इति पृष्ट कुम्भजेन हयग्रीवोऽवदत्पुनः ॥ ७ ॥ तव गोप्य किमस्तीह साक्षादम्यानुशासनात् । इद स्वतिरहस्य ते वक्ष्यामि शृणु कुम्भज ॥ एतद्विज्ञानमात्रेण श्रीविद्या सिद्धिदा भवेत् । कas ear चैव शैवो भागः प्रकीर्तितः ॥ ९ ॥ शक्त्यक्षराणि शेषाणि हींकार उभयात्मकः । एव विभागमज्ञात्वा ये विद्याजपशालिन । २९२ ललितात्रिशतीभाष्यम् । न तेषां सिद्धिदा विद्या कल्पकाटिशतैरपि । चतुर्भेि शिवचकैश्च शक्तिचत्रैश्च पञ्चभि ॥ नवचकैश्च ससिद्ध श्रीचक्र शिवयार्वपु । त्रिकोणमष्टकोण च दशकोणडग तथा ॥ १२ ॥ चतुर्दशार चैतानि शक्तिचक्राणि पश्च च । बिन्दुश्वाष्टदल पद्म पद्म षोडशपत्त्रकम् ॥ १३ ॥ चतुरश्र च चत्वारि शिवचक्राण्यनुक्रमात् । त्रिकोणे बैन्दव श्लिष्ट अष्टारंष्टदलाम्बुजम् ॥ दशारयो षाडशार भूगृह भुवनाश्रके । शैवानामपि शाक्ताना चक्राणा च परस्परम् ॥ अविनाभाव सबन्ध यो जानाति स चक्रवित् । त्रिकोणरूपिणी शक्तिर्बिन्दुरूपपर शिव ॥ अविनाभावसबन्ध तस्माद्विन्दुत्रिकोणयो । एव विभागमज्ञात्वा श्रीचक्र यः समर्चयेत् ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २९३ न तत्फलमवाप्नोति ललिताम्बा न तुष्यति । ये जानन्ति लोकऽस्मिन्श्रीविद्या चक्रवेदिनः ॥ सामान्यवेदिन सर्वे विशेषज्ञोऽतिदुर्लभ' । स्वयविद्याविशेषज्ञो विशेषज्ञ समर्थयेत् ॥ १९ ॥ तस्मै देय ततो ग्राह्यमशक्तस्तस्य दापयेत् । अन्धनम' प्रविशन्ति येऽविद्या ममुपासते । इति श्रुतिरपा हैतानविद्योपासकान्पुन । विद्यान्योपासकानेव निन्दत्यारुणिकी श्रुति० ॥ अश्रुता सश्रुतासश्च यज्वानां येऽप्ययज्वन. । स्वर्यन्तो नापेक्षन्ते इन्द्रमग्निं च ये विदुः ॥ सिकता इव मयन्ति रश्मिभि समुदीरिताः । अस्माल्लोकादमुष्माश्चेत्याह चारण्यकश्रुति' ॥ यस्य नो पश्चिम जन्म यदि वा शकर स्वयम् । तेनैव लभ्यते विद्या श्रीमत्पश्चदशाक्षरी ॥ २१४ ललितात्रिशतीभाष्यम् । इति मन्त्रेषु बहुधा विद्याया महिमोच्यते । माक्षैकहेतुविद्या तु श्रीविद्या नात्र संशय ॥ न शिल्पादिज्ञानयुक्ते विद्वच्छन्द प्रयुज्यते । माक्षैकहेतुविद्या मा श्रीविद्यैव न सशय ॥ तस्माद्विद्याविदेवात्र विद्वान्विद्वानितीर्यते । स्वयं विद्याविंदे दद्यात्ख्यापयत्तद्गुणान्धी ॥ स्वयविद्यारहस्यज्ञी विद्यामाहात्म्यवेद्यपि । विद्याविद नार्चयेत्को वा त पूजयेजन ॥२८॥ प्रसङ्गादिदमुक्त त प्रकृत शृणु कुम्भज । य कीर्तयत्मकृद्भक्त्या दिव्यनामशतत्रयम् ॥ तस्य पुण्यमह वक्ष्ये शृणु त्व कुम्भसभव । रहस्यनाममाहत्रपाठे यत्फलमीरितम् ॥ ३० ॥ तत्फल कोटिगुणितमेकनामजपाद्भवेत् । कामेश्वरीकामेशाभ्या कृत नामशतत्रयम् ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । नान्येन तुलयेदेतत्स्तोत्रेणान्यकृतेन च । २९५ श्रिय परम्परा यस्य भावि वा चोत्तरोत्तरम् ॥ तेनैव लभ्यते चैतत्पश्चाच्छ्रेय परीक्षयेत् । अस्था नाम्ना त्रिशत्यास्तु महिमा केन वर्ण्यते ॥ या स्वय शिवयोर्वक्रपद्माभ्या परिनिःसृता । नित्य षोडशसख्याकान्विप्रानादौ तु भोजयेत् ॥ अभ्यक्तास्तिलतैलेन स्नातानुष्णेन वारिणा । अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यै कामेश्वर्यादिनामभि. ॥ पापूपै शर्करा पायमै फलसयुतै । विद्याविदो विशेषेण भोजयेत्षोडश द्विजान् ॥ एव नित्यार्चन कुर्यादादौ ब्राह्मणभोजनम् । त्रिशतीनामभि. पश्चाद्राह्मणान्क्रमशोऽर्चयेत् ॥ तैलाभ्यङ्गादिक दत्वा विभवे सति भक्तित । शुक्लप्रतिपदारभ्य पौर्णमास्यवधि क्रमात् ॥ २९६ ललितात्रिशतीभाष्यम् । दिवसे दिवसे विप्रा भोज्या विशतिसख्यया । दशभि पभिर्वापि त्रिभिरेकेन वा दिने ॥ त्रिंशत्पष्टि शतविप्रा सभोज्यास्त्रिशत क्रमात् एव य' कुरुते भक्त्या जन्ममध्ये सकृन्नर ॥ तस्यैव सफल जन्म मुक्तिस्तस्य करे स्थिरा । रहस्यनामसाहस्रभोजनेऽप्येवमेव हि ॥ ४१ ॥ आदौ नित्यबलिं कुर्यात्पश्चाद्राह्मणभोजनम् । रहस्यनाममाहस्रमहिमा यो मयोदित ॥ ४२ ॥ सशीकराणुरत्रैकनाम्नो महिमवारिधेः । वाग्देवीरचिने नामसाहस्रे यद्यदीरितम् ॥४३॥ तत्फल कोटिगुणित नाम्नोऽप्येकस्य कीर्तनात् । एतदन्यैर्जपै स्तोत्रैरर्चनैर्यत्फल भवेत ॥ ४४ ॥ तत्फल कोटिगुणित भवेन्नामशतत्रयात् । वाग्देवीरचितास्तोत्रे तादृशो महिमा यदि ॥ ललितात्रिशतीभाष्यम् । २९७ साक्षात्कामेशकामेशीकृतेऽस्मिन्गृश्यतामिति । मकृत्सकीर्तनादेव नानामस्मिन्त्रये ॥ ४६ ॥ भवेचितस्य पर्याप्तिर्न्यनमन्यानपेक्षिणी । न ज्ञातव्यमितोऽप्यन्यन्न जप्तव्य च कुम्भज ॥ यत्साध्यतम कार्य तत्तदर्थमिद जपेत् । तत्तत्फलमवाप्नोति पश्चात्कार्य परीक्षयेत् ॥ ये ये प्रयोगास्तन्त्रेषु तैस्तैर्यत्साध्यते फलम् । तत्सर्व सिध्यति क्षिप्र नामत्रिशतकीर्तनात् ॥ आयुष्कर पुष्टिकर पुत्रद व यकारकम् । विद्याप्रद कीर्तिकर सुकवित्व प्रदायकम् ॥५० ॥ सर्वपत्प्रद सर्वभोगद सर्वसौख्यदम् । सर्वाभीष्टप्रद चैव देव्या नामशतत्रयम् ॥५१॥ एतज्जपपरो भूयान्नान्यदिच्छेत्कदाचन । तत्कीर्तन सतुष्टा श्रीदेवी ललिताम्बिका । २९८ ललितात्रिशतीभाष्यम् । भक्तस्य यद्यदिष्ट खान्तन्तत्पूरयते ध्रुवम् । तस्मात्कुम्भोद्भव मुने कीर्तय त्वमिद सदा ॥ नापर किंचिदपि ते बोद्धव्य नावशिष्यते । इति ते कथित स्तोल ललिताप्रीतिदायकम् ॥ नाविद्यावेदिने ब्रूयान्नाभक्ताय कदाचन । न शठाय न दुष्टाय नाविश्वासाय कर्हिचित् ॥ यो ब्रूयानिशीं नाम्ना तस्यानर्थो महान्भवत् । इत्याज्ञा शाकरी प्राक्ता तस्माद्गोष्यमिद त्वया ॥ ललिताप्रेरितनैव मयोक्त स्तानमुत्तमम् । रहस्यनामसाहस्रादपि गोप्यमिद मुने ॥ ५७ ॥ एवमुक्त्वा हयग्रीव कुम्भज तापसोप्तमम् । स्तोत्रेणानन ललितां स्तुत्वा त्रिपुरसुन्दरीम् ॥ आनन्दलहरीमग्नमानसः समवर्तत ॥ ५९ ॥ इति श्रीललितात्रिशतीस्तोत्र सपूर्णम् ॥ ललितात्रिशती नामानुक्रमणिका 11 af 11 ॥ नामानुक्रमणिका ॥ पृष्ठम् पृष्ठम् ईकाररूपा १९१ इश्वरवल्लभा १९५ ईक्षणसृष्टाण्डकोट १९५ ईश्वरार्घाङ्गशरीरा १९७ १९४ ईश्वरोत्सगनिलया १९७ १९५ इषात्स्मतानना १९८ ईतिबाधाविनाशिनी १९७ इहाविरहिता १९८ विनिर्देश्या १९२ एकप्राभवशालिनी १९० ईप्सितार्थप्रदायिनी १९१ एकभाक्तमदर्चिता १८१ ताण्डवसाक्षिणी १९७ एकभोगा १८५ ईशशक्ति १९८ एकरसा १८६ ईशाधिदेवता १९६ एकवीरादिससे व्या १८० ईशानादिब्रह्ममयी १९३ एकाक्षरी १७५ शत्र १९१ एकाग्रचित्तनिर्ध्याता १८२ ईशित्वाद्यष्टसिद्धिदा १९३ एकातपत्रसाम्राज्यप्रदा १८७ १९३ एकानन्दाचदाकृति १७९ ईश्वरप्रेरणकरी १९६ एकानेकाक्षराकृति १७७ ३०२ ललितात्रिशती पृष्ठम् पृष्ठम् एन्तपाजता १८८ कालिप्राणनायिका २२४ एकाररूपा १७५ कमनीया १६९ एकैश्वर्यप्रदायिना १८६ कमलाक्षा १६९ एजदनेकजगदीश्वरी १८९ कम्बुकण्ठा २२६ एतत्तदित्यनिर्देश्या १७८ Tafter ૩૭૪ एधमानप्रभा १८८ निर्जितपल्लवा २२६ एन कुटविनाशिना १८५ करभारु २२३ एलासुगा धचिकुरा एवमित्यागमाबोध्या १८४ करुणामृतसागरा १७० १८० कर्पूरवीटीसौरभ्यकल्लोलि १७२ १८४ कर्मफलप्रदा १७५ कजलाचना १७३ कमदमाक्षिणी १७४ कदर्पजनकापाङ्गवक्षणा १७१ कलानाथमुसी २२३ कदपविद्या १७१ कलावती १६९ ककाररूपा १६६ कलालापा २२६ ककाराया २२ कलिदाषहरा १७३ ककारिणी २६४ कल्पवल्लासमभुजा २२७ कचाजताम्बुदा २२३ कल्मषघ्नी १७० कटाक्षस्या दकरुणा २२३ कल्याणगुणशालिनी १६७ कठिनस्तनमण्डला २२२ कल्याणशैलनिलया १६८ कदम्बकाननावासा १७१ कल्याणा १६७ कदम्बकुसुमप्रियां १७१ कल्या २२२ नामानुक्रमणिका । ३०३ पृष्ठम् पृष्ठम् कस्तूरी तिलकाञ्चिता २२८ कामश्वरालिङ्गिताङ्गी २६७ काक्षितार्थदा २७० कामश्वराह्लादक २६९ कान्ता २२५ कामेश्वरी २७० कतिधूतपानल २२६ कारयित्रा १७४ कामकाटिनिलया २७ aroor विग्रहा २२४ कामसजीवनी २२२ नालहत्री २२१ कामितार्थदा २१ का यलोला ०६७ कामेशी २२१ लपटा २४२ कामेशोत्सगवासिनी २६७ लकाररूपा १९८ कामेश्वरगृहेश्वरा २६९ लकारारया २३६ कामेश्वर सिद्धि २६८ लकारिणी २७१ कामेश्वरप्रणयिनी २६८ लकुलेश्वरी २४३ कामेश्वरप्राणनाडी २६५ लक्षकाण्ड नायिका २०१ कामेश्वरप्राणनाथा २६८ लक्षणागम्या २०२ कामेश्वर ब्रह्मवा २६९ लक्षणोज्ज्वलदिव्याङ्गी ५०० कामश्वरमनाहरा २६५ लक्ष्मणाग्रजपूजिता २४० कामेश्वरमन प्रिया २६८ लक्ष्मीवाणीनिषेविता १९८ कामेश्वर महेश्वरी २७० लक्ष्याथा २०१ कामेश्वर विमोहिनी २६८ लग्नचामरहस्तश्रीशार ० २४१ कामेश्वरविलासिनी २६८ लघुसिद्धिदा २३९ कामेश्वर सुखप्रदा २६७ लङ्घयेतराजा २३८ २०४ ललितात्रिशती पृष्ठम् पृष्ठम् लजाढ्या २०४ शक्ति २७३ लज्जापदसमाराध्या ૨૪૨ लघसपत्समुन्नात २४४ लतातनु २ लधसुखा २७७ लतापूज्या २३६ लब्धहर्षाभिपूरिता २७८ ल धकामा २०२ लब्धातिशय सर्वाङ्ग सौदर्या २७ - लब्धदेहा २७३ लब्धाहकारदुर्गमा २७२ २७१ लब्धैश्वर्यसमुन्नति २७४ ल धनानागमस्थिति २७६ लम्या २ ४ लब्धपति लब्धपापमनोदूरा २७२ २७६ लभ्येतरा ૨૪૦ लम्बिमुक्ताताञ्चिता २ ३ लब्धभक्तिसुलभा २४० लम्बोदरप्रसू २०४ लब्धभोगा २७७ लयवर्जिता २ ४ लब्धमाना २४३ लयस्थित्युद्भवश्वरी २२६ लब्धयौवनशालिनी २७७ ललनारूपा १९९ लब्धरसा ૨૪૪ ललतिकालसत्पाला २० लब्धरागा २७६ ललाटनयनार्चिता २०० लब्धरूपा २७१ ललामराजदलिका २०३ लब्धलीला २७५ ललिता १९८ लब्धवाञ्छिता २७२ लसद्दाडिमपाटला १९९ लब्धविभ्रमा २७६ लाकिनी १९९ लब्धवृद्धि २७४ लाक्षारससवर्णाभा २३९ नामानुक्रमणिका । ३०५ पृष्ठम् पृष्ठम् लाङ्गलायुधा २४१ समानाधिक नर्जिता २६२ लाभालाभविवर्जिता २३८ सर्वकल २१६ लावण्यशालिनी २३९ सर्पगता २१९ लास्यदर्शनस्तुष्टा २३७ सर्वज्ञा २१५ सगहीना २६३ सर्वप्रपञ्चनिमात्रा २६२ सकला २५८ सर्व भर्ती २१६ सकलागमसस्तुता २५६ सर्वभूषणभूषिता २२० सकलाधिष्ठानरूपा २६१ सर्वमङ्गला २१५ सकष्टदा २६३ सर्वमाता २१९ सकाररूपा २१५ सर्वविमोहिना २१८ सकाराख्या २५५ सर्ववेदाततात्पयभूमि २५७ सगुणा २६३ सर्वसाक्षिणी २१७ सच्चिदानदा २५८ सर्वसौरयदात्री २१८ सत्यरूपा २६१ सर्वहा २१६ सदसदाश्रया २५७ सर्वाङ्गसुन्दरी २१७ सदाशिव कुटुम्बिनी २६० सर्वात्मिका २१७ सद्गतिदायिनी २५९ सर्वाधारा २१८ सनकादिमुनिध्येया २६० सर्वानवद्या २१७ सनातना २१६ सर्वारुणा २१९ समरसा २५६ सर्वावगुणवर्जिता २१९ समाकृति २६१ सर्वेशी २१५ SUVIT 20