This page has not been fully proofread.

श्लोकानुक्रमणिका ।
 
२८५
 
पृष्ठम्
 
पृष्ठम्
 
विदूरमुक्तवाहनै ०
 
१८९
 
विशालेषु कर्णान्तदीर्घे ०
 
विद्युल्लीकन्दली
 
विद्वन्मुख्यैर्विद्रुमाभं
 
१७६
 
१७८ विशुद्धमुक्ताफलजालरम्यं १०७
विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिक ० १३४
 
विधात्री धर्माणां त्वमसि १६१
 
विधौ क्लृप्तदण्डान्
विनिहितनवलाक्षा
 
विश्वं दर्पणदृश्यमाननग० १०२
 

 
विश्वं पश्यति कार्यकारण० १०४
 
°
 
२००
 
विश्वेश विश्वभवनाशक
 
११८
 
विनोदाय चैतन्यमेकं
 
१५२
 
विष्णुब्रह्मसुराधिप०
 
९४
 
विपञ्चीषु सप्तस्वरा०
 
२३२
 
विष्णुर्यस्य सहस्र ०
 
९३
 
विपञ्च्या गायन्ती
 
१४१
 
विष्ण्वाद्याश्च पुरत्रयं
 
९२
 
विभक्तत्रैवर्ण्य व्यतिकरित० १३८ विस्फुरत्सहजराग ०
 
२००
 
विराजन्मन्दारद्रुम० १६०
 
वीणामुपान्ते खलु
 
२१५
 
विरिञ्चिः पञ्चत्वं
 
१३१
 
वृषो वृद्धो यानं
 
१६३
 
विरिञ्चिमुख्यामरबृन्द •
 
११३
 
वेणीसौभाग्यविस्मा
 

 
५५
 
विरिञ्चिर्दीर्घायुर्भवतु
 
३०
 
वेदपादस्तवं वक्ष्ये
 
१६५
 
विरिञ्चयादिभिः पञ्चभिः १५१
 
वेदाः पादतले
 
२०२
 
विरिञ्चयादिरूपैः
 
१५१
 
वैयाघ्री यत्र कृत्तिः
 
६८
 
विरूपाक्ष विश्वेश
 
१७ वैरमुद्धतमपास्य
 
२१०
 
विलम्बिवेणीभुजगोत्त०
 
१९६
 
वैरिञ्चोषैर्विष्णुरुद्रेन्द्र०
 
१८२
 
विलुलितचिकुरेण
 
१९५
 
व्याप्तं हाटकविग्रहै०
 
१८६
 
विशालश्रीखण्डद्रवमृग ०
 
१६३
 
व्यालम्बमानवर ०
 
२००
 
विशाला कल्याणी
 
१३७ व्यालम्बमानसित ०
 
१९८