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श्लोकानुक्रमणिका ।
 
२७५
 
पृष्ठम्
 
पृष्ठम्
 
त्वमेव कारणं कार्य
 
१७०
 
गन्ते विलोला
 
१५७
 
त्वया हृत्वा वामं
 
१३०
 
दृशा द्राघीयस्या
 
१३९
 
त्वामाश्रयद्भिः कबरी ०
 
१९६
 
दृशि स्कन्दमूर्तिः
 
:
 
१२
 
त्वमेवाहं स्तौमि
 
१८४
 
दृश्यते तव मुखाम्बुजं
 
२१४
 

 
देयासुर्मूर्ध्नि राजत्सरस०
 
६३
 
थूत्कारस्तस्य मुखे
 
ददाने दीनेभ्यः
 
दधिदुग्धवृतैः
 
दध्याज्यादिद्रव्यक
 
दयनीयश्च दयालुः
 
दरिद्रं मां विजानीहि
दरिद्रोऽस्म्यभद्रोऽस्मि
 
८७
 
देवतान्तरमन्त्रौघ ०
 
१६९
 

 
देवस्याङ्काश्रयायाः
 
५३
 
१४७
 
देवि सर्वानवद्याङ्गि .
 
१७१
 
२२१
 
देवेभ्यो दानवेभ्यः
 
६२
 

 
९७
 
देहं प्राणमपीन्द्रियाण्य०
 
१०३
 
८७ द्रुततरतुरगैर्विराज ०
 
२३०
 
१७५
 

 
१९
 
धनुः पौष्पं मौर्वी
 
१२६.
 
१८०
 
मिले तव देवि
 
२२३
 
दिव्याकल्पोज्ज्वलानां
 
६१
 
धर्मस्थापनदक्ष
 
८७
 
दुग्धमेतदनले
 
२१३
 
धर्मो मे चतुरङ्घ्रिकः
 
३५
 
दुग्धैर्मध्वाज्ययुक्तै ०
 
७५
 
धाम्नां धाम प्रौढरुचीनां
 
९९
 
दुराशा भूयिष्ठे दुरधि०
दुष्टान्दैत्यान्हन्तुकामां
दूरीकृतानि दुरितानि
 
३०
 
धीयन्त्रेण वचोघटेन
 
३६
 
१७०
 
धुनोतु ध्वान्तं नस्तुलित ० १३५
 
४९ धूपं तेऽगरुसंभवं
 
२११
 
दूर्वा सरसिजान्वित
 

 
२१९
 
धृतिस्तम्भाधारां दृढ ०
 
३१