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॥ श्रीः ॥
 
॥ श्लोकानुक्रमणिका ॥
 
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अतिशीतमुशीरवासितं
 
२२६
 
अकण्टेकलङ्का •
 
२३
 
अत्यन्तं भासमाने
 
५९
 
अकारादिक्षकारान्त ०
 
१६५
 
अत्यर्थ राजते या
 
६५
 
अकिंचित्करकर्मभ्यः
 
१६५
 
अथ कथमपि
 
७९
 
अकिंचनार्तिमार्जनं
 

 
अथ बहुमणिमित्रैः
 
२२४
 
अक्षतैर्धवलैर्दिव्यै •
 
१०८
 
अथ मणिमयमञ्च ०
 
२३३
 
अगरुबहल ०
 
२११
 
अथ मातरुशीरवासितं
 
२३४
 
अगाधेऽत्र संसारपङ्के
 
१५३
 
अनाद्यन्तमाद्यं
 
१५
 
अग्रे केचन
 
२०३ अनुद्यल्ललाटाक्षि
 
२३
 
अग्रे गायति
 
२०३
 
अनेन स्तवेनादरा •
 
२४
 
अग्रे ते विनिवेद्य
 
२१३
 
अन्तःकरणविशुद्धिं
 
८२
 
अङ्कलं निजबीजसंतति ०
 
४१
 
अन्तःशोभिदशारके
 
२०९
 
अङ्गे शृङ्गारयोः
 
५६
 
अन्तेवासिन्नस्ति
 
१६९
 
अजं शाश्वतं
 
७२
 
अन्योन्यं प्लावयन्ती
 
१९८
 
अतिमृदुलौ मम चरणौ
 
४९
 
अपस्मारकुष्ठ
 
१२
 
S. S. 18