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<subtitle>॥ श्रीः॥</subtitle>
<title>
॥ गणेश भुजंगम् ॥
 
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रणत्क्षुद्रघण्टा निनादाभिरामं
 

चलत्ताण्डवोद्दण्डवत्पद्मतालम् ।
 

लसत्तुन्दिलाङ्गो परिव्यालहारं
 

गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ १ ॥
 
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ध्वनिध्वंसवीणालयोल्लासिवक्त्रं
 

स्फुरच्छुण्डदण्डोल्लसद्वीबीजपूरम् ।

गलद्दर्पसौगन्ध्यलोलालिमालं
 

गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥। २ ॥
 
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प्रकाशज्जपारक्तरत्नप्रसून-
 

प्रवालप्रभातारुणज्योतिरेकम् ।
 

प्रलम्बोदरं वक्रतुण्डैकदन्तं
 

गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ ३ ॥
 
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