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स्वात्मनिरूपणम् ।
 
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मान्योऽहमस्मि महतां मन्दमतीनाममाननीयोऽहम् ।
 

मदरागमानमोहितमानसदुर्वासनादुरापोऽहम् ॥ १३५ ॥
 
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यजनयजमानयाजकयागमयोऽहं यमादिरहितोऽहम् ।

यमवरुणयक्षवासवराक्षसमरुदीशवह्निरूपोऽहम् ॥ १३६ ॥
 
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रक्षाविधानशिक्षावीक्षितलीला लोकमहिमाहम् ।

रजनीदिवस विरामस्फुरदनुभूति प्रमाणसिद्धोऽहम् ॥
 
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लक्षणलक्ष्यमयोऽहं लाक्षणिकोऽहं लयादिरहितोऽहम् ।

लाभालाभमयोऽहं लब्धव्यानामलभ्यमानोऽहम् ॥ १३८ ॥
 
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वर्णाश्रमरहितोऽहं वर्णमयोऽहं वरेण्यगण्योऽहम् ।

वाचामगोचरोऽहं वचसामर्थेन गम्यमानोऽहम् ॥ १३९ ॥
 
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शमदमविरहितमनसां शास्त्रशतैरप्यगम्यमानोऽहम् ।

शरणमहमेव विदुषां शकलीकृत विविध संशयगणोऽहम् ॥
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<verse>षड्
भावविरहितोऽहं षड्गुणरहितोऽहमहितरहितोऽहम् ।

षट्कोशविरहितोऽहं षट्त्रिंशत्तत्त्वजालरहितोऽहम ॥
म् ॥</verse>
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संवित्सुखात्मकोऽहं समाधिसंकल्पकल्पवृक्षोऽहम् ।
 

संसारविरहितोऽहं साक्षात्कारोऽहमात्मविद्यायाः ॥
 
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