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स्वात्मनिरूपणम् ।
 

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तत्त्वातीतपदोऽहं तनुरहमस्मीति भावरहितोऽहम् ।

तामसदुरधिगमोऽहं तत्त्वंपदबोधबोध्यहृदयोऽहम् ॥
 
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दैवतदैत्यनिशाचरमानवतिर्यङ्महीधरादिरहम् ।

देहेन्द्रियरहितोऽहं दक्षिणपूर्वादिदिग्विभागोऽहम् ॥
 
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धर्माधर्ममयोऽहं धर्माधर्मादिबन्धरहितोऽहम् ।

धार्मिक जनसुलभोऽहं धन्योऽहं धातुरादिभूतोऽहम् ॥
 
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नामादिविरहितोऽहं नरकस्वर्गापवर्गरहितोऽहम् ।

नादान्तवेदितोऽहं नानाविधनिखिलनिगमसारोऽहम् ॥
 
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परजीवभेदबाधकपरमार्थज्ञानशुद्धचित्तोऽहम् ।
 
५१
 

प्रकृतिरहं विकृतिरहं परिणतिरहमस्मि भागधेयानाम् ॥
 
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फणधरभूधरवारणविग्रह विधृतप्रपञ्चसारोऽहम् ।

फालतलोदितलोचनपावकपरिभूतपञ्चवाबाणोऽहम् ॥ १३२ ॥
 
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बद्धो भवामि नाहं बन्धान्मुक्तस्तथापि नैवाहम् ।

बोध्यो भवामि नाहं बोधोऽहं नैव बोधको नाहम् ॥
 
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भक्तिरहं भजनमहं भुक्तिरहं भुक्तिमुक्तिरहमेव ।

भूतानुशासनोऽहं भूतभवद्भव्यमूलभूतोऽहम् ॥ १३४ ॥
 
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