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स्वात्मनिरूपणम् ।
 
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खानामगोचरोऽहं खातीतोऽहं खपुष्पभवगोऽहम् ।

खलजनदुरासदोऽहं खण्डज्ञानापनोदनपरोऽहम् ॥ ११९ ॥
 
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गलितद्वैतकथोऽहं देहीभवदखिलमूलहृदयोऽहम् ।

गन्तव्योऽहमनी हैर्ग त्यागतिरहितपूर्णबोधोऽहम् ॥ १२० ॥
 
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घनतरविमोहतिमिरप्रकरप्रध्वंसभानुनिकरोऽहम् ।

घटिकावासररजनीवत्सरयुगकल्पकालभेदोऽहम् ॥ १२२ ॥
 
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चरदचरदात्मकोऽहं चतुरमतिश्लाघनीयचरितोऽहम् ।

चपलजनदुर्गमोऽहं चञ्चलभवजलधिपारदेशोऽहम् ॥
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छन्दः सिन्धुनिगूढज्ञानसुखास्वादमोदमानोऽहम् ।

छलपदविहितमतीनां छन्नोऽहं शान्तिमार्गगम्योऽहम् ॥
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जलजासनादिगोचरपञ्चमहाभूतमूलभूतोऽहम् ।

जगदानन्दकरोऽहं जन्मजरामरणरोगरहितोऽहम् ॥
 
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झंकृतिहुंकृतिशिञ्जितबृंहितमुखविविधनादभेदोऽहम् ।

झटितिघटितात्मवेद्नदीपपरिस्फुरितहृद्यभवनोऽहम् ॥
 
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ज्ञानमहं ज्ञेयमहं ज्ञाताहं ज्ञानसाधनगणोऽहम् ।

ज्ञातृज्ञानज्ञेयविनाकृतमस्तित्वमात्रमेवाहम् ॥ १२६ ॥
 
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