Reports » श्रीरामवर्णमालिकास्तोत्रम्
Updated 2026-04-25 06:24
XML
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<lg n="39"> <l>भद्राय मेऽस्तु तव राघव बोधमुद्रा</l> <l>विद्रावयन्त्यखिलमान्तरमन्धकारम् ।</l> <l>मन्त्रस्य ते परिपुनन्ति जगद्यथाष-</l> <l>डष्टाक्षराण्य<add rend="brackets">पि तथैव</add>विवृण्वती सा ॥ ३९ ॥</l> </lg>
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Text
Devanagari text is well-formed ⚠ Partial (262/269)
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Verse numbers match `n` attribute ✓ Passed (49/49)
Meter
All verses have a known meter ⚠ Partial (28/51)
Verse 1
<lg n="1"> <l>अन्तस्समस्तजगतां यमनुप्रविष्ट-</l> <l>माचक्षते मणिगणेष्विव सूत्रमार्याः ।</l> <l>तं केलिकल्पितरघूद्वहरूपमाद्यं</l> <l>पङ्केरुहाक्षमनिशं शरणं प्रपद्ये ॥ १ ॥</l> </lg>
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Verse 2
<lg n="2"> <l>आम्नायशैलशिखरैकनिकेतनाय</l> <l>वाल्मीकिवाग्जलनिधिप्रतिबिम्बिताय ।</l> <l>कालाम्बुदाय करुणारसमेदुराय</l> <l>कस्मैचिदस्तु मम कार्मुकिणे प्रणामः ॥ २ ॥</l> </lg>
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Verse 6
<lg n="6"> <l>ऊढः पुरासि विनतान्वयसम्भवेन</l> <l>देव त्वया किमधुनापि तथा न भाव्यम् ।</l> <l>पूर्वे जना मम विनेमुरसंशयं त्वां</l> <l>जानासि राघव तदन्वयसम्भवं माम् ॥ ६ ॥</l> </lg>
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Verse 8
<lg n="8"> <l>नृणां न केवलमसि त्रिदिवौकसां त्वं</l> <l>राजा यमार्कमरुतोऽपि यतस्त्रसन्ति ।</l> <l>दीनस्य वाङ्मम तथा वितते तव स्यात्</l> <l>कर्णे रघूद्वह यतः ककुभोऽपि जाताः ॥ ८ ॥</l> </lg>
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Verse 11
<lg n="11"> <l>ऐशं शरासमचलोपममिक्षुवल्ली-</l> <l>भञ्जं बभञ्ज किल यस्तव बाहुदण्डः ।</l> <l>तस्य त्वशीतकरवंशवतंस शंस</l> <l>किं दुष्करो भवति मे विधिपाशभङ्गः ॥ ११ ॥</l> </lg>
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Verse 12
<lg n="12"> <l>ओजस्तव प्रहितशेषविषाग्निदग्धैः</l> <l>स्पष्टं जगद्भिरुपलभ्य भयाकुलानाम्<add>(?)</add>।</l> <l>गीतोक्तिभिस्वयि निरस्य मनुष्यबुद्धिं</l> <l>देव स्तुतोऽसि विधिविष्णुवृषध्जानाम् ॥ १२ ॥</l> </lg>
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Verse 15
<lg n="15"> <l>अश्रान्तमर्हति तुलाममृतांशुबिम्बं</l> <l>भग्नाम्बुजद्युतिमदेन भवन्मुखेन ।</l> <l>अस्मादभूदनल इत्यकृतोक्तिरीश</l> <l>सत्या कथं भवतु साधुविवेकभाजाम् ॥ १५ ॥</l> </lg>
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Verse 16
<lg n="16"> <l>कल्याणमावहतु नः कमलोदरश्री-</l> <l>रासन्नवानरभटौघगृहीतशेषः ।</l> <l>श्लिष्यन् मुनीन् प्रणतदेवशिरःकिरीट-</l> <l>दाम्नि स्खलन् दशरथात्मज ते कटाक्षः ॥ १६ ।</l> </lg>
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Verse 17
<lg n="17"> <l>खंवायुरग्निरुदकं पृथिवी च शब्दः</l> <l>स्पर्शश्च रूपरसगन्धमपि त्वमेव ।<ellipsis>... ... ... ... ... ...</ellipsis>दययात्मबन्धो</l> <l>धत्से वपुः शरशरासभृदब्दनीलम् ॥ १७ ॥</l> </lg>
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नी
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Verse 21
<lg n="21"> <l>चण्डानिलव्यतिकरक्षुभिताम्बुवाह-</l> <l>दम्भोलिपातमिव दारुणमन्तकालम् ।</l> <l>स्मृत्वापि संभविनमुद्विजते न धन्यो</l> <l>लब्ध्वा शरण्यमनरण्यकुलेश्वरं त्वाम् ॥ २१ ॥</l> </lg>
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ण्य
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कु
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ले
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श्व
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रं
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त्वाम्
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Verse 22
<lg n="22"> <l>छन्नं निजं कुहनया मृगरूपभाजो</l> <l>नक्तंचरस्य न किमाविरकरि रूपम् ।</l> <pb n="293"/> <l>त्वत्पत्रिणापि रघुवीर ममाद्य माया-</l> <l>गूढस्वरूपविवृतौ तव कः प्रयासः ॥ २२ ॥</l> </lg>
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Verse 26
<lg n="26"> <l>टङ्कारमीश भवदीयशरासनस्य</l> <l>ज्यास्फालनेन जनितं निगमं प्रतीमः ।</l> <l>येनैव राघव भवानवगम्य मास-</l> <l>त्रासं निरस्य सुखमातनुते बुधानाम् ॥ २६ ॥</l> </lg>
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ग
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मा
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स्य
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मा
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नु
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ते
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बु
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Verse 28
<lg n="28"> <l>डिम्भस्तवास्मि रघुवीर तथा दयस्व</l> <l>लभ्यं यथा कुशलवत्वमपि क्षितौ मे ।</l> <l>किञ्चिन्मनो मयि निधेहि तव क्षतं किं</l> <l>व्यर्था भवत्वमनसं गृणती श्रुतिस्त्वाम् ॥ २८ ॥</l> </lg>
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डि
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म्भ
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स्त
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स्मि
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र
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र
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था
G
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य
G
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स्व
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ल
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भ्यं
G
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य
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था
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कु
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श
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ल
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त्व
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कि
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ञ्चि
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धे
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हि
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त
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G
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क्ष
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G
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किं
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व्य
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व
G
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ण
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ती
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श्रु
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ति
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स्त्वाम्
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Verse 31
<lg n="31"> <l>तत्त्वंपदे पदमसीति च यानि देव</l> <l>तेषां यदस्म्यभिलषन्नुपलब्धुमर्थान् ।</l> <l>सेवे पदद्वयमतो मृदुलं न वादौ</l> <l>यद्दारुणैरपि ततो भवदर्थलाभः<add>(?)</add>॥ ३१ ॥</l> </lg>
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त
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त्त्वं
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प
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दे
G
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द
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ते
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स्म्य
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भि
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ल
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ष
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न्नु
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प
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ल
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ब्धु
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म
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र्थान्
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से
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प
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G
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म
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मृ
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दु
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G
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न
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दौ
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द्दा
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रु
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तो
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व
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द
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र्थ
L
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ला
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भः
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Verse 34
<lg n="34"> <l>धत्ते शिरांसि दश यस्सुकरो वधोऽस्य</l> <l>किं न त्वया निगमगीतसहस्रमूर्ध्ना ।</l> <l>मोहं ममामितपदं यदि देव हन्याः</l> <l>कीर्तिस्तदा तव सहस्रपदो बहुः स्यात् ॥ ३४ ॥</l> </lg>
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ध
G
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त्ते
G
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शि
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रां
G
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सि
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द
L
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श
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य
G
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स्सु
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क
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G
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व
L
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धो
G
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स्य
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किं
G
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G
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L
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G
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ग
L
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म
L
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गी
G
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त
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ह
G
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स्र
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मू
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र्ध्ना
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म
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मा
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मि
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प
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दं
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G
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ह
G
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न्याः
G
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की
G
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र्ति
G
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स्त
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दा
G
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त
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व
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स
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ह
G
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स्र
L
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प
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दो
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ब
L
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हुः
G
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स्यात्
G
|
Verse 38
<lg n="38"> <l>बर्हिश्छदग्रथितकेशमनर्हवेष-</l> <l>मादाय गोपवनिताकुचकुङ्कुमाङ्कम् ।</l> <l>ह्रीणो न राघव भवान् यदतः प्रतीमः</l> <l>पत्न्या ह्रिया विरहितोऽसि पुरा श्रियेव ॥ ३८ ॥</l> </lg>
|
ब
G
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र्हि
G
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श्छ
L
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द
G
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ग्र
L
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थि
L
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त
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L
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ष
L
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G
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L
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G
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L
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कु
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च
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कु
G
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ङ्कु
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मा
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ङ्कम्
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ह्री
G
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णो
G
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न
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G
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घ
L
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L
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G
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G
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G
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सि
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पु
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रा
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श्रि
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ये
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व
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Verse 39
<lg n="39"> <l>भद्राय मेऽस्तु तव राघव बोधमुद्रा</l> <l>विद्रावयन्त्यखिलमान्तरमन्धकारम् ।</l> <l>मन्त्रस्य ते परिपुनन्ति जगद्यथाष-</l> <l>डष्टाक्षराण्य<add rend="brackets">पि तथैव</add>विवृण्वती सा ॥ ३९ ॥</l> </lg>
|
भ
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द्रा
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य
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मे
G
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स्तु
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त
L
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व
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घ
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G
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ध
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वि
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द्रा
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ष
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ड
G
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ष्टा
G
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क्ष
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रा
G
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ण्य
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पि
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G
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व
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वि
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वृ
G
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ण्व
L
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ती
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सा
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Verse 40
<lg n="40"> <l>मन्दं निधेहि हृदि मे भगवन्नटव्यां</l> <l>पाषाणकण्टकसहिष्णु पदाम्बुजं ते ।</l> <l>अङ्गुष्ठमात्रमथवात्र निधातुमर्ह-</l> <l>स्याक्रान्तदुन्दुभितनूकठिनास्थिकूटम् ॥ ४० ॥</l> </lg>
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म
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न्दं
G
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नि
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धे
G
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हि
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हृ
L
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G
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G
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षा
G
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ण
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प
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म्बु
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G
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ङ्गु
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ष्ठ
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मा
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त्र
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म
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र्ह
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स्या
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दु
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त
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G
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क
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ठि
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ना
G
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स्थि
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कू
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टम्
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Verse 41
<lg n="41"> <l>यज्ञेन देव तपसा यदनाशकेन</l> <l>दानेन च द्विजगणैर्विविदिष्यसे त्वम् ।</l> <l>भाग्येन मे जनितृषा तदिदं यतस्त्वां</l> <l>चापेषुभाक् परमबुध्यत जामदग्न्यः ॥ ४१ ॥</l> </lg>
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य
G
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ज्ञे
G
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न
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G
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व
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वि
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त्वम्
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भा
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ग्ये
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न
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ज
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नि
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तृ
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षा
G
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त
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य
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त
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स्त्वां
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चा
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पे
G
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षु
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भा
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क्प
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र
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म
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ध्य
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त
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जा
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म
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द
G
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ग्न्यः
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Verse 45
<lg n="45"> <l>शम्भुः स्वयं निरदिशद्गिरिकन्यकायै</l> <l>यन्नाम राम तव नामसहस्रतुल्यम् ।</l> <l>अर्थं भवन्तमपि तद्वहदेकमेव</l> <l>चित्रं ददाति गुणते चतुरः किलार्थान् ॥ ४५ ॥</l> </lg>
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श
G
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म्भुः
G
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स्व
L
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यं
G
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नि
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र
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श
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द्गि
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क
G
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य
G
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G
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म
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G
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L
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स
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ह
G
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स्र
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तु
G
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ल्यम्
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अ
G
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G
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भ
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G
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न्त
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म
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पि
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द्व
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G
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तु
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रः
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कि
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ला
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र्थान्
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Verse 46
<lg n="46"> <l>षट् ते विधिप्रभृतिभिः समवेक्षितानि</l> <l>मन्त्राक्षराणि ऋषिभिर्मनुवंशकेतो ।</l> <l>एकेन यानि गुणितान्यपि मानसेन</l> <l>चित्रं नृणां त्रिदशतामुपलम्भयन्ति ॥ ४६ ॥</l> </lg>
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ष
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ट्ते
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वि
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धि
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प्र
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भृ
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स
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क्षि
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क्ष
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णि
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षि
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र्म
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नु
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त्रि
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मु
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ल
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म्भ
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य
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न्ति
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Verse 48
<lg n="48"> <l>हंसोऽसि मानसचरो महतां यतस्त्वं</l> <l>संभाव्यते कील ततस्तव पक्षपातः ।</l> <l>मय्येनमर्पय न चेद्रघुनन्दन<ellipsis>... ...</ellipsis> </l> <l>जिष्णोरपि त्रिभुवने समव<ellipsis>... ...</ellipsis>॥ ४८ ॥</l> </lg>
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हं
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सो
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सि
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मा
G
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न
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स
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च
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रो
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म
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व्य
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त
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न
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Verse 51
<lg n="51"> <l>इत्थं मम स्तुवदमर्त्यनिगद्यमान-</l> <l>त्रय्यन्तमन्त्रमुखरीकृतपादपीठ ।</l> <l>राजाधिराज कृपया रघुवीर वर्ण-</l> <l>मालास्तवं त्वमवकर्णयितुं प्रसीद ॥ ५१ ॥</l> </lg>
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इ
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स्तु
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जा
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रा
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कृ
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र्ण
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तुं
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प्र
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सी
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द
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