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श्री वेंकटेशकाव्यकलापे
 
अभिरामगुणाकर दाशरथे
जगदेकधनुर्धर धीमते ।
रघुनायक राम रमेश विभो
 
वरदो भव देव दयाजलधे ॥ ६ ॥
 
अवनीतनयाकमनीयकरं
 
रजनीकरचारुमुखाम्बुरुहम् ।
 
रजनीचरराजत मोमिहिरं
 
महनीयमहं रघुराममये ॥ ७ ॥
 
सुमुखं सुहृदं सुलभं सुखदं
 
स्वनुजं च सुकायममोघशरम् ।
अपहाय रघूद्वहमन्यमहं
 
न कथचन कञ्चन जातु भजे ॥ ८ ॥
 
बिना वेंकटेशं न नाथो न नाथः
 
सदा वेंकटेशं स्मरामि स्मरामि ।
 
हरे वेंकटेश प्रसीद प्रसीद
 
प्रियं वेंकटेश प्रयच्छ प्रयच्छ ॥ ९ ॥
 
अहं दूरतस्ते पदाम्भोजयुग्म-
प्रणामेच्छयाऽऽगत्य सेवां करोमि ।
सकृत्सेवया नित्यसेवाफलं त्वं
 
प्रयच्छ प्रयच्छ प्रभो वेंकटेश ॥ १० ॥
 
अज्ञानिना मया दोषानशेषान्विहितान् हरे ।
क्षमस्व त्वं क्षमस्व त्वं शेषशैलशिखामणे ॥
॥ इति श्रीवेंकटेशस्तोत्रम् ॥